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प्राची अक्टूबर 2018 : पुस्तक समीक्षा वार्ता का विवेक समीक्षकः सतीश शुक्ल

पुस्तक समीक्षा

वार्ता का विवेक

समीक्षकः सतीश शुक्ल

साक्षात्कार परकाया प्रवेश जैसी गूढ़ विद्या है, जिसमें साक्षात्कारकर्ता साक्षात्कारित हो रहे हैं। मनुष्य के मानस में प्रवेश करने का प्रयास करता है। उसके व्यक्तित्व के पीछे प्रगट और अप्रगट पक्षों को उजागर करने का प्रयास करता है। उससे अधिकाधिक तथ्यों को अभिव्यक्त कराने की कला ही है साक्षात्कार।

वार्ता का विवेक राकेश शर्मा की नवीनतम कृति है जिसमें उन्होंने कुछ साहित्य विभूतियों के साक्षात्कार संग्रहित किए हैं। राकेश शर्मा एक बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक हैं जो निबंधकार, कवि और सम्पादक भी हैं. उन्होंने श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य सभा की मुख पत्रिका वीणा (मासिक) के सम्पादक का कार्यभार गत कुछ वर्षों से संभाला है और उसे एक नया स्वरूप प्रदान किया है। उन्होंने बहुरंग नामक पत्रिका का भी सम्पादन भार संभाला है। अपने पुस्तकालय मंत्री के कार्यकाल में उन्होंने साहित्यकारों के मासिक रचनापाठ व साक्षात्कार की एक शृंंखला आरंभ की तथा म. प्र. से जुड़े साहित्यकारों का एकाग्र खण्ड पुस्तकालय में स्थापित किया। उनके दो काव्य संग्रह आये हैं- ‘अन्तस के स्वर’ तथा ‘स्त्री और समुद’्र। स्त्री और समुद्र पर उन्हें मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का विशेष पुरस्कार मिला है। उन्होंने कामकाजी हिन्दी के विविध रूप का सहलेखन संग्रमों (अंग्रेजी कविताओं का अनुवाद) शतनिका, व्याख्यान माला, विचार की ‘अनवरत यात्रा’ सहित 11 पत्रिकाओं व पुस्तकों का संपादन स्वदेश, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका नई दुनिया, प्रभात किरण आदि समाचार में स्तम्भ लेखन का काम किया है। उन्होंने विभिन्न अकादामिक संस्थानों में 500 से अधिक व्याख्यान दिये हैं। आप भारत सरकार की राज्य बीमा निगम में राजभाषा विभाग में सहायक निदेशक हैं।

‘वार्ता के विवेक’ में उन्होंने कुछ शीर्ष साहित्यकारों के विस्तृत साक्षात्कार संग्रहित किये हैं। रमेश चन्द्र शाह की गरीबी से जूझकर अपना साहित्यिक कद बनाने की जीजीविषा को रेखांकित करते हुए उन्होंने उनकी बतौर विज्ञान विद्यार्थी, शिक्षक और साहित्यकार के रूप में सुदीर्घ यात्रा को समेटा है। उत्तराखंड के पहाड़ों में जन्में शाह जी को पहाड़ जैसी मुसीबतों और संघर्षों का सामना करना पड़ा था। अपने स्वास्थ्य व जीविका संबंधी चुनौतियों को स्वीकार कर उनकी निरंतर बढ़ते रहने की गाथा प्रेरक है। नरेन्द्र कोहली के साथ हुए साक्षात्कार में उन्होंने उनके आरंभिक संघर्षों का कहानी को मुखरित किया है। वह कैसे पौराणिक साहित्य की ओर मुड़े और कैसे एक विख्यात लेखक बन सके। कोहली जी ने बताया कि लेखन में इन्हें छह वर्ष का समय लगा और भगवान राम के संघर्ष और रावण के साथ उनके विग्रह को एक अभियान का स्वरूप दिया। उल्लेखनीय है भगवान पर 300 से अधिक कृतियों लिखी गई हैं। इस संग्रह में लब्ध प्रतिष्ठित लेखकों के साथ जवाहर चौधरी जैसे सुस्थापित व्यंग्यकार व उपन्यासकार को भी शामिल किया है। एक व्यवसायिक प्रतिष्ठान और व्यवसाय से जुड़े चौधरी जी कैसे साहित्य की ओर मुड़े कैसे उन्होंने अपनी व्यक्तिगत त्रासदी को आत्मसात किया, जबकि उनकी पुत्री के विवाह के दिन ही उनके एकमात्र पुत्र का एक दुर्घटना में देहांत हो गया था। यह इस बात का प्रतीक है कि कैसे साहित्य मरहम का काम करता है और व्यक्ति को संबल प्रदान कर उसे टूटने से बचाता है।

इस संग्रह के अन्य सभी साक्षात्कार रोचक और प्रेरक है। न केवल शोधात्मक दृष्टि से वरन् एक पाठक की दृष्टि से यह संग्रह पठनीय है।

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संपर्क : ए-1401, पटेल हेरिटेज, सेक्टर-7,

खारघर, नवी मुम्बई- 410210

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