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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 69 से 70 // लव जेहाद// पद्मप्रिया

प्रविष्टि क्रमांक - 69


पद्मप्रिया

लव – जेहाद

बवाल उठ गया। एक विश्वविद्यालय। जाने कितनी बड़ी-बड़ी बातें होती रहती हैं यहाँ। समीर बेहद परेशान था। उसने कभी नहीं सोचा था कि बात इतनी बुरी तरह मरोड़ दी जाएगी। कड़ी धूप में साइकल चलाकर आया था पर धूप की गरमी से ज्यादा उसे इन्सानों की नफ़रत भरी साँसों की फुफकार सता रही थी।

इधर मीनू का हाल बुरा था। समीर ने यह क्या कर डाला। मीनू समीर के साथ पढ़ती थी। हाय-हेलो, बातचीत-गपशप,कैन्टीन-चाय और दोस्तों के बीच उसने ध्यान हिनहिन दिया कि समीर उससे आकर्षित हो रहा है और मन ह मन गभीरता से उसे हमसफ़र बनाने का ख्वाब देखने लगा था। मीनू न कभी इस नज़र से समीर कोक्या किसी भी लडके को नहीं देखा था। मीनू ने योजनाबद्ध रूप से अपने को समेट कर नहीं रखा था। बस उसके मन ऐसी किसी भावना के अंकुर नहीं फूटे थे। वैसे भी सावधानी की आदत पड़ चुकी थी। वह बहुत खुले विचारों वाली थी, जात-पात, ऊँच-नीच से दूर रहने वाली थी। पर उसका परिवार तो किसी भी परिवार की तरह था, अपनी तरह की जिन्दगी जीने वाला।

समीर को सामने देखकर ठिठक कर रुक गई। मीनू सोच रही थी-समीर से बात कर लूँ। वैसे भी परेशान है, उसे बताना ही चाहिए कि क्या हो रहा है।

‘मीनू’ – समीर की गली हुई आवाज से वह पसीज गई।

मीनू, मैं क्या करता। बस यही सोचा कि जो मेरे दिल की सच्चाई है उसे तुम्हारे परिवार के सामने रख दूँ।

पर, समीर, पहले मुझसे तो पूछ लेते। मीनू ने धीरे से कहा।

मुझे यकीं है कि मेरी मोहब्बत सच्ची है – समीर ने दृढ़ आवाज में कहा।

तुम्हारी मोहब्बत पर मुझ्र कोई शक नहीं, पर तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि तुम मुझसे प्यार करते हो और सीधे घर पर पहुँच गए।

क्या करता ? पहले हम दोनों के बीच बात साफ होनी चाहिए। क्या तुमने मेरी भावनाओं को पूछने की भी जरुरत महसूस नहीं की। बस अपनी ही रौ में जीते हो। पता भी है इस सबका अंजाम क्या हुआ ? मीनू बोल कर हाँफ गई। दोनों धूप में चलते जा रहे थे
समीर ने साइकल के हैंडल पर अपनी पकड़ कस दी। बुरी तरह से पसीने से टार थे दोनों। अचानक समीर बोल पड़ा-

‘चलो, कैंटीन चलते हैं।

अच्छा, चलो- मीनू ने कहकर दुपट्टे से सर ढक लिया। गर्मी से बेहाल दोनों धीरे-धीरे, चुपचाप कैंटीन की तरफ चल रहे, अपने-अपने ख्यालों के मकड़जाल में उलझे।

कैंटीन के पास पहुंचकर समीर ने छाँव में साइकिल खड़ी कर दी। बहुत सारे पेड़ों के बीच बेंच पड़े हुए थे। मणि की कैंटीन इसी खुले वातावरण के लिए पसंद की जाती थी। कैंपस में तीन कैंटीन और भी थी पर मणि अपनी छोटी सी रसोई से स्वाद बिखेरता था।

एक पेड़ की घनी छाया के निचे बेंच पर मीनू और समीर बैठ गए।

मणि हँसता हुआ आर्डर लेते पहुँच गया। दोनों के मुरझाए चेहरे देखकर कह उठा –

‘क्या हुआ ?’

