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प्राची अक्टूबर 2018 : कहानी // कलियुगी औलाद // सुबोध सिंह ‘शिवगीत’

 

कहानी

कलियुगी औलाद

सुबोध सिंह ‘शिवगीत’

"गिरी जी अवकाश लेने के बाद कहाँ रहना पसन्द करेंगे"- पूछा था बड़ा बाबू ने।

प्रत्युत्तर में बोले थे गिरी जी, "यहीं हजारीबाग में। जीवन के चालीस साल जहाँ गुजार चुका हूँ, उस जगह को छोड़कर अब कहाँ जा सकता हूँ बड़े बाबू?”

गिरी जी को याद है, गिरिडीह के बिरनी प्रखंड पोस्ट ऑफिस से अपनी नौकरी की शुरुआत की थी उन्होंने। तब शादी भी नहीं हुई थी। शादी तो चार साल बाद हुई थी और शादी के साथ ही तबादला हो गया था। हजारीबाग का शायद ही कोई प्रखंड या अनुमंडल मुख्यालय होगा, जहाँ गिरी जी नहीं रहे हों। हजारीबाग के चप्पे-चप्पे से वाकिफ गिरी जी ने पूरी सामाजिकता का जाल बुन रखा था। जिसे वे निभाते भी रहे थे। छुट्टी मिले न मिले, गिरी जी अपने परिचितों से प्राप्त किसी निमंत्रण को छोड़ते नहीं थे। खासकर बेटी-बेटा की शादी-मरनी का तो कोई आमंत्रण भूल कर भी नहीं भूलते थे।

भूलते भी कैसे, उनके द्वारा बुने गये रिश्तों का जाल इतना सघन था कि उसमें पूरा का पूरा परिवार ही जुड़ा रहता था। गिरी जी सब किसी से दोस्ती नहीं करते, पर करते, तो उसके परिवार के एक-एक सदस्य से जुड़ जाते। पत्नी, बच्चे, माता, पिता सभी से जुड़ाव। ऐसे में होता यह कि हर छोटे-बड़े सुख-दुःख में लोग, गिरी जी को याद करते और गिरी जी हाजिर। हाजिर भी कोई देह से नहीं, पूरे मन-वचन कर्म के साथ। गिरी जी की उपस्थिति मात्र से माहौल बन जाता था। जिस परिवार के सुख या दुःख के जिस काम में खड़े हो गये, तो समझो परिवार वालों का एक बड़ा बोझ हल्का हो गया। स्वभाव भी ऐसा कि हर काम हँस-हँस कर, हर बात हँस-हँस कर, बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ वयस्क हर उम्र और आदमी के साथ सोलह आने फिट।

गिरी जी के भीतर का यह स्वभाव उनके गँवई परिवेश की उपज था। साल में कई-कई बार गाँव आते जाते रहते थे। गाँव में बूढ़े माता-पिता की सेवा-टहल की मुकम्मल व्यवस्था थी। कभी जाकर तो कभी शहर से ही चलते-फिरते करते रहते थे। हालाँकि गाँव में अन्य भाइयों के साथ माता-पिता सुखी थे, फिर भी उन्हें कोई कष्ट न हो, इसका खयाल गिरी जी को हमेशा रहता था। बूढ़ी माँ के लिए किशमिश, बाबूजी के लिए हॉर्लिक्स-बिस्किट, जाड़े में गर्म कपड़े, मपॅQलर, चप्पल, खासकर माँ को हुक्के के लिए तम्बाकू खरीदते, ले जाते, या फिर किसी गाड़ी वाले के माध्यम से भिजवाते रहते थे।

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गिरी जी के पास बहुत पैसा था, ऐसी बात नहीं थी। व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त रखते थे। अपनी सीमित आय में ही परिवार को सुख और प्रेम से गिरी जी ने रखा था। रहे तो जीवन भर किराए के ही मकान में, पर अपने घर के लिए गिरी जी को कभी मचलते भी नहीं देखा गया।

कोई भी खुश रहेगा, ऐसे जिन्दादिल आदमी का साथ पाकर। घर में पत्नी और मात्र दो बेटे थे- राजीव और संजय. जिनके बारे में लड़कपन से जवानी तक किसी को शिकायत का अवसर न मिला। पत्नी भी ग्रामीण संस्कारों वाली सरल-सहज महिला थी। शहर आकर बसने वाली अन्य महिलाओं की तरह न कोई ताम-झाम, न दिखावा और न शृंगार-फैशन! बस, हर पल अपनी छोटी-सी गृहस्थी और पति के बनाए रिश्तों में खुशहाल।

बड़े बेटे की नौकरी और नई बहू के आगमन ने घर की खुशी को और बढ़ा दिया था. सामाजिकता के साथ-साथ अब गिरी जी का मन घर पर भी और बढ़-चढ़ कर लगने लगा था। नई बहू के आगमन से कमरों की कमी का अहसास तो हुआ था, पर समय और परिस्थिति तथा भविष्य पर विचार कर इस कमी को टाल दिया गया। जब कभी पत्नी ‘अपना घर’ का राग छेड़तीं तो गिरी जी अपने गाँव वाले घर की खासियतों को गिनाकर चुप करवा देते, या फिर रिटायरमेंट के वक्त मिलने वाले रुपयों के सब्जबाग में अपने घर की भी एक झलक दिखा देते। पत्नी तो सहज हृदय से खुश हो जाती, पर बच्चों के प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते।

बड़े बेटे की शादी के बाद यह ‘अपना घर’ वाला सवाल थोड़ा तेज होता गया। आखिरकार लोन लेकर गिरी जी ने आस-पास अपने सहकर्मी पाण्डे जी के साथ-साथ मिलकर दो-दो कट्ठे के दो प्लाट अपने-अपने नाम लिखवा ही लिये। जमीन परिचित की थी, सस्ते में पड़ी। जमीन रजिस्ट्री के कुछ ही दिन बाद निकटतम तिथि को उसमें भूमि पूजन भी गिरी जी और पाण्डेय जी ने साथ-साथ किया। दोनों परिवारों ने अपने तमाम मित्र-हितैषियों के साथ नींव लेने की खुशी मनाई और तय हुआ कि इस पर निर्माण कार्य होगा साल भर बाद, रिटायर हो जाने पर। गिरी जी की पत्नी का चेहरा, जो पति के साथ गाँठ जोड़ कर नींव लेने के दिन दमक रहा था, वैसी खुशी शायद ही किसी किसी के चेहरे पर देखने को मिलती है। घूँघट काढ़े गिरी जी की पत्नी उम्र की दृष्टि से प्रौढ़ा होकर भी किसी नई नवेली दुल्हन से जरा भी कम नहीं लग रही थीं।

पर वाह रे दुर्भाग्य! नींव लेने के दिन इतनी खुश वह महिला, दूसरे ही महीने अचानक ही एक बीमारी से चल बसीं और सारे सपने किराए के ही मकान में जस के तस धरे रह गए। गिरी जी पर तो मानो आफत का पहाड़ टूट पड़ा। घर गृहस्थी की बारीकियों से अनभिज्ञ एक नई नवेली दुल्हन के रूप में बहू के भरोसे क्या क्या किया जा सकता था? गिरी जी तो मानो एक दम टूट से गए। महीनों कार्यालय से घर और घर से कार्यालय के अतिरिक्त कहीं किसी के पास नहीं गए गिरी जी। हाँ इस समय उनकी सामाजिकता का बल दिखा। हर रोज कोई न कोई परिचित-मित्र गिरी जी के पास जरूर आता और दिलासा देता देखा जाता।

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इन्हीं संकटग्रस्त क्षणों में साल गुजर गया, गिरी जी रिटायर हो गए। गिरी जी का हँसता-खिलखिलाता चेहरा झुर्रियों से भर गया। हालाँकि उनकी सामाजिकता में कोई खास कमी नहीं आई पर वह खिलखिलाहट, वह संजीदगी, वह जिंदादिली अब दूर-दूर तक नजर नहीं आती थी, जिसके लिए शहर भर में वे पहचाने जाते थे।

गिरी जी को रह-रह कर पत्नी के द्वारा भूमि पूजन के दिन कहे गये वाक्य याद आते- "क्या जी, हमलोगों का भी सपना आखिर पूरा हो ही गया न। गाँव छोड़कर शहर में नहीं बसने की आप अपनी जिद से आखिर हार ही गए न। चलिए, किसी की नजर नहीं लगे, अब शुरू किए हैं, तो जल्दी से जल्दी भगवान इसे पूरा भी करेंगे।”

गिरी जी जब कभी खाली या अकेले में होते- पत्नी का भूमि पूजन के दिन वाला चेहरा, भूमि पूजन के दिन के एक-एक क्रियाकलाप, एलबम की तरह खुली आँखों के सामने घूमने लगते और लगने लगता कि पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए घर जल्दी से पूरा कर लेना चाहिए।

बेटों ने भी साथ दिया। धन तो लगाने की स्थिति में कोई था नहीं, हाँ तन और मन से कोई कमी नहीं की। गिरी जी ने गृह निर्माण का कार्य काफी जोर-शोर से आरंभ करवा दिया। जरूरत का खयाल रखते हुए चार कमरों का घर बनने लगा। बड़ा बेटा सुबह शाम आता और आवश्यक सलाह देकर चला जाता- "बाबूजी बाथरूम दो तो होने ही चाहिए- एक अन्दर वाले दो कमरों के लिए और एक खास आपके कमरे और उससे सटे चौथे कमरे के लिए। हाँ, आपके कमरे के साथ एक छोटा बरामदा निकल जाता तो अच्छा था।”

छोटा बेटा संजय आता-जाता तो कम था, पर सलाह देने में पीछे नहीं रहता- "बाबूजी बाथरूम में और किचेन में टाइल्स तो लगना ही चाहिए। और हाँ! ज्यादा पैसा खर्च मत कीजिएगा, चौराहे पर हमने एक दुकान खोलना तय कर लिया है। अब और दिन बेकार बैठना ठीक नहीं। ऊपर से घर का काम समाप्त होने के साथ आपको भी तो इंगेजमेंट चाहिए न। कभी आप बैठिएगा, कभी हम, दुकान का काफी स्कोप है। इस इलाके में दवा दुकान एक भी नहीं है। जल्दी ही जमा लेंगे।”

