नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

प्राची अक्टूबर 2018 : कहानी // पूर्व मंत्री जी की जेल और उनकी आत्मकथा // रमेश मनोहरा

कहानी

पूर्व मंत्री जी की जेल और उनकी आत्मकथा

रमेश मनोहरा

किसी पूर्व मंत्री का जेल जाना अब कोई मायने नहीं रखता है। जेल जाना ससुराल जाने की तरह हो गया है। मंत्री पद पर रहते घपले-घोटाले करो और जब उन पर न्यायालय में केस दायर हो जाए लड़ो, उन्हें क्या लड़ना- लड़ना तो उनके वकील को है. मुकद्मा कितने सालों तक चले यह संभव नहीं, अतः मंत्री पद का पहले खूब दुरुपयोग करके घपले-घोटाला करता है, फिर उन घपले-घोटाले को लेकर विपक्ष हंगामा करता है। तब भी बेशर्मी से रहते हैं।

यदि वे मुकद्मा हारकर जेल भी चले गये, तब भी उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। ऐसे ही पूर्व गृहमंत्री विश्वनाथ घपले-घोटाले करने के कारण जेल काट रहे हैं। उन्हें 10 साल की सजा हुई है. गृहमंत्री थे। कई थानों, जेलों का उद्घाटन किया था. जिस जेल का उन्होंने कभी उद्घाटन किया था, उसी जेल में आज वे सजा काट रहे हैं, यह कैसी विडम्बना है।

उन्हीं विश्वनाथ के पास उनकी पत्नी सुशीला बैठी हुई है। कभी-कभी वो उनसे मिलने आती हैं। चिंतन के क्षणों में दोनों अपनी बातें करके सुख-दुख बांट लेते हैं। ऐसे में विश्वनाथ कहते हैं, ‘‘ये 10 वर्ष कब बीतेंगे?’’

‘‘धीरज रखें।’’ पत्नी सुशीला कहती, ‘‘आँख मींचते ही बीत जायेंगे।’’

‘‘यहाँ तो एक-एक पल एक-एक वर्ष के बराबर लग रहा है।’’

‘‘विश्वास रखें, ये भी दुःख भरे दिन बीत जायेंगे।’’ पत्नी सुशीला जब यह विश्वास दिलाती है, तब विश्वनाथ के भीतर का क्रोध बढ़ जाता है। ऐसे में सुशीला जब आज उनसे मिलने आई, तो बोलीµ ‘‘सुनो जी.’’

‘‘हाँ भागवान, क्या कहना चाहती है?’’ आवश्यक कार्य करते हुए विश्वनाथ बोलेµ

‘‘आपको जेल में अब फुरसत ही फुरसत है।’’

[post_ads]

‘‘हाँ सो तो है।’’

‘‘मैं चाहती हूं इस फुरसत के क्षणों में आप अपनी आत्मकथा लिखें।’’

‘‘मगर इससे होगा क्या?’’

‘‘अरे आप लेखक की श्रेणी में आ जायेंगे।’’

‘‘एक घपलेबाज मंत्री को कौन लेखक मानेगा।’’ समझाते हुए विश्वनाथ बोले- ‘‘फिर सुशीला जितना तुम समझ रही हो उतना आसान नहीं है ये लिखने का काम।’’

‘‘असंभव भी संभव हो सकता है?’’

‘‘वो कैसे?’’

‘‘अरे नेहरूजी से सीख लीजिए।’’

‘‘क्या किया उन्होंने?’’

‘‘अरे क्या नहीं किया, वे आजादी के लिए जेल गये थे। जेल में उन्होंने ‘भारत एक खोज’ के नाम से किताब लिख डाली थी।’’ समझाती हुई सुशीला बोली, ‘‘क्या आप जेल में रहकर अपनी आत्मकथा नहीं लिख सकते हैं। इससे समय का भी सही सद्उपयोग हो जायेगा।

‘‘हाँ सुशीला, बात तो तुम ठीक कहती हो।’’ जरा सोचकर विश्वनाथ बोले.

‘‘तब फिर देर किस बात की, उठाओ कागज कलम और बन जाओ लेखक।’’

‘‘मगर मेरे साथ घपला-घोटाला लगा हुआ है. आत्मकथा पढ़कर लोग हंसी उड़ायेंगे।’’

‘‘आप अपनी आत्मकथा में यही बताने का प्रयास करें कि घपला-घोटाला मैंने नहीं किया, बल्कि यह विपक्ष की आपके प्रति बहुत बड़ी साजिश है. उस साजिश के तहत आपकों फंसाया गया। जैसे श्री कृष्ण बचपन मैं माखन चुराकर खाते थे, यशोदा द्वारा पकड़े जाते थे, तब अपनी सफाई में श्री कृष्ण कहते- ‘मैंने मक्खन नहीं खाया मां, ग्वाल बालों ने मिलकर मेरे मुख पर जबरदस्ती लगा दिया है।’’

कहकर सुशीला ने अपनी बात पूरी की। तब विश्वनाथ के दिमाग में यह बात बैठ गई। अतः प्रसन्न होकर बोलेµ ‘‘अरे सुशीला, क्या तुमने जबरदस्त आइडिया दिया। मेरी खोपड़ी में यह आइडिया पहले क्यों न आया। अरे सुशीला यह तो हमें गड़ा हुआ खजाना मिल गया।’’ तब पत्नी सुशीला चहकती हुई बोलीµ ‘‘सचमुच आपको मेरी योजना पसन्द आ गई और आप अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं?’’

‘‘हाँ सुशीला, मैं लिखूंगा, ऐसी लिखूंगा कि पलक झपकते चर्चित हो जायेगी।’’ बहुत प्रसन्नता से विश्वनाथ बोले. तुरन्त पुलिसवाले को पास बुलाकर बोलेµ ‘‘हमें एक रीम कागज दो।’’

‘‘मगर सर एक रीम कागज का क्या करेंगे?’’ पुलिसवाले ने उत्सुकता से पूछा।

‘‘हमारे भीतर लेखक दहाड़ें मार रहा है?’’

‘‘ये लेखक किस चिड़िया का नाम है सर?’’ पुलिसवाले ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘लेखक का मतलब लिखने वाला समझे।’’

[post_ads_2]

‘‘समझ गया सर तब तो मैं भी लेखक हुआ।’’

‘‘तुम कैसे हो गये लेखक?’’

‘‘अरे सर, रोजनामचा पर रपट लिखता हूं, तब मैं भी लेखक हुआ कि नहीं।’’

‘‘गलत बिल्कुल गलत।’’

‘‘गलत कैसे हुआ सर, समझाइये।’’

‘‘तुम्हारे कथनानुसार बही खाता लिखने वाला बनिया, फाइल को निपटाने वाला बाबू भी अपने को लेखक कहलाएगा। मैं ऐसे लेखक की बात नहीं कर रहा हूं।’’

‘‘तब फिर किस लेखक की बात कर रहे हैं?’’

‘‘मैं उस लेखक की बात कर रहा हूं, जो उपन्यास कहानियां, नाटक, प्रहसन, कविताएं, यात्रा वर्णन, आत्मकथा लिखते हैं, वे लेखक की श्रेणी में आते हैं।’’

‘‘मगर सर, आपने जिन चीजों का उल्लेख किया है, वे मेरी समझ में नहीं आई। ये उपन्यास, कहानियाँ, नाटक, कविताएँ क्या हैं, मेरी समझ से बाहर हैं।’’

‘‘तुमको किसने पुलिस में भर्ती कर लिया? तुम नहीं समझोगे. लाओ पहले एक रीम कागज लाकर दो, फिर तुम्हें प्रैक्टिकल करके समझाता हूं।’’ विश्वनाथ ने जब यह आदेश दिया, तब पुलिस वाला सलाम ठोकते हुए बोला, ‘‘जी सर, अभी लाया, बहुत जल्दी।’’

कहकर पुलिस वाला चला गया. विश्वनाथ भीतर ही भीतर प्रसन्न हो रहे थे। सुशीला ने समय काटने के लिए कितनी अच्छी तरकीब बताई थी। समय काटे नहीं कट रहा था। अब दिन भर आत्मकथा लिखने में ही गुजारूंगा। इससे समय का पता नहीं चलेगा। खुद की कथा लिखूंगा. जब वो छपेगी तब तहलका मच जायेगा। सोचते-सोचते सुशीला से वे बोलेµ ‘‘धन्यवाद सुशीला, आत्मकथा के बहाने मेरे विरोधियों को नंगा करने का अच्छा प्लान दिया।’’

‘‘हाँ सो तो है. मगर मैं देख रही हूं, पुलिस वालों पर आपका रूतबा अब भी कायम है। आपका आदेश पाते ही कागज लेने चला गया।’’

‘‘यह सब मुझे नहीं, मेरे गृहमंत्री पद को सलाम कर रहे हैं। अरे जब मैं गृहमंत्री था, तब ये ही पुलिसवाले मेरे आगे पीछे नाचते थे। सुशीला देखना, ऐसी आत्मकथा लिखूंगा जिसे पढ़कर सब दांतों तले ऊँगली दबाकर रह जायेंगे. मगर ये पुलिस वाला अभी तक कागज लेकर क्यों नहीं आया? करूं क्या, इस पर दबाव भी तो नहीं डाल सकता हूं। आज मैं कुर्सी पर नहीं हूं, अतः पुलिस वाला भी लापरवाह है.’’ तभी वही पुलिस वाला उधर से निकलता दिखा. तब विश्वनाथ बोलेµ ‘‘अरे तुम कागज लेकर नहीं आये।’’

‘‘कागज की बात साहब तक पहुँचा दी है।’’ पुलिस ने लापरवाही से उत्तर दिया।

‘‘मगर कागज के लिए साहब से बात करने की क्या जरूरत थी।’’

‘‘मैं कानून से बंधा हुआ हूं सर।’’

‘‘यह कौन-सा कानून, मुआ यह कागज नहीं बम हुआ है।’’

‘‘सर, आपको ऐसा लगता है. मगर मैं आदेश से बंधा हुआ हूं. जब तक साहब इजाजत नहीं देंगे, मैं कागज लाकर नहीं दे सकता।’’

‘‘आदेश से बंधा हुआ। मैं आदेश दे रहा हूं एक रीम कागज लेकर आओ।’’

‘‘माफ करें सर, मैं आपको लाकर नहीं दे सकता. साहब के आदेश का इंतजार करो।’’

‘‘मगर जब तक तुम कागज लाकर दोगे तब तक मेरे सारे विचार दम तोड़ देंगे।’’

‘‘सॉरी सर, मैं कानून से बंधा हुआ हूं।’’ कहकर पुलिस वाला चला गया. विश्वनाथ बौखलाते हुए बोले- ‘‘जेल क्या हुई सबने आँखें फेर लीं।’’

‘‘गुस्सा न करें।’’ समझाती हुई सुशीला बोलीµ ‘‘अपने आप को मंत्री न समझे, यह मत भूलें कि आप अभी जेल में कानून से बंधे हुए हैं।’’

‘‘कानून...कानून...कानून... तुम भी कानून की बात करती हो. सुशीला जब मैं मंत्री था, यही कानून मेरे कदमों के नीचे था?’’ गुस्से से विश्वनाथ यह बात कर रहे थे. तभी पुलिस वाला आकर सुशीला से बोला, ‘‘मैडम, आपका समय कभी का खत्म हो गया। अब एक मिनट भी देर न करें, वरना साहब आकर मुझे डांटेंगे।’’

‘‘अच्छा चलती हूं, आप अपनी आत्मकथा आज से ही लिखना शुरू कर देना।’’ उठती हुई सुशीला बोली.

‘‘क्या लिखूं कागज का तो यहाँ अकाल पड़ा हुआ है।’’ गुस्से सो फिर उबल पड़े विश्वनाथ अभी तक वह पुलिस का बच्चा कागज तक लेकर नहीं आया।

‘‘धीरज रखिये कागज भी मिल जायेगा। जेल में रहकर ऐसी आत्म कथा लिखना, सब पढ़कर दांतों तले ऊँगली दबाते रहे।’’

यह कहकर सुशीला चली गई। मगर विश्वनाथ खा जाने वाली निगाह से उस पुलिस वाले को देखते रहे, जो व्यंग्य से मुस्काता हुआ चला गया था।

विश्वनाथ जेल की सलाखों में अपना क्रोध उगलते रहे। आज वे कागज के लिए तरस गये। जब वे गृहमंत्री थे। तब ये ही लोग उनके आसपास तलवे चाटते थे। उनके एक आदेश पर तत्काल आकर खड़े हो जाते थे। जो वे कहते थे। तत्काल कर दिया करते थे। वे ही पुलिस वाले आज उन्हें आंखें दिखा रहे हैं। कागज अभी तक लाकर नहीं दिया। सुशीला कितनी अच्छी सलाह दे गई। खुद की आत्मकथा लिखो। इस समय उनके भीतर विचार समुद्र की तरह दहाड़ें मार रहे थे। कागज होता तो लिखना शुरू कर देता। कितनी देर हो गई। चार बार उस पुलिसवाले को बुलाकर पूछा। उसका एक ही उत्तर होता- साहब ने अभी इजाजत नहीं दी। कानून के तहत कार्यवाही जारी है। आज जब मैं जेल में हूं तब मुझे सब कानून सिखा रहे हैं। कागज देना या नहीं देना- इस पर कानून का शोध चल रहा है। मतलब सारे कानून मेरे ऊपर ही लागू हैं। ये पुलिसवाले खुद ही कहाँ कानून का पालन कर रहे हैं। अब मुझे कानून का पाठ सिखा रहे हैं। कानून का वास्ता देकर सारे कानून मुझ पर लागू किये जा रहे हैं। यह सब अब भी उनके विरोधी गुट की शरारत है। मुझे जेल में भिजवाने में भी सारा षड्यंत्र भी उन्हीं का है। जेलर से जब कागज मांगे तब वो भी कानून का पाठ पढ़ाकर चला गया। उनको कागज देने में भी कानून आड़े आ रहा है। देर पर देर किये जा रहे हैं। जान बुझकर उन्हें परेशान कर रहे हैं। इस बात को विश्वनाथ को समझ चुके हैं।

उन्हें आत्मबोध हुआ, कानून नाम की कोई चीज होती है। यह भी सच है... मंत्री पद पर रहते उन्होंने खूब घोटाले किये। आये दिन उनके विरोधी घोटाले उजागर करते रहते थे मगर कानून के उन्होंने हाथ पैर बांध दिये थे। आज जब वे मंत्री पद पर रहते हार गये, और विपक्ष की सरकार बन गई तो उनके घोटालों के गढ़े मुर्दे उखाड़े गये। उन पर मुकदमा दायर किया गया। तत्काल उनके खिलाफ फैसला हो गया। उन्हें 10 साल कैद की सजा सुना दी गई। उनकी सरकार होती, तो वे अपने को बचा लेते। आज उनकी ही पार्टी के लोग उनसे मिलने नहीं आते हैं। सत्ता के साथ मिलकर वो भी उनकी राजनैतिक हत्या करना चाहते हैं।