‘कुछ नहीं मणि भया। बस ऐसे ही’ समीर ने जवाब दिया।

‘ठीक है, क्या खाओगे ? मणि ने पूछा

‘दो फ्रूट सलाद विद् आइसक्रीम’। मीनू ने वहीँ आर्डर दिया जो समीर को पसंद था, वैसे भी गर्मी बहुत थी।

‘ओके, अभी लाया’। मणि अपनी बड़ी सी मुछों के बीच से हल्की सी मुस्कान फेंककर चला गया।

फिर मीनू और समीर के बिच चुप्पी छ गई। थोड़ी देर बाद मीनू ने ही बात उठायी।

‘आ प्रोफेसर वेट्टीकुटी ने बुलबाया था और जो उन्होंने मुझसे कहा उसे सुनकर बड़ी हैरानी हुई। इतना गुस्सा आया कि पता नैन मैं क्या का बैठती। ये, ये लोग मानवता पर लेक्चर बघारते हा, खुद को पढ़ा-लिखा, ज्ञानी मानाने वाले ये लो इतने घटिया हो सटे हैं, ये मैंने कही सोचा भी नहीं था।

‘अब बताओगे कि भूमिका ही बाँधती रहोगी। समीर खीज उठा।

अरे, कहने लगे कि मैं पुलिश में तुम्हारे खिलाप झूठी शिकायत लिखवा दूँ कि तुमने मुझे धमकी दी है कि अगर में तुम्हारे शादी के प्रस्ताव को नहीं मानूँ तो मुझ पर एसिड डाल दोगे।

समीर फ्रूट सलाद से भरा चम्मच मुहँ में रख ही रहा था कि चौंक कर रुक गया। और जोर-जोर से हँसने लगा, बड़ी मुश्किल से हँसी रोककर बोल पड़ा-

‘और क्या कहा उन्होंने ?

उनकी तो छोडो प्रोफेसर नीलम ने और भी बेहूदा बात कही।

‘क्या कहा, उस आदर्शवादी महिला ने ?

यही कि मीनू तुम्हे ध्यान से रहना चाहिए। आजकल एक नए तरह का जिहाद छिड़ा हुआ है। जिसमें मुसलमान लड़के हिन्दू लड़कियों को प्रेम के नाम पर फांसकर शादी कर लेते हैं। इसे लव-जेहाद कहते है। ‘इट इज व्युर्रली ए केस आँफ लव-जेहाद। यु बेटर बी केयरफुल।’

समीर की मुट्ठियाँ भिंच गई।

दुनियाँ भर की पेचीदगियों के बिच मीनू और समीर बेंच के निचे बैठकर फ्रूट सलाद विद् आइसक्रीम खा रहे थे।

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प्रविष्टि क्रमांक - 70


पद्मप्रिया

नृत्यांगना

आज की प्रदर्शन सफल रहा। तालियों की गडगडाहट से आडिटोरियम गूंज उठा था। ग्रीन रूम में मेकअप उतारती श्रद्धा का मन प्रफुल्लित था। उसने मेकअप का सामान और नृत्य से संबंधित ड्रेस वगैरह को समेत कर बैगों में सलीके से रख लिया बाहर गाड़ी में सब लोग बैठ चुके थे। एकबार उसने ग्रीन रूम को सर-सरी निगाह से देखा। कुछ छुट तो नहीं गया। फिर बाहर निकल आई और गाड़ी में बैठ गई।

आयोजकों की गाड़ी उसके ग्रूप के गायक, मृदंगवादक, वीणा और मुरली वादकों को उनके घरों पर छोडती हुई आखिर में जब श्रद्धा के घर पहुँची तो काफी रात हो चुकी थी। उतरकर उसने प्रोग्राम के आयोजक, जो उसे घर पहुँचाने आए थे, को धन्यवाद दिया और गेट खोलकर मेन डोर की घंटी बजाई। देर से आना उसके लिए नई बात नहीं थी। हमेशा की तरह माँ ने ही मुस्कुराते हुए द्वार खोला। चेहरे पर पर जरा भी शिकन नहीं बस आंखें नींद से उठने के कारण कुछ बोझिल थी।

‘मेरी प्यारी अम्मा।’ माँ को बाँहों में लपेट कर श्रद्धा ने लाड जताया, फिर झुककर दोनों बैग उठाए और भीतर आ गई।

‘कैसा था परफोरमेन्स ? श्रीनिवास का मृदंग ठीक होकर आ था क्या ? वो ड्रेस----

‘अम्मा, सब ठीक रहा। इनफैक्ट, मेरी एक्सपेक्टेशन से कहीं अच्छा था. आज का प्रदर्शन। आज तो वीणा भी मगन हो कर गा रही थी, मुझे नृत्य करने में बहुत मज़ा आया, खुश हूँ माँ।’ सामान कमरे की तरफ ले जाते हुए, जैसे कुछ याद आया, श्रद्धा रुककर बोली – अच्छा था माँ। आज तो कमाल हो गया। वैसे मैं डर रही थी कि जो नया आईटम मैंने कम्पोज किया था वो ठीक तरह से कर पाऊँगी कि नहीं, पर श्रीनिवास ने मृदंगम इतना अच्छा बजाय कि मुझे लगा ही नहीं की कोई नया आईटम कर रही हूँ।’

‘अच्छा, चल सुबह बात करेंगे। तू नहाले, तेरे लिए दूध गरम करके फ्लास्क में रखा है, पी लेना, मुझे नींद आ रही है। माँ अपने बेडरूम की तरफ चली गई।

समान उठाकर श्रद्धा भी अपने कमरे की तरफ चल दी। गीजर दाल रखा था अम्मा ने, गरम-गरम पानी से नहाकर, दूध का ग्लास लिए जब वो बिस्तर पर पहुँची तो न जाने कितनी ही बातें उसके दिमाग में कौंध गईं। वही प्रश्न एक बार फिर उसके सामने आ खड़ा हुआ। क्या उसने ठीक किया ? उसका फिर वहीँ जवाब था हाँ।

सुबह की हल्की धूप से श्रद्धा की नींद टूटी। उसके कमरे खिड़की से आने वाली धूप ही अक्सर श्रद्धा को जगाती थी। बच्चे उठ गए होंगे। ख्याल आते ही वो एकदम से उठी और और अम्मा की कमरे की तरफ चल दी। जिस दिन उसका परफोर्मेंस होता था उस दिन बच्चे अम्मा के साथ सोते थे। वह उठकर हॉल में आई तो देखा अम्मा रसोई में थी। बच्चे अभी उठे नहीं थे।

अम्मा के कमरे की तरफ जाते हुए उसने अम्मा को आवाज दी- ‘चाय बना दो, माँ, बच्चों को उठाकर आती हूँ।’

‘जल्दी आना, चाय ठंडी हो जाएगी।’ माँ बोली हाँ।

पर्दा हटाकर देखा तो रिंकी और मित्री के मासूम चेहरों की झलक ने उसकी ममता को गुदगुदाया। वो धीरे से पलंग पर बैठ गई और धीरे-धीरे रिंकी और मित्री के बालों को सहलाती हुई बोली-

‘रिंकी, मित्री, उठो बीटा, टाइम हो रहा है, स्कूल नहीं जाना क्या। रिंकी और मित्री में न जाने ऐसी कौन सी बात थी कि उसकी आवाज सुनते ही मुस्कुराते हुए जग जाती हैं। माँ की सहायता से श्रद्धा ने दोनों बच्चों को प्यार भरे अनुशासन में पाला था।

‘मम्मी, कल आपका प्रोग्राम कैसा रहा ? आज मेरा यूनिट टेस्ट न होता तो मैं जरुर आपके साथ चलती। च्च, चलिए, अगले प्रोग्राम में मैं भी आपके साथ परफार्म करुँगी। रिंकी बिस्तर पर बैठ कर चहक रही थी।

हाँ, हाँ, जरुर बेटा, चलो चलो, उठो अब, नहीं तो देर हो जाएगी।’ श्रद्धा बोली और उठकर बरामदे की और चल दी।

माँ ने चाय रख दी होगी।’ श्रद्धा सोच रही थी। लक्ष्मी आ गई थी। रिंकी और मित्री को तैयार करके स्कूल बस में चढ़ा आएगी।

बरामदे में आराम कुर्सी पर बैठकर चाय का घूंट भरती हुई सोच रही थी कि अगर अमर उसकी जिन्दगी में होता तो शायद उसकी जिन्दगी का ढर्रा ही बदला हुआ होता। अमर, एम.ए. में उसका क्लासमेट था। दोनों अच्छे दोस्त थे। श्रद्धा पढाई के साथ-साथ नृत्य भी सीखती थी। यों तो अमर अच्छा लड़का था पर-----

मम्मी,।’ रिंकी, मित्री स्कूल यूनिफार्म में दौडती हुई उसके पास आई। उसने दोनों को बाँहों में ले लिया। दोनों के गाल चूमे और बाल सहलाये।

‘’बाय, मम्मी, शाम को आराम से बात करेंगे।’ दस वर्षीय रिंकी बैग उठाकर दौड़ी।

‘रुको रिंकी, मित्री को भी लेते जाओं।’ आठ साल की मित्री का हाथ थामे श्रद्धा गेट तक पहुँची तो लक्ष्मी बच्चों के टिफिन बाले बास्केट लेकर आ रही थी।

