370010869858007
Loading...

दीपावली विशेष हास्य व्यंग्य // टिकट कटे की दीपावली // अशोक गौतम

मुझे पता नहीं क्यों पता नहीं चला कि उनका फिर टिकट कट गया है। अब तक बस, यही जानता था कि वे कटे नाक वाले हैं। पर अब एकबार फिर वे कटे टिकट वाले भी हो गये। वैसे कभी नाक तो कभी टिकट कटना उनके जीवन की बस ले दे कर दो ही कथाएं हैं।

टिकट के जुगाड़ में वे ही जाने उन्होंने कहां कहां, किस किस पार्टी की सिंदबाद से भी लंबी लंबी यात्राएं नहीं कीं। पर जितनी बार भी उन्हें टिकट मिल लड़ने की उम्मीद होती,ऐन मौके पर उनका टिकट कट जाता और वे वोट लपेटने के लिए लिखवाए बीसियों रटे भाषण गले के किसी कोने में दबा कर रह जाते। सच पूछो तो अब गले में दबाए जनता को बहलाने फुसलाने वाले भाषणों से उनका गला गले गले तक भर चुका था।

अबके इस अखबार से लेकर उस अखबार तक ये चर्चा आम थी कि हमारे हलके से टिकट मिलेगा तो बस उन्हें ही। उनसे उनका कोई सबकुछ छीन सकता है, पर कोई अबके उनसे उनका टिकट लेकर लड़ने का अधिकार नहीं छीन सकता। उन्होंने ये अफवाह फैलाई थी या कि यह सच था, वे ही जाने कि जिस पार्टी में इन दिनों उन्होंने प्रश्रय लिया हुआ था उस पार्टी ने मन बना लिया है कि उन्हें वह अबके टिकट देकर लड़ाएगी, बिन टिकट तो वे बहुत लड़े। पर जो मजा टिकट लेकर लड़ने में है, वह बिन टिकट लिए लड़ने में कहां? क्योंकि टिकट लेकर आदमी का मंच पर से खुले आम लड़ना, किसी को भी ललकारना, गाली गलौज करना वैधानिक हो जाता है।

बगल में काजू बादाम का डिब्बा दबाए मन ही मन उन्हें कोसता पर आने वाले पांच सालों के लिए उनकी आंख का तारा होने हेतु उनके घर पहुंचा तो घर में अंधेरा। हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। नेताजी टिकट लेकर कहीं विदेस ही तो नहीं हो लिए। कहीं एक भी टिमटिमाता दीया तो छोड़िए, चुराई बिजली के बल्ब भी ऑफ! सोचा, मैं ही दीवाली के नशे में गलत घर आ गया हूंगा शायद। जनता के घर अंधेरा हो तो होता रहे, उनके घर अंधेरा तो हो ही नहीं सकता। पर जब गौर से देखा तो घर उन्हीं का था। पर उनके घर अंधेरा? अब तो उनके घर में दिन को भी दीए जलने वाले हैं। रोज लक्ष्मी उनकी पूजा करने वाली है।

दरवाजा ठकठकाया तो उनकी बीवी ने दरवाजा खोला। पूरी तरह मायूस! पता नहीं कुछ बीवियां अपने पतियों के स्टेट्स के आसरे ही क्यों जीती हैं? ऐसी पत्नियों पर भी विमर्श होना चाहिए।

‘भाभी जी प्रणाम! नेताजी घर पर हैं क्या?’

‘ कहां जाएंगे! यहीं हैं।’

’ पर घर में दीवाली को भी यह अंधेरा क्यों? ऐसे में लक्ष्मी रास्ता भटक गईं तो?’ कह मैंने उनके घर के बाहर का बल्ब जलाना चाहा तो उन्होंने मेरा हाथ रोकते कहा,‘ रहने दो! ’

‘ क्यों ?’

‘उनका टिकट कट गया,’ कह वे टिकट कटे से भी अधिक परेशान। लगा,किसीका टिकट कटना नाक कटने से भी अधिक पीड़ादाई होता हो जैसे। उनके मुंह बनाने से तो ऐसा ही लग रहा था उस वक्त कुछ कुछ।

‘नेता जी कहां हैं?’

‘होने कहां? बस, चुनाव में जनता को लुभाने के लिए सिलवाए कपड़े निहार रहे हैं। इनकी तो ये जाने, पर उनको टिकट मिलने की उम्मीद में पता नहीं मैंने भी क्या क्या सपने संजोए डाले थे। सोचा था, अबके पूरे परिवार के हाथों में लड्डू तो होंगे ही, रिश्तेदारों के हाथ में भी आधा पौना लड्डू दे रिश्तेदारी के ऋण से मुक्त हो जाएंगे पर.... लगता है इनकी किस्मत में और तो सबकुछ लिखा है, पर टिकट लेकर लड़ना नहीं लिखा है,’ कह उन्होंने मुझे नेताजी से मिलने जाने का इशारा किया तो मैं अंधेरे में भी पीड़ा का अभिनय करता उनके पास हो लिया। यह जानते हुए कि आज का दौर भांडों का दौर है। विशुद्ध विद्वान ऐसे विदूषकों का दौर है जो दरबारों में काम करने की नौटंकी करते आम डटे रहते हैं अपने अपने साहबों को बहलाने फुसलाने के लिए। भीतर गया तो नेताजी घुप्प अंधेरे में।

‘नेता जी नमस्कार!’

‘कहो, कैसे आना हुआ? जले पर नमक छिड़कने आए हो या...’

‘ जले पर नमक छिड़कना तो दोस्तों का प्रिय शगल होता है नेताजी! मैं तो.....

‘यार ,देश सेवा करने का सौभाग्य अबके फिर हाथ से निकल गया। इस देश सेवा के लिए मैंने क्या क्या नहीं किया पर...,’ कह वे फफक कर रो पड़े। मैं चुप! बगल में दीपावली का दबाया गिफ्ट बगल में दबाकर रखना अब मुश्किल हो रहा था। लग रहा था कि वह अब गिरा कि अब गिरा। पर मुझे इस बात की खुशी थी कि अंधेरे में वे मेरा चेहरा देख पा रहे थे न मैं उनका।

--

अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड़

नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

व्यंग्य 5607750681153276685

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव