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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक – 31 // येन केन प्रकारेण बनिये // धर्मेन्‍द्र कुमार त्रिपाठी

प्रविष्टि क्रमांक - 31

येन केन प्रकारेण बनिये

लघुकथा धर्मेन्‍द्र कुमार त्रिपाठी

दो महीनों से वह अपने घर नहीं गया था.....। दूर के रिश्‍तेदार की दुकान में आधी रात तक वह सीजन का काम कर रहा था......। दौड़-भाग और हाड़ तोड़ मेहनत के बाद जब वह आधी रात को आउटहाउस के कमरे में सोता तो बेसुध हो जाता था। कर्मचारियों के साथ वह बराबरी और बड़ी उम्‍मीद से अपने काम में मेहनत कर रहा था....। उसकी पत्‍नी के पांव भारी थे और कभी भी उसके प्रेम का पहला फूल अंखुआने वाला था......। सीजन का काम आया और उन रिश्‍तेदार की तिजोरी लबालब भरने लगी थी.....।

सीजन के आखिरी दिन वह समय से पहले दुकान पहुंच गया था, आज उसे छुट्टी पर घर जाने को मिलने वाला था.....। अच्‍छे मूड में वह दुकान का काम करता रहा......। वह अपना बैग सुबह दुकान में साथ ही ले आया था.......। दुकान का काम समाप्‍त होने के बाद रात को हिसाब किताब होने लगा था....। उसने अपना बैग उठाया और जाने की इजाजत लेने लगा तो उन रिश्‍तेदार ने उससे पूछा कितना पैसा दे दूं.....। उसे उम्‍मीद थी कि उसकी मेहनत से प्रसन्‍न होकर और बहू के डिलेवरी में आने वाले खर्चे को देखते हुए वे मुनाफे में से कम से कम बीस पच्‍चीस हजार तो दे ही देंगे और ज्‍यादा ही दे सकते हैं, इसलिए उसने कहा आप जितना उचित समझें......।

थोड़ी देर वे कुछ सोचने का अभिनय करते रहे फिर उन्‍होंने नोटों की गड्डी में से कुछ नोट गिनकर दे दिये.....। उसने नोट गिनते हुए देखा था वह दो हजार थे......। वह ठगा सा महीने के एक हजार के मान से मिलने वाले मेहनताने को देख रहा था......। उसे ठिठका देखकर उन्‍होंने बड़ी निर्लज्‍जता से कहा था- ''दौ सौ रूपये में तुम्‍हारे आने जाने का किराया हो जायेगा.....। बाकी के पैसे तुम्‍हारे खर्चे के लिए हैं....। बहू की डिलेवरी होते ही आ जाना.....। यहां सब काम फैला पड़ा है....।''

उसने अपना बैग उठाया और भारी कदमों से स्‍टेशन की ओर चल दिया था....। रास्‍ते में उसके कानों में उन रिश्‍तेदार के कभी किसी से कहे गये शब्‍द गूंज रहे थे- ''येन केन प्रकारेण बनिये।''

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राम जानकी हनुमान वार्ड नं.18,

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483501

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