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प्राची अक्टूबर 2018 : आलेख // गजल का दूसरा नाम गीतिका दिया नीरज ने // रमेश मनोहरा

आलेख

गजल का दूसरा नाम गीतिका दिया नीरज ने

रमेश मनोहरा

रअसल नीरज जी एक अर्से से गीत लिख रहे थे. गीत विधा में इस तरह रच-बस गये थे कि उसी में खो गये थे. हरेक पल उन्होंने गीतों को ही जिया था. गीत ही लिखना उनका प्रमुख ध्येय रहा. अतः मंचों पर भी गीतों के राजकुमार के नाम से प्रसिद्ध हुए थे. गीत ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी. जिसको उन्होंने लम्बे अंतराल तक संभाल कर रखा था. ऐसे कई गीत उनकी पुस्तकों में समाहित हैं जो आज हमें बड़ा सुकून देते हैं.

नीरज की यात्रा गीत तक ही समाप्त नहीं होती है, बल्कि गजलों में भी उनको उतनी ही ख्याति मिली, जितनी गीतों में. गजल उर्दू फारसी की एक शानदार विधा है. दो पंक्तियों अर्थात शेर में यह सम्पूर्ण होती है जो शायर कहना चाहता है. मगर यहां मैं एक बात बताना चाहता हूं कि हिन्दी में गजलें लिखने की बाढ़ दुष्यन्त कुमार के बाद आई है. हर कोई गजल लिखने की जोर आजमाईश करने लगा. मगर गजल छंद में बंधी एक कठिन विधा है. रदीफ और काफिया कह देने से ही गजल नहीं हो जाती है. मैं नीरज को दुष्यन्त से प्रभावित तो नहीं मानता हूं, मगर नीरज जी ने जितनी गजलें लिखी हैं, वे एक नई तासीर पैदा करती हैं. उनकी गजलों में दुष्यन्त कुमार की तरह उर्दू शब्दों का इस्तेमाल जरूर हुआ है. उन्होंने गजल का नाम गीतिका दिया. इन गीतिकाओं में भी उनका दर्शन आध्यात्म और वर्तमान परिवेश ही अधिक रहा. कहीं-कहीं बिंबों का सहारा लेकर अपनी बात भी कही है जो श्रोता अथवा पढ़ने वाले के दिल में बैठ जाती है. गजलें लिखने की उनकी अपनी भाषा शैली थी. यहां एक बात बता दूं, नीरज जी ने गजल को गीतिका जरूर नाम दिया, मगर यह नाम चल नहीं पाया. गजल को गजल ही रहने दिया. नीरज जी मुशायरों में भी पढ़ते थे. अतः हिन्दी उर्दू में समान रूप से अधिकार रखते थे. यही कारण है कि वे गजल लिखने में भी उनती ही महारत हासिल की जितनी गीतों में.हालात का बयान करते हुए वे कहते हैं-

खुशबू सी आ रही है इधर जाफरान की

खिड़की खुली है फिर कोई उनके मकान की

ज्यों लूट लें कहार को दुलहिन की पालकी

हालत यही है आजकल हिन्दुस्तान की


आगे प्रतीकात्मक बात को इस तरह बयान करते हुए कहते हैं कि-

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई

मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई

आप मत पूछिये क्या हम पे सफर में गुजरी

था लुटेरों का जहां गांव वही रात हुई.

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मृत्यु की परिभाषा को वे इस तरह व्यक्त करते हुए कहते हैं. वह मृत्यु की कल्पना एक धोबन से करते हैं तो शायरी के आज क्या हाल हैं, इस तरह बतलाते हैं-

दाग मुझमें है कि तुझमें यह पता तब होगा

मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह

जिसमें इंसान के दिल की न हो धड़कन नीरज

शायरी तो है वह अखबार की कतरन की तरह.


हालात कितने खराब हैं कि आदमी घर से बाहर जाने में भी डरने लगा है. क्या मालूम उसका स्वागत किस तरह से हो, तभी तो डर के अन्दाज में कहते हैं-

जब भी इस शहर के कमरे से बाहर निकला

मेरे स्वागत को हरेक जेब से खंजर निकला

क्या अजब चीज है इंसान का दिल भी नीरज

मोम निकला ये कभी तो कभी पत्थर निकला


उनके गीतों की तरह गजलों में भी आध्यात्मिक दर्शन झलकता है, आध्यात्मिक चेतना के साथ समाज की बात भी करते हैं. तभी तो कहते हैं-

समय ने जब भी अंधेरों से दोस्ती की है,

जलाकर अपना ही घर हमने रोशनी की है.