रिटायरमेंट का पैसा था ही, गिरी जी फुरसत में थे ही, पत्नी की अंतिम इच्छा का जज्बा ‘जोरन’ की तरह काम को रफ्तार देता रहा। देखते ही देखते घर और दुकान दोनों तैयार हो गए। बड़े बेटे को नौकरी मिल गयी थी तो घर की चिंता में उसने भी साथ दिया। छोटे बेटे ने दवा दुकान आंरभ करने में श्रम लगाया। बगैर किसी ताम-झाम के बड़े ही सीधे-सादे तौर तरीके से बारी-बारी से घर और दुकान दोनों का पूजन हो गया। पांडेयजी ने भी अपने अधूरे घर की पूजा उसी तिथि में कर दी।

धीरे-धीरे गिरी जी की गृहस्थी नये घर में बसने लगी। आस-पास में अभी बहुत सारे घर नहीं बने थे। फिर भी इक्के-दुक्के जो भी घर पास-पड़ोस में थे, गिरी जी का सबके साथ हेल-मेल हो गया। वैसे भी नया घर पुराने डेरे से बहुत दूर नहीं था। और फिर अब तो गिरी जी को नई व्यस्तता भी मिल गई थी। सुबह-सुबह चौराहे पर जाना, दवा दुकान खोलना, दोपहर में खाना खाने घर आना, पुनः चार बजे दुकान जाना और रात के करीब 9 बजे हिसाब-किताब मिलाकर घर वापस लौटना। हालाँकि छोटा बेटा संजय बार-बार कहता था- "बाबूजी सुबह दुकान खोलने के लिए आपका आना तो ठीक है, पर दोबारा शाम में बेकार आते हैं।”

"क्यों...?”

"बाबूजी! शाम को हिसाब-किताब करने में देर होती है। आप उतनी देर बैठते हैं, सो ठीक नहीं लगता। और फिर उस समय हमारे दोस्त-यार लोग भी आ जाते हैं, जिन्हें आपका यहाँ बैठे रहना ठीक नहीं लगता। फिर हम हिसाब करके तो पैसा रात में घर पर आपको दे ही देंगे। इसके लिए यहाँ बैठना जरूरी थोड़े ही है?”

गिरी जी को भी बेटे की बात धीरे-धीरे जँचने लगी। थे तो आखिर रिटायर ही न। राहत से जीना किसे अच्छा नहीं लगेगा। ऊपर से ठहरे सामाजिक आदमी। शाम के बचे समय का पुनः नये सिरे से दोस्तों के साथ मिलने-जुलने, गप-सड़ाके में इस्तेमाल करने लगे।

कुछ दिनों में छोटे बेटे ने दुकान की तमाम मिल्कियत पर अपना कब्जा जमा लिया। गिरी जी सुबह-सुबह सिर्फ दुकान का शटर उठाने, साफ-सफाई करने, अगरबत्ती जलाने भर के काम के लायक रह गये। नौ-दस बजते, ठीक दुकानदारी का समय होते ही बेटा कहता, "बाबूजी, अब आप घर के लिए निकलिये. वहां आराम कीजिएगा। यहाँ भीड़-भाड़ में बेंच पर कितनी देर बैठे रहिएगा। वहाँ भाभीजी अकेली ऊबती रहती हैं।”

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बेटे को अब गिरी जी की दुकान में थोड़ी देर की भी मौजूदगी शायद नागवार गुजरले लगी थी।

गिरी जी इतने भी भोले नहीं थे। चालीस वर्षों तक पब्लिक डीलिंग ही करते रहे थे। खैर धीरे-धीरे दुकान कम, घर पर ही अधिक रहने लगे। यहाँ बेटे के बैंक जाने तक तो घर में चहल-पहल रहती थी, पर बेटे के बैंक जाने के साथ सन्नाटा पसर जाता था। कभी-कभी तो गिरी जी, घर पर ही अपने कमरे में बैठे दिन काटते, टी.वी., मैगजिन या अखबार से टाइम पास करते। बाकी तीसरे पहर शहर के परिचितों के पास या फिर ऑफिस के आस-पास।

पर यह सिलसिला भी स्थाई नहीं हो सका। समय काटना कठिन होने लगा। एक ही आदमी के पास, या एक ही ऑफिस में, बिना काम के कितनी देर, कितनी बार जाया जा सकता है। हालाँकि परिचित कर्मचारी तो कहते थे- "गिरी जी आपके आने पर बहुत अच्छा लगता है।”