‘मित्री, रिंकी, इधर आओ, मम्मी को बाय बोलो, चलो, चलो, बस आ जाएगी। लक्ष्मी बाई चिल्लाई। बच्चों को लेकर जाती लक्ष्मी बाई को देखती हुई श्रद्धा गेट पर ठोड़ी टिकाए खड़ी रही। बच्चों ने बगीचे में रंग-बिरंगे फूल खिले थे। छोटा सा बगीचा था। इस महानगर में इतनी जगह मिलना सचमुच बड़ी बात है। मौसम भी सुहाना था। दो दिन की वर्षा के बाद आज सबकुछ धुला-धुला, स्वच्छ दिख रहा था। सुनहली गुदगुदाती धूप में चाय का प्याला लिए श्रद्धा बगीचे में पड़ी कुर्सी पर आकर बैठ गई। फूलों को देखकर उसे बच्चों के मासूम चेहरे याद आए। उसने जो लड़ाई शुरू की थी उसे उसके बच्चों को भी लड़ना होगा। पर क्या वो सचमुच लड़ना चाहती थी। नहीं तो। लेकिन उसे एक नई जुंग शुरू करनी पड़ी। बचपन से ही उसे नृत्य का शौक था, शौक नहीं बल्कि नृत्य में उसके प्राण बसते थे। माता और पिता दोनों ने ही उसका हमेशा साथ दिया। मम्मी-पापा का जीवन कितना संतुलित था। कहीं कोई लकीरें नहीं थी कि औरत की सीमाएँ यहाँ तक है और आदमी का दायरा यहाँ तक। जीवन में एक दुसरे के प्रति प्रेम, सहानुभूति और निश्चल, अहंकार रहित स्नेह हो तो क्या नहीं किया जा सकता। पर उसके भाग्य में शायद ऐसा जीवन-साथी नहीं लिखा था।

अगर अमर की अचानक दुर्घटना में मौत न होती तो वो भी अपनी माँ की तरह भरा-पूरा जीवन जी रही होती। अमर को भी नृत्य बहुत पसंद था, शास्त्रीय नृत्य की अलौकिकता का आनंद उठाता था। कितने ही प्रदर्शनों में उसने आगे की सीट पर बैठकर उसके नृत्य का आनंद ही नहीं उठाया था बल्कि एक अच्छे समीक्षक के दृष्टि से उसके नृत्य को देखकर उसे अपने नृत्य का माँजने के लिए सुझाव भी दिए थे। सोचते-सोचते श्रद्धा उदास हो गई। अमर का गंभीर, हंसमुख चेहरा जैसे खिले फूलों में आकर बस गया था।

‘श्रद्धा..........|’ माँ की आवाज से वो चौंक उठी।

‘आ रही हूँ, माँ।’

अम्मा मेज पर नाश्ता रख रही थी। श्रद्धा जल्दी से भीतर गई और ऐसे नहाकर आई जैसे बड़ी जल्दी में हो। वो इन सब से निपटकर एक नींद लेता चाहती थी। फिर उसे ख्याल आया, अगर अम्मा न होती तो क्या वो ऐसा कदम उठा सकती थी। नाश्ता करके अपने कमरे में बिस्तर पर श्रद्धा लेट तो गई पर नींद नहीं आई। नृत्य पर कुछ शोध कर रही थी। उससे संबंधित सारे कागज़ मेज पर बिखरे हुए थे। खिड़की से आती मंद हवा से कागज़ फडफडा रहे थे। श्रद्धा उठी और कागजों पर पेपरवेट रखकर वहीँ मेज पर बैठ गई।

अमर के जाने के बाद एक साल तक श्रद्धा ने न तो नृत्य किया न ही किसी काम में उसका दिल लगता था। श्रद्धा और अमर की शादी होने वाली थी। माँ से श्रद्धा का दुःख देखा न जाता था उन्होंने ही धीरे-धीरे श्रद्धा को वापिस नृत्य की तरफ भेजा। डांस स्कूल में दाखिला लेने पर मजबूर किया। श्रद्धा धीरे-धीरे नृत्य में डूब गई जिसने अमर की मौत की पीड़ा को सहने की शक्ति दी। दो साल बाद अम्मा श्रद्धा की शादी के लिए रिश्ते ढूंढने लगी। श्रद्धा भी बेमन से योग्य वरों को देखती पर हर जगह से लगभग एक ही शर्त पहले आ जाती कि श्रद्धा को नृत्य छोड़ना होगा। प्रदर्शनों की व्यस्तता गृहस्थी को नष्ट करेगी। यहीं श्रद्धा पीछे हट जाती।

