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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 74 से 78 // गिरिजा कुलश्रेष्ठ

प्रविष्टि क्रमांक - 74


गिरिजा कुलश्रेष्ठ


एक आसमान

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"ए विमलाsssss!!"

मैंने देखा ,देहरी पर बैठी पुजारिन अम्मा अपनी आँखों पर हथेली की छतरी सी ताने आतुरता से मुझे ही पुकार रही थी। मैं लौट पड़ी।

"इधर क्या चाची के घर गई थी ?"

अम्मा के सवाल का उद्देश्य मुझे मालूम था। मेरी चाची के पडोस में ही अम्मा के बडे बेटे विनोद का मकान है। महीना भर पहले वे पत्नी बच्चों सहित अपने मकान में रहने चले गए। और अम्मा छोटे बेटे रूप के साथ इसी किराए के पुराने मकान में रह गई। विनोद भैया ने अम्मा से भी साथ चलने को कहा तो जरूर होगा पर शायद उस तरह नहीं कहा होगा कि अम्मा उठ कर चल देती या कि कई दशकों से रह रहे इस घर की इतनी सारी यादों को लेकर जाना संभव नहीं हुआ होगा। वैसे भी कुसमा भाभी की अम्मा से चख-चख होती ही रहती थी। जो भी हो ...।

अब जैसा कि होता है, विनोद भैया को अम्मा के पास आने की ,उनकी सुधि लेने की जरा भी फुरसत नहीं है। पर अम्मा के पास उनकी सुधि के लिये फुरसत ही फुरसत है। जो भी उधर से आता है ,अम्मा बुला कर बिठा लेतीं हैं ।

"विनोद के घर भी गई होगी ?"

"हाँss...गई तो थी।" मैंने हिचकिचाते हुए कहा।

"विनोद मिला होगा।"---अम्मा ने और भी उत्सुक होकर पूछा फिर कुछ बुझे स्वर में बोलीं---" विनोद की ‘जनी’ तो खूब मजे में होगी कि चलो पीछा छूटा 'डुकरिया' से ..। आदमी उसकी मुट्ठी में है। सास गिरे 'ढाह' से....।"

अम्मा की आवाज पीड़ा थी मलाल था। लगा जैसे शून्य में अकेली ही असहायसी छटपटाती हुई मेरी प्रतिक्रिया का सम्बल तलाश रही हों।

"लेकिन अम्मा-"--मैंने कुछ सोच कर कहा-- "मैं तो जब भी जाती हूँ ,भाभी बडे आदर से तुम्हारी ही बातें करती रहतीं हैं। आज ही तुम्हारे हाथ के बने मिर्च के अचार की बडी तारीफ कर रहीं थीं।"

"सच्ची !! खा मेरी सौगन्ध।" --- अम्मा की आँखों में सितारे से झिलमिलाए।

"हाँ सच्ची अम्मा ! विनोद भैया भी कहते रहते हैं कि हमारी अम्मा ने जैसे बच्चों को पाला है कौन औरत पाल सकती है !"

"विनोद तो मेरा विनोद ही है "---अम्मा गद्गद् होगईं ----"और कुसमा भी ...जुबान की भले ही जैसी हो पर दिल में खोट नहीं है उसके।"

मैंने देखा ,सारी धुन्ध हट गई थी। अम्मा के चेहरे पर सुबह की धूप खिल उठी थी।

झूठ बोल कर ही सही ,उस पल मैंने अम्मा को एक आसमान तो दे ही दिया था।

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प्रविष्टि क्रमांक - 75


गिरिजा कुलश्रेष्ठ

और कुछ भी नहीं

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"भैया-भैया ,तुम्हें बुआ बुला रही है।"----मैं बाहर बैठक में सोने की कोशिश कर रहा था कि मेरे छोटे भाई ने आकर मुझे झिंझोडा।

"क्या हुआ भाई ?" मैंने पूछा तो वह संक्षेप में बता कर चलता बना---

" खबर आई है कि हरी भैया बीमार है ,सो बुआ जाने की कह रही हैं।"