पर यह सब कभी-कभी ही ठीक लगता है। ड्यूटी करते हुए, ड्यूटी की तरह नहीं।

नये परिवेश और परिस्थितियों में गिरी जी का मन ऊबने लगा था। बहू ने मन न लगने का बहाना बनाकर अपनी छोटी बहन को पढ़ने के नाम पर अपने पास बुला लिया था। खाली समय में दोनों बहनें गप्पे मारतीं, टी.वी. देखतीं या फिर- "बाबूजी, घर पर ही रहिएगा न, आ रही हूँ थोड़ी देर में बाजार से.” कह कर कभी-कभी निकल जातीं तो गिरी जी को घंटों घर पर अकेले भूत जैसा रहना पड़ता। ऐसे पलों में पत्नी की खूब याद आती- ‘जाने किस जनम का बदला लिया है? अकेले छोड़ कर चली गयी? अभी साथ होती, तो रिटायरमेंट ऐसा पहाड़ जैसा नहीं लगता। और न बच्चे इतने बेरूखे बनते। सब के सब अपने में व्यस्त हैं। बाबूजी बस काम के लिए याद आते हैं इन्हें।”

एक दिन रात को दोनों बेटों और बहू की उपस्थिति में गिरी जी ने अन्यमनस्क भाव से कहा था- "सोचते हैं, कुछ दिन के लिए गाँव चले जायें। यहाँ बैठे-बैठे मन नहीं लगता है।”

गिरी जी का इतना कहना था कि दोनों बेटों, और बहू ने भी एक स्वर में कहा- "जी बाबूजी, बहुत बढ़िया रहेगा। वहाँ भी तो बहुत सारा काम है, जो बिगड़ रहा है. आप रहिएगा तो सब ठीक-ठाक हो जाएगा। यहाँ भी तो आप बैठे ही रहते हैं। वहाँ मन भी लगेगा और गाँव-घर, फसल सब देख आइएगा।”

गिरी जी को लगा था, जैसे सब के सब उनके इस निर्णय की प्रतीक्षा में थे।

गिरी जी दूसरे ही दिन गाँव के लिए रवाना हो गए। बड़े बेटे ने बैंक जाते समय प्रसन्नता के साथ उन्हें बस स्टैण्ड छोड़ा था। चलते-चलते कह रखा था- "बाबूजी, आइएगा तो कुछ चावल-दाल लेते आइएगा। घर पर आखिर अपना हिस्सा छोड़ने से क्या फायदा। सब तो बेकार ही जा रहा है।”

गाँव पहुँचने के साथ ही गिरी जी रम गये थे गँवई माहौल में। भाई-भतीजों के साथ-साथ गाँव-गोतिया के लोगों ने बढ़-चढ़कर इज्जत मान दिया था और देखते ही देखते दूरा-दालान, खेत-खलिहान के बीच कई महीने गुजर गए, पल की तरह। बीच-बीच में दोनों बेटों का फोन आता रहा। चावल-दाल का तकादा भी हुआ।

छोटे भाई ने दो बोरियों में चावल, दाल आदि बाँधकर दे दिया। गिरी जी की जिद पर एक दिन बस में भी बिठा आया। इस प्रकार पुनः गिरी जी आ गए शहर।

घर पर सिर्फ बहू थी। गिरी जी को आया देख आव-भगत में कोई कमी नहीं की। पर उसका चेहरा थोड़ा उड़ा हुआ था। गिरी जी को भाँपते देर न लगी कि उनके कमरे में कोई ठहरा हुआ है। चट से पूछ ही दिया- "मेरे कमरे में कौन आया हुआ है?”

"कोई आया नहीं हैं बाबूजी, इनके दोस्त हैं। तत्काल डेरा नहीं मिल रहा था, सो आपके नहीं रहने के कारण खाली देख, इन्होंने शर्माजी को कुछ दिनों के लिए रहने खातिर दे दिया है।”

"रहने की खातिर दे दिया है?... मेरा कमरा...?” आश्चर्य से आँखें फैल गई थीं उनकी। "दे नहीं दिया है, बस जितनी जल्दी डेरा मिल जाए, खाली कर देंगे. अच्छे लोग हैं, आप नहीं थे न, घर सूना-सूना लगता था।”

"सूना-सूना लग रहा था? मतलब...?” बहू ने कोई जवाब नहीं दिया, पर गिरी जी को गुस्सा आ रहा था। फिर भी बेचारे चुप रह गये कि अब बहू से क्या, बेटों से पूछा जाएगा।

रात में दोनों बेटों के आने पर फिर वही चर्चा चली- "जल्दी ही खाली कर देंगे। अच्छे आदमी हैं।”

गिरी जी के लिए बीच के हॉल में एक फोल्डिंग लगाई गई। गिरी जी ने काफी असहज भाव से रात गुजारी। रात गुजारी क्या, रात भर क्रोध में करवट बदलते रहे। कभी बहू की बात- "कुछ दिनों के लिए रहने दे दिया है.” कभी बेटों की बात- "जल्दी ही खाली कर देंगे, अच्छे आदमी हैं।” सारी रात घुमड़ते रहे थे।

गिरी जी मन ही मन बड़बड़ाते रहे थे- "अच्छे लोग थे, दोस्त थे, तो बेटों ने अपना कमरा क्यों नहीं दे दिया? कभी पत्नी की बातें याद आने लगती- बेचारी अभी होती तो बेटे ऐसा निर्णय कभी नहीं ले पाते। बताओ! सारी जिन्दगी की जमा पूँजी लगाकर ‘अपना घर’ क्या इस बरामदे (हॉल) पर सोने के लिए बनाया था। बेटों को इतना भी सऊर नहीं है कि बाप का कमरा है, किसी को रहने के लिए दे रहे हैं तो एक बार बाप से कम से कम पूछ तो लें। अरे मैं तो गाँव ही गया था, मरा तो नहीं था। ये लोग घर को किधर ले जाना चाहते हैं, पता नहीं।”

