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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 28 // हृदय परिवर्तन // डॉ. मृदुला सिंह

प्रविष्टि क्रमांक - 28


डॉ. मृदुला सिंह

हृदय परिवर्तन
सन 2009की बात है, जब हम अपने नये घर में रहने आये थे। पड़ोस की सरस्वती मुझसे बड़ी आत्मीयता से मिली। उसका व्यवहार बहुत अच्छा था पर उसकी कुछ बातें अजीब लगती। वह बहुत रूढ़िवादी और कट्टर थी। उसके दो बच्चे राधिका, ओर नमन अपनी बालसुलभ चंचलता से आंगन गुलज़ार किये रहते। राधिका की एक सहेली रजिया हमेशा राधिका के संग खेलने उसके घर आती थी।
एक दोपहर एक महीन सी आवाज मुझे सुनाई दी - "आंटी पानी दो न बहुत प्यास लगी है।" यह रजिया थी। बदले में सरस्वती की आवाज आई - "जाओ घर से पी कर आओ।" रजिया की फिर कातर आवाज आई - "लेकिन आंटी बहुत जोर से प्यास लगी है प्लीज .... !" फिर सरस्वती की ऊंची आवाज आई - "एक बार में सुनाई नहीं देता, घर से पी कर आओ... पानी खत्म हो गया है मेरे यहां।" मैंने खिड़की से झांक कर देखा। रजिया अपने घर को भागी जा रही थी। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने सरस्वती से कहा - "उसे पानी क्यों नहीं दिया, गर्मी में तो पानी पिलाना पुण्य होता है।" पुण्य शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया क्योंकि सरस्वती हमेशा सहायता को पुण्य से जोड़ कर बात करती थी। मेरे इतना कहने पर वह मुझ पर ही बिफर पड़ी - "घर के बर्तन में कैसे देती पानी। अशुद्ध नहीं हो जाता? इनको पानी पिलाने से पुण्य नहीं नरक मिलता है। मलेच्छ कही के ! वो तो बच्चों की खुशी के लिए आने देती हूं नहीं तो...!" इतना सुनना था कि मैं उलटे पांव घर वापस आ गई।

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इस बात को सालभर बीत गए। सरस्वती के दोनों बच्चे बाहर पढ़ने चले गए। गली का शोरगुल शांत हो गया। बच्चों से बड़ी रौनक रहती थी। एक शाम मैं गमलों में पानी दे रही थी तो बाहर से सरस्वती की कराहने की आवाज सुनी। कोई बोल रहा था - "बस भाभी जी थोड़ा और सब्र..." मैं झट से बाहर आई। सरस्वती को एक आदमी सहारा दिये घर में प्रवेश करा रहा था। मैं उसके घर पहुंची। तब तक सरस्वती अपने शयनकक्ष में बिस्तर पर निढाल लेटी थी। देखा तो उसके पैरों में प्लास्टर चढ़ा है। मैंने पूछा तो वो कराहते हुए बोली - "अरे क्या बताऊँ। आज बाजार में मैं सामान ले कर घर के लिए रिक्शा करने ही वाली थी कि एक तेज रफ्तार मोटरसाइकिल मुझे ठोकर मारते निकल गयी ! मैं सड़क पर बेहोश हो गिर गई। जब होश आया तो देखा रजिया के अब्बा सामने खड़े है। नर्स ने बताया कि यही आपको ले कर अस्पताल आये इतना बताते सरस्वती सुबकने लगी। मैंने चुटकी ली - "क्यों सरस्वती अब तो तुम अपवित्र हो गई। रज़िया के अब्बा ने तुम्हें छुआ ...!"
सरस्वती शरमा गई। बोली ' "मेरी आँख खुल गई। जात-धरम कुछ नहीं होता... इंसान बस इंसान होता है..."


- डॉ.मृदुला सिंह
E/22s/3  वसुंधराविहार,
गोधनपुर, अम्बिकापुर ,छ.ग.

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