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प्राची अक्टूबर 2018 : पुस्तक समीक्षा // अच्छे दोहों की अच्छी किताब : यह मुकाम कुछ और // समीक्षकः अशोक अंजुम

पुस्तक समीक्षा

अच्छे दोहों की अच्छी किताब :

यह मुकाम कुछ और

समीक्षकः अशोक अंजुम

शक्त दोहाकार कुंअर उदय सिंह ‘अनुज’ के दोहों की प्रथम कृति है- ‘यह मुकाम कुछ और’। पुस्तक के दोहे 35 शीर्षकों में विभाजित हैं। हिन्दी में तथाकथित दोहाकारों की आज अच्छी-खासी तादाद है। हर साल सूची में कई दोहाकार अपनी नई कृति का नामांकन करा लेते हैं। कई दोहाकार तो कई-कई सतसइयाँ लेकर बैठे हैं। लेकिन कई बार उन सतसइयों के बीच से उद्धरण के लिए कभी एक ढंग का दोहा तलाशने निकलें तो बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसे में नये दोहे का चेहरा सही मायनों में हमारे सामने रखने वाले दोहाकारों में एक नाम श्री अनुज का भी है। श्री अनुज पिछले कुछ साल से अपने दोनों के साथ अच्छी पत्र-पत्रिकाओं में दिखाई दे रहे हैं। ‘यह मुकाम कुछ और’ श्री अनुज के चुनिन्दा दोनों की पुस्तक हैं. इन दोनों में बीमार फसलें हैं, धूल सना गाँव है, माँ है, पिता हैं, बेटी है, किसान है, ललचाता बाजार है, पत्थर जैसे लोग हैं, और भी जीवन के विविध रंग हैं। कुछ दोहे द्रष्टव्य हैं-

मेरे घर बरतन नहीं, हे वचनों के वीर

कैसे रखूं संभालकर, यह वादों की खीर

प्रस्तुत दोहे में कवि ने नेताओं के आश्वासनपरक चरित्र पर तीखा प्रहार किया है। बिल्कुल यूँ जैसे कि कोई डॉक्टर ऐसे मरीज को, जिसे कि दो वक्त की रोटी नसीब नहीं हैं, फल-मेवे खाने की ताकीद करता हो।

दंगों की विभीषिका को गाहे-बगाहे अपना दंश झेलने के लिए अभिशप्त है। कवि अनुज दंगों के बाद का एक दृश्य हमारे सामने रखते हुए कहते हैं-

सन्नाटे में है शहर, सड़कें सारी मौन

चला गया है पोतकर, लहू यहाँ पर कौन

आजकल बाबाओं का बाजार बहुत गर्म है, शिष्यों-शिष्याओं को माया-मोह से दूर रहने का पाठ पढ़ाने वाले ये तथाकथित साधु-संन्यासी-बाबा जब अपने काले कारनामों के साथ नेपथ्य से खुले मंच पर आते हैं और वहाँ जब इनके वैभव के पन्ने खुलते हैं तो आश्चर्य होता है। इस संदर्भ में श्री अनुज का ये दोहा द्रष्टव्य है-

इच्छा के घोड़े उड़े, लोलुप मन लाचार

छककर पी आठों पहर, पहुँच गए हरिद्वार

कमोवेश इसी भावभूमि का शीर्षक दोहा भी देखें-

भटका अपना कारवाँ, हासिल हुआ न ठौर

जिस मुकाम पर आ गये, यह मुकाम कुछ और

इधर ‘माँ’ पर लिखना जैसे फैशन की तरह हो गया है। ‘वाचिक परम्परा के पहरुए’ तो इस विषय को हर कोण से पकड़कर श्रोताओं से दाद पाने के लिए कोई मौका चूकना नहीं चाहते। ‘माँ’ पर केन्द्रित अनुज जी के भी कुछ दोहे इस पुस्तक में हैं। देखें-

गरमी में ठण्डी हवा, जाड़े मीठी धूप

बारिश में छत-सी तने, माँ के कितने रूप

गोबर लिपटे हाथ से, माँ लीपे घर-बार

लिपा-पुता घर हँस रहा, पा अम्मा का प्यार

गांवों के बदलते चरित्र पर श्री अनुज की विशेष दृष्टि रही है। इसी के साथ एक सचेत, गम्भीर रचनाकार की तरह जीवन-जगत की विसंगतियां भी इन दोनों का वर्ण्य-विषय बनकर हमारे सामने आयी हैं। कुल मिलाकर अंत में यही कि अच्छे दोहों की अच्छी किताब के लिए श्री अनुज बधाई के पात्र है।

पुस्तक का नाम : यह मकाम कुछ और (दोहा संग्रह)

दोहाकार : कुँअर उदय सिंह ‘अनुज’

प्रकाशक : सुभद्रा पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स,

डी-48, गली-3, दयालपुर करावल नगर रोड,

दिल्ली-110094

मूल्य- 200 रुपये

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समीक्षक सम्पर्क : स्ट्रीट-2, चंद्र विहार कॉलोनी

(नगला डालचंद) अलीगढ़-202 001

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