कुछ इसी तरह की मनोदशा में गिरी जी ने सप्ताह गुजारा। दिन का ज्यादा समय शहर-बाजार-ऑफिस या फिर बगल में पाण्डेय जी के पास गुजार लेते। अपने घर आते ही असहज सा महसूस होने लगता। अपने कमरे की बात और थी, यहाँ हॉल में खुद को रेलवे स्टेशन पर रात गुजारने वाले यात्री सा अनुभव करते-करते कुढ़न सी लगने लगती। रात बेचैनियों में कटती। सौ किस्म के जंजाल रात को सहज नहीं रहने देते। गिरी जी के इस दर्द को करीब से समझ रहे थे तो बस-बगल वाले पाण्डेयजी, जो अब अवकाश प्राप्ति के बाद ज्यादातर घर पर ही रहने लगे थे। गिरी जी दिन के अधिकांश वख्त उन्हीं के साथ होते थे।

आठवें रोज गिरी जी ने सुबह-सुबह दोनों बेटों को अपने पास बुलाया और कहा- "देखो हम आज पुनः गाँव जाना चाह रहे हैं। यहाँ न तो मेरा मन लग रहा है और न मेरे रहने लायक पोजीशन है।”

"क्या दिक्कत हुई बाबूजी?” पूछा था बड़े बेटे ने।

"देखो, बनो मत। मेरा कमरा जब तक खाली नहीं होता, मेरे लिए यहाँ टिकना संभव नहीं है।”

"बाबूजी उस कमरे के बगैर भी तो, आपको किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं हुई। यहाँ हॉल में भी तो आप कितने आराम से रह रहे हैं।”

दही में चीनी मिलाते हुए छोटे बेटे ने भी पिताजी से कहा- "बल्कि बाबूजी का हॉल में रहना ज्यादा अच्छा लग रहा है। घर में चहल-पहल लगती है। ऊपर से घर में दो हजार रुपये की आमदनी भी तो हो रही है। यह क्या अच्छा नहीं लग रहा है?”

"अच्छा, तो घर की कमाई, दुकान की कमाई, सबको अच्छी लग रही है, पर इस अच्छाई को हम ओढ़ या बिछा तो नहीं सकते हैं न। उसके लिए तो मुझे मेरा कमरा ही चाहिए न!य्

गिरी जी की इन बातों से दोनों बेटे सहम गए। बहू बीच-बचाव के अंदाज में बोली- "बाबूजी ठीक ही तो कहते हैं। इनका कमरा जल्दी खाली होना चाहिए। बाबूजी, आप अभी गाँव जा ही रहे हैं. अब की जब भी लौटिएगा, आपको कमरा खाली मिलेगा।”

"वही तो एक रूम एक्सट्रा है। उसके बगैर घर का काम नहीं चल सकता। उसी से तो बाबूजी सहित आए-गए सबका काम चलता है।” छोटे बेटे ने कहा।

बड़े बेटे ने औपचारिकता सी निभाई, "ठीक है भाई, अभी बाबूजी को गाँव जाने दिया जाय। आयेंगे तब देखा जाएगा।”

"देखा जाएगा नहीं, खाली रहना चाहिए।” गिरी जी का तल्ख लहजा।

"जी खाली रहेगा, आप ज्यादा लोड मत लीजिए।”

खैर, इन तमाम खुला-खुली बातों के बाद गिरी जी गाँव लौट गये। आषाढ़ का महीना था। गाँव में धानरोपनी चल रही थी। गिरी जी भी धानखेती और रोपनी के गीतों में ऐसा उलझे कि पूरा बरसात लगभग गाँव में ही कट गया।

शहर बाजार से रुपया कमा कर लौटे लोगों का गाँव में अलग ही रुतबा हुआ करता है। सिर्फ खेती-किसानी पर पल रहे लोगों की पांत में इन्हें हंस का दर्जा मिलता है। चार रुपया खर्च करने वालों को सम्मान और साथियों की कमी नहीं रहती। गिरी जी तो चीज भी कुछ अलग ही थे। फिर कहना क्या? चार गाँव के लोगों से मेल-जोल बढ़ा चुके थे। दिन भर कहीं न कहीं व्यस्त रहते। सुबह-शाम भाई भतीजे गिरी जी को हथेली पर बिठाए रहते। गिरी जी की ओर से गाँववाले घर में हजार पाँच सौ रुपये का अतिरिक्त व्यय होने की वजह से दालान में एक नई चमक लौट आई थी। गाँव-पड़ोस के दो एक लोग दरवाजे पर आते-जाते रहते। यह घर के तमाम लोगों को अच्छा लगता था। गिरी जी के गाँव आगमन के बाद से परिवार की बढ़ी हुई प्रतिष्ठा को देखते हुए गिरी जी के एक भतीजे ने खुद को आगामी चुनाव के लिए मुखिया का उम्मीदवार तक घोषित कर दिया था।