श्रद्धा ने एक दिन माँ से कहा –‘माँ’ अब तुम रिश्ते देखने छोड़ दो। हर सफल आदमी के पीछे एक स्त्री का संपूर्ण त्याग हो सकता है पर एक सफल औरत की सफलता को न तो तो आदमी बर्दाश्त कर सकता है, न ही त्याग कर सकता है। ऐसे आदमी विरले ही होते हैं। समाज भी तो सफल औरत के पति को कोंच-कोंच कर घायल कर देती है। साथ देने वाले आदमी को असमर्थ कहकर उसके अहं को चोट पहुंचाते हैं। अमर जैसा साथी मुझे कवि नहीं मिलेगा, माँ। तुमने मेरी वैज्ञानिक दोस्त डॉ. ननकानी और उनके पति को तो देखा है, न। बेचारे दोनों एक ही संस्था में काम करते हैं। ननकानी आजकल अपने पति से बड़े पद पर आ गई है और बहुत व्यस्त रहने लगी हैं। उनका महत्व बढ़ गया तो उनके पति को उनके साथियों ने ही न जाने कैसी-कैसी गंदी बाते करके इतनी ठेस पहुंचाई कि वो दिन-रात पीने लगे हैं। असल में इस दोनों का प्रेम विवाह था और ननकानी को उसके पति ने ही हर तरह से आगे बढ़ने का मौका दिया था। पर समाज ने उनके रिश्ते में ऐसी दरार डाली कि बस।

माँ, मैंने सोच लिया है कि मैं नृत्य नहीं छोडूंगी, पर मैं अपने नारी जीवन को भी मातृत्वहीनता से भी सूखने नहीं दूंगी। विज्ञान का शाप है कि वरदान मैं नहीं जानती पर मेरी जो मित्र हैं- डॉ. सुरिन्दर कौर, उन्होंने मुझे बताया है कि मैं इन्-विट्रों फार्टीलाइजेसन की प्रक्रिया से बच्चे पैदा कर सकती हूँ। आजकल संतानहीन दंपति भी ऐसे ही बच्चे पैदा करते हैं। माँ, चौंक गई हो क्या ? बड़ा कठिन निर्णय है, पर क्या एक अनजान आदमी के साथ मात्र शादी के लिए मुझे अपना व्यक्तित्व, अपने प्राणों से भी प्यारे नृत्य के कैरियर छोड़ना पड़ेगा ? नहीं माँ, मैं भी मामूली इन्सान हूँ, इतना त्याग में नहीं कर सकती कि पति कि हर घृष्टता को माफ़ करके उसे देवता बनाकर सर पर उठा लूँ। मैं भी पति-पत्नी के रिश्ते में बंध कर चल सकती हूँ, अगर हमारे जीवन में स्नेह भरी साझेदारी हो, मैं भी त्याग सकती हूँ, पर एकतरफा नहीं। तुम मेरी साथ दोगी न माँ ? बोलो, साथ दोगी न माँ ?

‘हाँ।’ माँ का दृढ़ जवाब था।

और अपने माता-पिता के दृढ़ सहयोग के कारण ही उसके पास सफलता है, दो बच्चे हैं, अमर की यादें हैं और सबसे बड़ी बात कि उसके बच्चों के पास अपनी माँ की निष्ठा और प्रेम के सम्मान स्वरुप उसका नाम है। शक्ति स्वरूपा, सृष्टि की प्रतिसृष्टि की पीड़ा को झेलकर किसी भी हालत में बच्चों को अपने अंक में छिपा सकने का धैर्य रखने वाली मदर इंडिया की छाया है। मातृत्व को सम्मान देते हुए उसने अपने बच्चों को अपना नाम दिया है – ‘तृप्ता श्रद्धा’ जिसे घर में वो प्यार से रिंकी कहती है और ‘मिताली श्रद्धा’ उसकी नन्ही मित्री। उसे पूरा बिश्वास है कि वह समाज के लिए लीक से हट गई है पर स्वाभिमानी होने के नाते उसे जीवन की मिठास का आनंद उठाने के लिए किसी स्वार्थी पुरुष का नाम नहीं चाहिए।

दोपहर के साधे तिन बज रहे थे और धड़धडाकर अन्दर आते बच्चों की किलकाती आवाजें उसे तृप्त कर रही थी। स्कूल से वापस आये बच्चों को अंक में भरने के लिए श्रद्धा कमरे से निकल आई।

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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 8252743634322910076

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  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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