"जाने की कह रही हैं !!"--मैं चौंक पड़ा। ऐसा कैसे हो सकता है ? अभी पन्द्रह दिन भी नहीं हुए जब इसी हरी के दुर्व्यवहार से आहत हुई बुआ को मैं अपने साथ लाया था। अब बीमार भी होगया पन्द्रह दिन में ! मुझे यकीन नहीं हुआ। जरूर उसने बीमारी की झूठी खबर भिजवाई होगी।

हरी उन लड़कों में से है जो बेटे के नाम पर कलंक कहे जा सकते हैं। माँ की सेवा-टहल तो बहुत दूर की बात है , उसके दो मीठे बोलों का भी सुख नहीं है बुआ को। ऊपर से मेहनत अलग। चाहे भैंस का चारा लाना हो ,या भरी दोपहरी में चूल्हे पर रोटी सेंकना हो ,काम किये बिना बुआ को एक कप चाय भी नसीब नहीं होती। काम में जरा भी देर या लापरवाही होती तो गाली-गलौज ,अपमान और घर से बाहर निकल जाने की कहना उसके लिये 'तकिया कलाम' जैसा था। बहू मुँह से तो कुछ नहीं कहती थी पर उसकी मूक उपेक्षा हरी की मुखर कुटिलता से कम न थी। मैंने वहाँ रह कर यह सब देखा। बुआ की दीन दशा देखीं तो बुआ को अपने साथ ले आया कभी वापस न भेजने का निश्चय करके। बुआ ने भी तब यही कहा कि अब वे इस 'निपूते' का मुँह भी न देखेंगी। फिर इतनी जल्दी कैसे भूल गईं बुआ। अभी इस तरह चली जाएंगी तो उसकी हेकडी और भी बढ़ जाएगी। नहीं मैं नहीं जाने दूँगा एक माँ को यों अपमानित होने के लिये। मैं इस लायक तो हूँ कि बुआ को आजीवन अपने साथ ससम्मान रख सकूँ। आखिर मेरा भी उनके लिये प्रति कोई दायित्त्व है। यही सब सोच कर मैं अन्दर गया।

मैंने देखा ,बुआ सारे कपडे-लत्ते समेट-बाँध कर बैठी हैं। मुझे बोलने का मौका दिये बिना ही कहने लगीं---"सुनील बेटा , खबर आई है कि वह 'नासमिटा' बीमार है। पड़ा होगा सारा काम सिर पर। रहने और खाने-पीने का सऊर तो है नहीं। अब क्या माँ बैठी है जो फिकर करेगी .... देख ,तू यह न समझना बेटा कि यहाँ मुझे अच्छा नहीं लग रहा। अरे यहाँ तो मैंने वो सुख पाया है जो नसीब वालों को मिलता है। मेरा जाने का मन थोडी है ! और तू देखना वहाँ जाकर भी मैं उससे बोलने वाली नहीं हूँ ...बस सोचती हूँ कि वह 'मरा' बीमार है ....।"

अपनी बात का समर्थन माँगती हुई सी वे मेरी ओर देखने लगीं। मैं हैरान था। कहाँ वह पन्द्रह दिन पहले वाला आक्रोश और दर्द और कहाँ यह व्याकुलता व चिन्ता। मेरे पास कुछ कहने को नहीं था क्योंकि उनकी नम आँखों में ,बिना माँगे ही क्षमा कर देने वाली माँ के हृदय में केवल और केवल स्नेह था और कुछ भी नहीं।

फिर लौट आने का आग्रह करके मैंने उनका थैला उठा लिया। और मैं करता भी क्या।

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प्रविष्टि क्रमांक - 76


गिरिजा कुलश्रेष्ठ

सीट

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गाडी जैसे ही स्टेशन पर रुकी , जनरल डिब्बों में लोगों ने अपनी-अपनी सीट सम्हाली। किसी ने पाँव पसार लिये किसी ने बैग रख लिया। जो लोग टॉयलेट के लिये निकले थे वे भी लौट कर अपनी सीट पर जम गए। पता नहीं कौन आकर बैठ जाए। और एक बार सीट पर जो जम गया सो जम गया। उसे हटाना बड़ा मुश्किल होता है।