बरसात बीतते ही गिरी जी का मन पुनः हजारीबाग लौटकर अपने मित्र-परिवार से मिलने के लिए मचलने लगा। बगल वाले पाण्डेजी के बेटे का वरिच्छा कार्यक्रम का न्यौता भी था। ‘मटवारी दुर्गा पूजा समिति’ के सदस्यों का काफी फोन आया था- "बाबा, पूजा से पहले आ ही जाइए। आपके बगैर बड़ा कष्ट हो रहा है।”

दोनों बेटों से भी कई बार फोन पर बातें हुई थी- "जी बाबूजी सब ठीक-ठाक चल रहा है."

"क्या तुम्हारे दोस्त को घर मिला ?”

"मिला तो नहीं है, पर मिल ही जाएगा।”

"नहीं नहीं..., ऐसा नहीं चलेगा. हमारे आने से पहले कमरा हमें खाली चाहिए।”

इस पर बहू ने फोन लेते हुए कहा था- "बाबूजी! आप नाहक जिद कर रहे हैं। वे लोग घर मिलते ही चले जाएँगे। आप आइए न, आपको कोई तकलीफ होगी, तब न कहिएगा। हाँ! एक बात और, अगर वे लोग हैं भी तो कुछ देकर ही हैं, जिससे घर चलाने में आपके बेटों को थोड़ी सहूलियत ही मिल रही है।”

"नहीं-नहीं ये सब ठीक बात नहीं है।”

"नहीं बाबूजी, आप समझते नहीं हैं. महंगाई काफी बढ़ी हुई है। घर गृहस्थी चलाना बड़ा कठिन हो रहा है। छोटे जी का घर पर कोई ध्यान भी नहीं है। ऐसे में सारा ‘बोदरेशन’ अकेले इनको ही उठाना पड़ता है। किराए का चार पैसा ही तो है, जो जमा हो पाता है।”

"और हम खर्च हो रहे हैं, सो?”

"बाबूजी आप ऐसा क्यों बोलते हैं, गाँव पर रहना, मन लगना, कोई खर्च होना है? गाँव से चाचा आए थे तो कह रहे थे, आप वहाँ काफी खुश रहते हैं। वैसे भी आप तो अब अधिक वहीं रहना चाहते हैं। ऐसे में एक बंधी बंधाई आय को बंद करके घर खाली करवाना कौन सी समझदारी है। छोड़िए! आप आइए, आपको यह सब अब लोड नहीं लेना है। हमारी जवाबदेही है।”

बहू-बेटे से हुए इस टेलिफोनिक वार्तालाप ने गिरी जी को चिंता में डाल दिया था। एक ने घर पर, दूसरे ने दुकान पर अपना अधिकार मान लिया था। लाभ-हानि का पाठ पढ़ाया जा रहा था उन्हें।

युग की कौन सी बयार चली हुई है, कहा नहीं जा सकता।

"खैर चलते हैं। देखते हैं, क्या होता है।” सोचा था उन्होंने।

फिर से गिरी जी के लिए सोने की वही जगह। फर्क इतना था कि इस बार हॉल में फोल्डिंग की जगह दीवान, एक तीन फुट का गोदरेज और हॉल में ही टी.वी. लगा हुआ था। अब गिरी जी के लिए यही स्थान फाइनल हो गया था, जिसे गिरी जी का स्वाभिमान स्वीकारने के लिए कतई तैयार नहीं था।

इस बार गिरी जी लगभग एक महीने, अर्थात भर दशहरा हजारीबाग में रहे, पर सब काम करते हुए भी काफी गंभीर और असहज महसूस करते रहे। मानो, कोई बड़ा निर्णय लेने की उलझन में हों।

और आखिरकार वह निर्णय सामने आ ही गया। पांडेय जी से यह बात करने में गिरी जी को सप्ताह भर का समय लगा- "पांडेयजी आप मान जाइए, जितनी लागत है उससे दो लाख कम दीजिए, पर मकान आप लिखवा ही लीजिए. अन्यथा..."

"नहीं, नहीं, गिरी जी, गुस्सा कभी स्थाई नहीं होता। आज है, कल मिट जाएगा, तब फिर आप ही को बहुत बुरा लगेगा। बेचारे बच्चे हैं."

"नहीं पाण्डेय जी, बच्चे नहीं हैं, आज के नये वयस्क हैं, जो रातोंरात बड़े-बूढ़ों के कान काटने पर अड़े हुए हैं। इन्हें इनकी औकात का ज्ञान करवाना जरूरी है। वर्ना इस आग में अनगिनत घर जलेंगे। अनगिनत गिरी रोएंगे। आखिर इस दानव से किसी न किसी को तो लड़ना ही होगा।”

"नहीं, हम इस बात को कतई नहीं मानेंगे. जिन बच्चों को अपने हाथ से पाल-पोसकर बड़ा किया, लायक बनाया, उनके साथ यह व्यवहार हमसे नहीं होगा."