मगर ऐसे में सुशीला ने आत्मकथा लिखने की प्रेरणा देकर उनमें नई जान फूंक दी है. वे अपने आत्मकथा लिखने के लिए अब बेताब हैं. हालांकि लेखक के किटाणु उनमें मौजूद नहीं हैं। मगर क्या हुआ? केवल आत्मकथा का वर्णन तो करना है। कहाँ भाषा में चार चांद लगाना है। जब आत्मकथा पूरी हो जायेगी। जेल से जब छुटूंगा तब किसी बहुत बड़े प्रकाशक से छपवाउंगा. वो भी हजारों प्रतियों में. फिर एक भव्य समारोह में इसका विमोचन करवाऊंगा. प्रदेश के नामचीन लेखकों को बुलाऊंगा. उसकी समीक्षा करवा के यह सिद्ध करवाऊंगा कि आत्मकथा से यह लगता है कि मुझे घोटाले में झूठा फंसाया गया। उन सारे आलोचकों का मुँह बंद करवा दूंगा। हर आलोचक को खरीदकर उससे तारीफ की पुल बंधवाऊंगा.

उन्होंने अपने मंत्री काल में अच्छे-अच्छे हरिशचन्द्र को खरीद लिया था, तब आलोचक किस खेत की मूली हैं। आखिर खरीदने की कला में वे सिद्धहस्त खिलाड़ी रहे हैं। एक बार जब सरकार पर खतरा मंडरा रहा था, सरकार के गिरने की पूरी संभावना लग रही थी, तब मुख्यमंत्री जी ने उनसे गृहमंत्री होने के नाते कहा था कि किसी तरह सरकार को बचाओ. तब विरोधी विधायकों को खरीदने हेतु करोड़ों रुपये खर्च किये थे। उन करोड़ों को निकालने के लिए ही करोड़ों का घपला किया था। उसी का परिणाम मिला था कि उन पर एफ.आई. आर. दर्ज हो गई। मुकद्मा चला और फैसला उनके खिलाफ चला गया. उन्हें 10 साल की सजा हो गई।

‘‘सर ये कागज।’’ पुलिस वाला आवाज देकर कागज दे रहा था, तब वे अतीत से वर्तमान में लौटे। हाथ में कागज लेकर विश्वनाथ बोले- ‘‘एक रीम कागज मंगवाया था, केवल चार कागज लेकर आया।’’

‘‘साहब ने केवल चार कागज दिये.’’ अपनी सफाई देते हुए सिपाही बोला.

‘‘चार कागजµ चार कागज से क्या होगा? बहुत बड़ा ग्रंथ लिखना है मुझे।’’

‘‘साहब ने कहा है- ये कागज पूरे हो जाए, फिर नये देंगे।’’

‘‘मतलब यह है कि मैं बार-बार तुमसे कागज की भीख मांगता रहूंगा।’’

‘‘साहब ने जैसा कहा, वैसा मैंने किया है?’’

‘‘आज मैं मंत्री पद पर होता तो कागज से तुझे तोल देता. जाओ मेरे लिए पूरी एक रीम कागज लेकर आओ. पैसे मुझसे ले जाओ.’’ विश्वनाथ ने आदेश देते हुए कहा।

‘‘आईएम सॉसी सर, मैं आदेश से बंधा हुआ है।’’ पुलिस वाले ने जब यह कहा तब विश्वनाथ तिलमिलाकर बोले- ‘‘ए ज्यादा कानून मत दिखा मुझे-मुझे पूरी रीम कागज लाकर दे. इस समय मेरे भीतर का लेखक बाहर आने के लिए मचल रहा है।’’

‘‘सर, मैं पहले ही कह चुका हूं कि मजबूर हूं।’’

‘‘ठीक है. तू मजबूर है तो संभाल अपने कागज. मुझे नहीं लिखनी अपनी आत्मकथा.’’ कहकर विश्वनाथ ने कागज के टुकड़े करके पुलिस के मुँह पर फेंक दिये। पुलिस वाला व्यंग्य से मुस्काता हुआ चला गया।

--


संपर्कः शीतला माता गली, जावरा

जिला- रतलाम म.प्र. 457226

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.