तभी भीड़ का एक रेला डिब्बे में घुसा। लोग चल कर नहीं मानो धक्कों के सहारे आगे बढ़ रहे थे। जैसे कोई बेतरतीबी से थैले में कपडे ठूँसे जा रहा हो। पसीने की गन्ध मिश्रित भभका साँसों में घुटन पैदा करने लगा। सीट पर बैठे लोगों को यह आपत्ति थी कि खड़े लोगों की भीड़ ने हवा का रास्ता भी बन्द कर दिया था। वहीं खड़े लोग कहीं किसी तरह पाँव रखने की जगह बना रहे थे और बैठे लोगों से कह रहे थे--"अरे भैया यह सीट छह लोगों की है और बैठे पाँच ही हैं।"

पहले तो बैठे लोग ऐसी बातें पूरी तरह से अनसुनी कर रहे थे। पर सुनने के बाद भी एक ही तरह के वाक्य दोहरा रहे थे-- "हम दूर से आ रहे हैं भैया। थके हैं। आगे चले जाओ। डिब्बा खाली पड़ा है।"

"बैठे--बैठे भी तकलीफ हो रही है तुम्हें ?" एक आदमी जो कुछ पढा-लिखा लगता था ,बोल उठा---"आराम करना था तो घर पर ही रहते न!"

"किराया हमने भी दिया है। सीट कैसे नहीं मिलेगी ?--एक दूसरे यात्री को भी बल मिला।

वही एक अधेड़ उम्र के सज्जन भी खडे थे। ऊपर को सँवारे हुए खिचडी बाल ,लम्बी और आगे को झुकी नाक ,आँखों में अनुभव की चमक। सफेद लेकिन कुछ मैले कुरता-पायजामा और कन्धे में लटका खद्दर का थैला उन्हें सबसे अलग बना रहा था। वे सीट पाने के लिये संघर्ष नहीं कर रहे थे बस व्यंग्य भरी मुस्कान लिये लोगों का वार्तालाप सुन रहे थे। मौका पाकर बोले--" जमाना ही बदल गया साहब। आदमी की गुंजाइश खत्म हो रही है वरना दिल में जगह हो तो कहीं कोई रुकावट है ही नहीं। पहले जवान लड़के बुजुर्गों व महिलाओं को उठ कर जगह देते थे। पर आज खुद को जगह मिल जाय बस...। अरे कुछ घंटों का सफर है। कोई लग कर यहाँ रहना तो है नहीं। सीट कोई अपनी पुश्तैनी थोडी है। "

उन सज्जन की बातों से प्रभावित होकर लोगों ने थोड-थोडा सरक कर उनके लिये जगह बना दी। उनके चेहरे पर असीम सन्तोष छा गया। बैठ कर वे अपने अनुभव लोगों को सुनाने लगे। पर जैसे ही अगला स्टेशन आया वे कुछ अस्थिर व सजग हो गए।

इस बार उनकी सजगता व व्यग्रता सीट पाने की नहीं ,सीट बचाने की थी। वे आने वाले हर यात्री से कह रहे थे --"भैया जी आगे जाओ पूरा डिब्बा खाली पडा है।"

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प्रविष्टि क्रमांक - 77


गिरिजा कुलश्रेष्ठ

कंगाल

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खेत में झूलती बाजरे की रुपहली बालों को देख कर जिस तरह किसान की आँखें तृप्त होजाती हैं, उसी तरह अपने जवान और कमाऊ बेटे को देख कर विसनू की आंखें तृप्त हो गईं।

“माँ की बीमारी की बात सुनी तो आना ही पड़ा बापू नहीं तो आजकल छुट्टी मिलना भारी मुश्किल है .”----राकेश ने जूते उतार कर खटिया के नीचे सरकाते हुए कहा।

तब तक रतनी ने हुलसते हुए नई दरी खटिया पर डाल दी। दुबले पतले शर्मीले से राकेश की जगह ऊँचे और भरे-पूरे शरीर वाले ,सूट-बूट में सजे-सँवरे राकेश को देख रतनी का मन आषाढ़-सावन की धरती हुआ जा रहा था। जिसमें अनगिन लालसाएं अंकुर की तरह फूट निकलीं थी। दो दिन पहले जो उसे साल भर बाद बेटे के आने की खबर लगी तो घर-आँगन लीप-पोत कर चौक पूर कर दीपावली की तरह सजा लिये थे। वैसे भी लक्ष्मी और कब तक रूठी रहेंगी रतनी से। रामदीन काका कह रहे थे कि “राकेश के यहाँ तो कपडे भी मशीन से धुलते हैं। भैया , गंगा में जौ बोये हैं विसनू ने .”