"पांडेय जी, आप झूठ-मूठ की संवेदना में पड़ रहे हैं। मेरे मरने के बाद यह पैसा इन्हीं को मिलेगा. यह मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ। पर इन्हें इनकी हकीकत का ज्ञान यदि हम जैसा बाप नहीं कराएगा, तो क्या कोई जर्जर, बूढ़ा, पेड़ से कटा हुआ बाप कराएगा। रिटायर होने से क्या गिरी इतना कमजोर हो गया है? नहीं-नहीं पांडेय जी गिरी अपने गाँव घर-जवार से अभी पूरी तरह जुड़ा हुआ है। मैं कोई कोरा शहरी बाबू नहीं हूँ। पूरा गाँव सर पर उठाने को तैयार है। ये छोकरे हमें समझते क्या हैं। और फिर मैं तो आपको कह ही रहा हूँ कि इन्हें साल भर तक कानों कान पता नहीं चलना चाहिए। दो साल तक मेरे पैसे से इन्हें इसी घर में रहने भी देना है। आगे भी चाहें तो किराया देकर, आपसे समझौता करके, आपको बाप का दर्जा देकर किराएदार की तरह लम्बे समय तक बने रह सकते हैं।”

"नहीं गिरी जी! और इतना पैसा तुरंत में मैं लाऊँगा कहाँ से?”

"अरे पाण्डेय जी, रिटायरमेंट का पैसा अभी भी आपके पास है। (मुस्कुराते हुए) कोई जाने न जाने, गिरी जानता है। और फिर थोड़ा बहुत घटेगा भी तो अभी-अभी आपने बेटे की शादी तय की है। बेटा बैंक पी.ओ. है..।”

"सो तो हो जाएगा, मगर दुनिया क्या कहेगी? हमारी दोस्ती पर..."

"दोस्ती की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी कि दोस्त ने दोस्त की प्राण रक्षा की। आप तो जानते हैं कि मेरे पास इस घर के सिवा और कोई नगद नारायण नहीं है। शायद इन्हीं रुपयों के बल पर गाँव में अपने परिवार के साथ दस-बीस साल जी लूँ। बैंक ब्याज मेरा, फिर तो बता ही दिया, मूलधन इनको ही छोड़ कर मरूँगा।”

"चलिए तो ठीक है, आप जैसा चाहते हैं, वैसा ही होगा."

गिरी जी ने पचीस लाख रुपयों में अपना मकान पाण्डेय जी को बेच दिया। चार हजार महीना के हिसाब से दो साल का किराया एक लाख, उन्हीं के पास जमा छोड़ दिया। इस शर्त के साथ कि साल भर बाद इन्हें घर बिकने की बात बतानी है, और एक साल और बाप के ही पैसे पर रहने भी देना है। बाकी का व्यवहार सहृदय मकान मालिक की तरह करना है।

घर की गुपचुप रजिस्ट्री से पहले वाली रात को गिरी जी ने खुद से, रात-भर लड़ाई की थी। पत्नी का मासूम चेहरा रात भर आ-जा कर समझाने में लगा रहा था। पर मरता क्या न करता। स्वाभिमान और युग पर इस बदचलनी के बढ़ते प्रभाव को सबक सिखाने की बेचैनी ने गिरी जी को काफी संबल प्रदान किया था।

दूसरे दिन निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार रजिस्ट्री हुई, गिरी जी ने अपने दो खातों में चौबीस लाख जमा किये और सीधे बस स्टैण्ड से घर के लिए रवाना हो गए।

बस पर बैठने के बाद गिरी जी ने बहू को फोन पर घर जाने की सूचना भी दे दी।

"जी बाबूजी!” कह कर बहू ने प्रणाम भी किया, पर घर जाने का कारण तक नहीं पूछा। मानो, बाबूजी तो जंजाल थे, जो बीच-बीच में आ जाते थे। जा रहे हैं, तो अच्छा ही है।

इसके बाद जो हुआ वह तो गजब का दिलचस्प मामला है। गिरी जी ने गाँव में अब ऐलान कर दिया कि अब स्थाई रूप से यहीं रहना है। उन्हें शहर-बाजार से नाता समाप्त। दूसरे ही दिन से गोशाला रिपेयरिंग का काम आरंभ हुआ। दो फ्रिजियन नस्ल की गायें खरीदी गईं। घर में तीस किलो दूध का इंतजाम हो गया। बीस किलो पास-पड़ोस में बिक्री के लिए और दस किलो लड़के-बच्चों के खाने और ‘दूरा’-दरवाजा पर स्वागत सत्कार के लिए। बड़े भाई से माहवारी सामान मंगवाने की इजाजत ली और महीने भर का सामान घर पर स्टोर कर दिया। दोनों भतीजों की बहुएँ और पोता-पोती ने गिरी जी को तलहथ्थी पर उठा लिया।