आदमी का व्यवहार कितना बदल गया है, उस पर व्यंग्य कसते हुए नीरज जी इस तरह अपनी गीतिका में कहते हैं-

बात अब करते हैं कतरे भी समन्दर की तरह

लोग ईमान बदलते हैं कैलेन्डर की तरह

कोई मंजिल न कोई राह, न मकसद कोई

ये है जनतंत्र यतीमों के मुकद्दर की तरह


ये अपनी गीतिकाओं को शृंगार व पे्रम की चौखट से मिलाकर आम-आदमी तक पहुंचने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं- उनके कहने का सूफियाना अन्दाज भी निराला था. साम्प्रदायिकता के खिलाफ हमेशा मुखर रहे. तभी तो बेबाकी से अपनी बात कहते हैं-

अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए

आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी

कोई बतलाए कहां जा के नहाया जाए.

मेरे दुःख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा

मैं रहूं भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए


आगे अपनी गीतिकाओं में नीरज कभी निराश नहीं होते हैं. वे अपनी गीतिकाओं में नवीन से नवीन प्रयोग करने में भी नहीं चूकते थे. वे जिन्दगी से निराश नहीं हैं और न ही हड़बड़ाहट में, तभी तो कहते हैं-

एक जुग बाद शबनम की सहर देखी है

देखने की न थी उम्मीद मगर देखी है

जिसमें मजहब के हर इक रोग का लिखा है इलाज

वो किताब हमने किसी रिन्द के घर देखी है.


जीवन दर्शन यदि नीरज की गीतिकाओं में न हो तो सब बेकार... उन्होंने गीतों में दर्शन को अपना प्रमुख केन्द्र बनाया. उसी तरह गीतिकाओं में भी वे अछूते नहीं रहे. देखिये उनके दर्शन की एक बानगी-

इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में

लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में

न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर

ऐसे भी लोग चले आए हैं मयखाने में


हम चांद तक पहुंच गये हैं. विज्ञान ने चांद की खोज जरूर कर दी, मगर आदमी कहां तक पहुंचेगा? इस बार आध्यात्मिक शेर देखिए-

चांद छूके चले आये हैं विज्ञान के पंख

देखना ये है कि इंसान कहां तक पहुंचे.


यहां जिन्दगी को नीरज जी ने बहुत करीब से देखा है, अतः उसकी कल्पना साधु की जटा की तरह करते हुए कहते हैं-

मुझको सुलझाने में तुम खुद ही उलझ जाओगे

जिन्दगी है मेरी साधू की जटाओं की तरह

जी हां नीरज में बहुत दोष है लेकिन फिर भी

माफ कर दो उसे बच्चों की खताओं की तरह


मृत्यु एक दिन निश्चित है, अतः आदमी उससे कितना ही सचेत रहे, दबे कदमों से निर्धारित दिन आ ही जाती है. अतः मृत्यु के बाद वे हल्का होकर जाना चाहते थे, तभी तो कहा था-

जितना कम सामान रहेगा, उतना सफर आसान रहेगा

नीरज तो कल यहां न होगा, उसका गीत विधान रहेगा.


सचमुच नीरज का बुलावा 19 जुलाई 2018 को आ गया. वे हमें छोड़कर चले गये. उनको सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब उनकी गजलों पर हम चलकर अपने जीवन में उतारें. शायद गीतिका के ये शेर उन्होंने 19 जुलाई 2018 के लिए ही लिखे थे. बानगी के तौर पर इन पंक्तियों का उल्लेख कर इस लेख को विराम देता हूं-

आएगा अपना बुलावा जिस घड़ी उस पास से

मैं कहां रह पाऊंगा और तू कहां रह जायेगा

जिन्दगी और मौत की केवल कहानी है यही

फुर्र से उड़ जाएगी चिड़िया, आशियां रह जाएगा.

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संपर्क : शीतला माता गली, जावरा,

जिला- रतलाम-457226 (म.प्र.)

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