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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 105 // चलती फिरती लाशें // सविता मिश्रा 'अक्षजा'


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प्रविष्टि क्रमांक - 105
सविता मिश्रा 'अक्षजा'

चलती फिरती लाशें
"बीते चार दिनों में छह सामूहिक बलात्कार ! कई हत्याएं !!" हाथ घुमघुमाकर, आँखे मटकाते हुए टीवी रिपोर्टर चीख रही थी । टीवी समाचार देख-सुनकर वहाँ उपस्थित हाड़-मांस के बने पुतले बेचैन हो उठे। उन सबके हाथों ने हरकत किया ! मोबाइल पर उँगलियाँ फिराई और फिर उनकी जुबानें चलने लगीं।
"बिटिया! सुरक्षित हो न! किसी तरह का कोई डर तो नहीं है उधर?"

"हाँ पापा ! आप चिंता नहीं करिए। आस-पड़ोस में सब अच्छे लोग हैं।"
"और मेरी नातिन !"
"पापा ! वो भी यही पास में है। खेल रही है।”
'लो बेटा ! नाना जी से हैल्लो बोलो'
“पापा! मगन है वह अपने खेल में।"

"ठीक है बेटा ! ध्यान रखना। आया जब भी उसे बाहर ले जाए तो उसपर निगाह रखना, बेफिक्र न हो जाना।"
श्यामू के दो जोड़ी कान भी रसोई से निकल टीवी से चिपक गए थे छिपकली की तरह। जिसके कारण मध्यम स्वर में भी पापा के पानी माँगने पर श्यामू सुस्त आवाज़ में बोला -"अभी लाया।"
सोफ़े के पास कोने की टेबल पर रखा लैंडलाइन फोन घन-घनाने लगा। सुनकर सभी का चेहरा स्याह पड़ गया।
"कौन हो सकता है?" संगीता के कान खड़े हो गए लैंडलाइन की घण्टी को सुनकर।

"देखती हूँ माँ जी।"
"रुको! मैं देखती हूँ।" बहू को रोककर संगीता ने कहा।
फोन उठाते ही एक घबराहट भरा स्वर उभरा - "भाभी ! उधर सब ठीक है!!"
"हाँ ! आप सब भी ठीक हैं?"
"हाँ! बिल्कुल । और छुटकी बिटिया किधर है?"
संगीत ने जवाब दिया - "अपने कमरे में पढ़ रही है।"

"भाभी ! ध्यान रखना ! रात को बाहर मत निकलने देना। जमाना बड़ा खराब आ गया है। अभी टीवी पर सुना तो घबराहट होने लगी। आपके मुहल्ले की ही घटना बता रहा था रिपोर्टर।"

"हाँ जीजी! दस कदम की घटना है, अभी हमने भी समाचार में ही सुना। आप भी बच्चियों का ख्याल रखना। नन्हीं-नन्हीं बच्चियों को भी दरिंदे नहीं छोड़ रहे हैं।  प्लीज जीजी! बहुत ज्यादा ध्यान रखना बेटियों का।" चेहरे पर टँगी चिंता की लकीरें अब परिवार में सब ठीक है सुनकर गायब होने लगी थीं।

"कैसे हैं पापा ?" संगीता की बहू ने अपने हवाट्स एप वीडियो कॉलिंग को  रिसीव करते हुए पूछा।
"मैं ठीक हूँ ! तू ठीक है न!"
"हाँ ! पापा।"
नमस्ते मम्मा! कैसी हो! रिंकू घर पर ही है न? शाम ढलने पर कहीं न जाने देना उसे। खासकर नुक्कड़ पर कोई भी सामान लाने बिल्कुल भी नहीं भेजना।"
"तू ठीक कहती है बेटा। जरूरत होगी तो मैं खुद ही छड़ी लेकर चला जाऊँगा धीरे-धीरे। और दामाद बाबू ठीक हैं न!" पिता ने जवाब देकर पूछा|

"जी पापा! अभी-अभी ही ऑफिस से आए हैं।"
"चल फोन रखता हूँ, अभी तेरी भाभी से भी बात करनी है। उसकी तरफ तो और भी ज्यादा माहौल खराब रहता है। चिंता लगी रहती है।"

परिवार के सभी सदस्यों से फोन पर बात करके घर में एकाएक फैली बेचैनी अब सुस्त-सी हो एक कोने में दुबक ली थी। सबके चेहरे पर सूरज के किरणों-सी मुस्कान बिखरने लगी थी।

टीवी अभी भी चीखे जा रहा था। हाथों में फिर से हरकत हुई । चैनल बदल दिया गया । मोबाइल फोन अपने-अपने स्थानों पर विराजमान हो सुस्ताने लगे थे। रात के नौ बजने वाले थे । भोजन की थालियाँ सज गई थी। पूरा परिवार संतुष्टि-पूर्वक खाना खाने में लग गया। दूसरे चैनल पर भी शहरों में घटी वही बलात्कार की घटनाएँ दिखाई जा रही थी। चैनल बदलते जा रहें थे। दूसरे-तीसरे चैनल पर भी रिपोर्टर चीख रहा था, बस चीखे ही जा रहा था । इधर डायनिंग टेबल से बहू ने आवाज़ लगाई - "श्यामु! रोटी और रख जाना।"

संगीता ने कहा - "और पनीर की सब्जी और हलवा भी लेते आना।"
"जी माँजी!" रसोई से एक स्फूर्ति भरी आवाज़ आयी।

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सविता मिश्रा 'अक्षजा'
आगरा, (प्रयागराज)
2012.savita.mishra@gmail.com
ब्लाग - मन का गुबार एवं दिल की गहराइयों से |

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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