खेती गृहस्थी से चलने वाले घर में नगद लक्ष्मी के आ जाने से जो रौनक आनी चाहिए- गिरी जी के घर में नजर आने लगी। दरवाजे पर अच्छी कुर्सियाँ, नई चौकी आदि लगाई गई। सामने का पक्का दरवाजा दुरुस्त किया गया। खेती के लायक नये अच्छे बैल खरीदे गए। साल लगते-लगते गाँव वाला उपेक्षित घर, पूरे गाँव के लिए आकर्षण का केन्द्र बन गया। दरवाजों पर चाय-पानी का इंतजाम हो, तो गाँव में बैठने-बतियाने वालों की कमी नहीं रहती।

हाँ इस बीच साल लगते देख, गिरी जी ने अपने मुस्तंडे भतीजों को हजारीबाग का सारा हाल-समाचार भी बता दिया था। और यह भी हिदायत दे रखी थी- "लुच्चे यदि मायाजाल फैलाने, रोते-बिलखते आएँ भी, तो उन पर किसी प्रकार से रहम नहीं होना चाहिए।”

साल पूरा होते ही पाण्डेय जी ने फोन पर गिरी जी से बात करने के बाद, दूसरे दिन राजीव और संजय को घर खरीदने वाली बात बता दी। फिर क्या था, दुनिया के तय नियम के अनुसार कोहराम की स्थिति बन गई। पाण्डेय जी द्वारा दिए गए रजिस्ट्री के फोटो स्टेट कागजात को तीनों ने बारी-बारी से पढ़ा। पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ, फिर साँच को आँच क्या, दोनों बेटा और बहू आ गए औकात में- "पाण्डेय चा! ये क्या हो गया, हम तो लुट गये।”

छोटे बेटे ने कहा- "चाचा आपको तो कम से कम रोकना चाहिए था ऐसा करने से।”

पाण्डेय जी ने कहा- "हम क्या करते, वो किसी को भी देने के लिए तैयार थे। हमने लाख कोशिश की, पर तुम लोग जानते हो, उनकी जिद के सामने किसी की नहीं चली है आज तक।”

"नहीं चाचा, आपको तो कम से कम हमलोगों को बताना चाहिए था। यह तो अनर्थ हो गया। हम कहाँ रहेंगे, कैसे जिएँगे, आपने नहीं सोचा?”

"सोचने वाले हम कौन होते हैं, बेटा!” पाण्डेय जी ने कहा- "सोचना तो तुम लोगों को चाहिए था कि तुम्हारे बाबूजी जिन्दगी भर जिए तुम्हारे लिए...- ‘वह कहाँ जिएँगे?, कहाँ जाएँगे..., किन-किन के साथ रहेंगे... आपने कभी सोचा भी।”

बहू ने कहा- "चाचा अब आगे क्या करना चाहिए? रास्ता, आप ही बताइए। हम तो सड़क पर आ गए।”

"बहू! यह तो उस दिन विचारना चाहिए था, जिस दिन गिरी जी को आप सबने मिल कर सड़क पर (बरामदे पर) कर दिया था। जाइए, गाँव जाइए, वहीं से शायद कोई रास्ता निकले।”

दिन-रात की सलाह और विलाप के बाद, दूसरे दिन दोनों बेटे गाँव के लिए रवाना हुए। घर पर पहुँचते ही सीधे बाबूजी पर उबल पड़े- "क्या बाबूजी, पांडेय चा क्या कह रहे हैं।”

"क्या कह रहे हैं।” गिरी जी ने शांत लहजे में पूछा।

"आपने उनको अपना घर बेच दिया?”

"हाँ, तो?”

"यह आप कैसे कर सकते हैं? पगला गये हैं क्या?”

"काहे, घर मेरा था, मैंने बेच दिया, इसमें पगलाना कैसा?”

"देखिए बाबूजी, यह आपने ठीक नहीं किया, इसका नतीजा ठीक नहीं होगा।” अभी गिरी जी कुछ बोलते कि उनके चारो भतीजे लाठी लेकर नमूदार हो चिंघाड़ उठे थे- "खबरदार जो एक शब्द भी मुँह से निकाला, नालायक कहीं के! आँख क्या दिखा रहे हो? भागते हो यहाँ से कि... दोनों की टांग तोड़कर रख दूँगा।”

मौके की नजाकत को क्षणों में ही भांपते हुए बड़े ने कहा- "छोटे भाग! लगता है, बाबूजी वह बाबूजी नहीं रहे.य"

छोटे ने कहा- "मामला गड़बड़ लगता है. बाद में देख लेंगे..."

दोनों उल्टे पैर भागने ही वाले थे कि भागते-भागते भी उनकी पीठ पर दस-पाँच लाठियाँ जड़ दी गईं. दोनों भाई जान बचाकर गाँव से भागते नजर आये।

जब तक वे नजर से ओझल नहीं हो गए- आवाज गूँजती रही. कहते रहे, "कुत्तों, जीवन भर की कमार्ह खाकर भी पेट नहीं भरा... तो हड्डी चाटने यहाँ पहुँच गए...? क्या समझा था, चाचा निरबंषिया हैं? दो मर भी गए, तो दस अभी जिंदा हैं। जिंदा... जिंदा... समझ क्या रखा है... कुल कलंकियों..."

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सम्पर्क : कदमा, हजारीबाग,

झारखण्ड-825301

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