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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 103 // भीड़ // शशि दीपक कपूर

प्रविष्टि क्रमांक - 103

   शशि दीपक कपूर

भीड़

कैसे सब रास्ते पर इकठ्ठे हो गये, उन्हें शायद खुद भी इतना पता न हो । बस, इसने कहा, उसने सुना और सब भीड़ बनते चले गये । पता चला,  बढ़ते -बढ़ते आगे रास्ता ही बंद है। उन्हें ये मालूम न था कि सूरज पूरब से उगता है , पश्चिम में ढलता है। चंद्रमा रात को चमकता है, दिन में सूरज की रोशनी में मंद हो जाता है ।

अभी भरी दोपहर थी, सूरज की धूप सीधे सिर पर पड़ रही थी । यह कोई नहीं कह सकता था कि यहां अंधकार फैला है। मगर भीड़ अंधी होकर हवा समान एक वेग से  बह हलचल रही थी ।

एक मंच पर चढ़ चिल्ला रहा था, बाकी सब में कुछ सुन रहे थे, कुछ बतिया रहे थे, कुछ इधर-उधर बगले झांक रहे थे। मंच पर चढ़ी एक अलग भीड़ कुछ शब्दों से नीचे जमीन पर खड़ी पूरी भीड़ की मानसिकता भीड़ में बदलने की कोशिश कर रही थी।

लेकिन ये क्या ?, मंच अचानक हिलने-मचलने लगा । इससे पहले भीड़ कुछ समझ पाती, कुछ इधर दौड़े, कुछ उधर दौड़े, कुछ एकदूसरे का साथ लेकर दौड़े, कुछ हाथों में हाथ पकड़ दौड़े, बस, अब सारा मंजर दौड़ते-दौड़ते फैलता चला गया ।

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भीड़ में कोई टोपी पहने था, कोई कुर्ता-पजामा, कोई धोती तो कोई शर्ट-पैंट, बच्चे आधी चड्ढी वाले नजर आ रहे थे, औरतों ने साड़ी-ब्लाऊज और नये आधुनिक परिधान पहन रखे थे जो पीठ, कमर से नग्नता झलकती आकर्षक बन पड़ी थी। पहले तो सब भाषण कम सुन रहे थे, इनमें ही अपना भविष्य तलाश रहे थे।

यकायक भीड़ मंत्रमुग्ध होकर सारे अस्तित्व से बिखर गई, अपने अपने पैरों पर दौड़ बचने की चेष्टा करने लगी, ऐसा लगा मानों पूरा जंगल ही उजड़ रहा हो, जिसे भूंकप की जरूरत, न ही सुनामी की ।

इतने में, कहीं से” ठाएं ...ठाएं… ठाए…”तीन आवाजों में कोई मृत हो गया, भीड़ जहाँ-जहाँ से दौड़ रही थी, वहीं पैरों को थाम बैठ गई । चारों तरफ मातम पसर गया । ऐसा लगा,  जैसे भीड़ इसी जनाजे में शिरकत होने के लिए ही यहाँ इकठ्ठा हुई हो। सब एक दूसरे में नजरें बचा कर इंसान में इंसान ढ़ूंढने लगे । आये थे कुछ बातें देशहित की जानने के लिये, न जाने अब कब बलिदान में बदल गईं बातें ।

पुलिस आई तिरंगा बिछा, उसे उठाकर ले गई, मातम मना रही भीड़ में दो-चार को भी साथ ले गई। अब उन्हें होश ही कहाँ था जो कुछ कह सके।  मंच पर खड़े महाशय के मनसूबे धाराशायी हो गये।

भीड़ घायल हो अपने अपने घर की ओर मस्त-पस्त गई । भीड़ के अपने रंग-ढंग होते हैं, इनमें से अब कुछ समझने लगे थे, पर ये समझना कितना हितकर है, इसकी पहचान अभी बाकी रही ।

                   शशि दीपक कपूर

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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