“तो विसनू भैया ने भी राकेश की पढाई में कोई कसर नहीं छोडी। फटा-पुराना पहन कर , रूखा-सूखा खाकर भी कभी किसी के आगे तंगी का रोना नहीं रोया। इस पर भी दूसरों के लिये कभी ना नहीं निकला विसनू और उसकी घरवाली के मुँह से। भगवान एक दिन सबकी सुनता है।

गाँव वालों के मुँह से ऐसी बातें सुन विसनू का रोआं रोआं खिल जाता। आदमी की सबसे बडी कमाई तो यही है कि चार लोग सराहें।

रतनी ने बेटे की मन -पसन्द भाजी बनाई थी। हुलस कर पंखा झलती हुई खाना खिलाने लगी।

“बेटा ,बहू और मुन्नू को भी ले आता .”-----विसनू बेटे के पास बैठ गया। वह बेटे से बहुत कुछ कहना चाहता था कि अब गाँव का माहौल बिगड रहा है इसलिये रज्जू को अपने साथ ले जा.. कि बेटा इतने--इतने दिन मत लगाया कर आने में … कुछ नहीं तो एक चिट्ठी ही डाल दिया कर नहीं तो सरपंच काका के फोन पर फोन कर दिया कर… कि बेटा तू इधर ही बदली करवा ले ,हम लोगों को सहारा हो जाएगा।.....

....और विसनू , बेटे के मुँह से सुनना भी चाहता था कि बापू मैं आँगन में ही एक हैंडपम्प लगवा देता हूँ … माँ कब तक बाहर से पानी ढोती रहेगी … कि किश्तों से कर्ज पटाने की क्या जरूरत बापू … मैं एकमुश्त रकम भर देता हूँ .. कि एक दो पक्के कमरे बनवा लेते हैं .. अब माँ को मिट्टी-गारा करने की क्या जरूरत .. और..कि बापू अब तुम अकेले नहीं हो …गृहस्थी की गाडी खींचने में मैं भी तुम्हारे साथ हूँ … साथ क्या अब तो मैं अकेला ही काफी हूँ----पर राकेश जाने किन खयालों में खोया रहा।

“और शहर में क्या हाल-चाल हैं बेटा .”--- आखिर विसनू ने बेटे की चुप्पी तोड़ने की कोशिश करते हुए पूछा .

“सब ठीक हैं बापू .”

“और आमदनी वगैरा...?”

“आमदनी की क्या बताऊँ बापू ! शहर में जितनी आमदनी , उतने ही खर्चे हैं। मँहगाई आसमान छू रही है। मकान किराया, बिजली ,पानी और फोन के बिल...दूध--सब्जी दवाइयाँ..डा.की फीस ..तमाम झगडे हैं। इस बार अच्छी साइड नहीं मिली तो ऊपर की इनकम भी नहीं है। उस पर आने-जाने वालों का अलग झंझट..”

विसनू ने हैरानी के साथ देखा कि सब--इंजीनियर राकेश की जगह कोई बेहद तंगहाल ,लाचार सा अनजान आदमी बैठा है। मन की सारी बातें मन में ही दबा कर उसके मुँह से बस इतना ही निकल सका---

“बेटा हाथ सम्हाल कर खर्च करो। जरूरत पडे तो राशन पानी घर से ले जाओ। और क्या....। हमने तो सोचा था कि एक बेटे को पढा कर हम निश्चिन्त हो गए हैं पर .....”

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प्रविष्टि क्रमांक - 78


गिरिजा कुलश्रेष्ठ

चोरी

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"माँ मेरा हवाई-जहाज, जो कई दिनों से मिल नहीं रहा , जग्गू के पास है . कल रज्जन ने बताया . "

"अच्छा ! तो फिर तू उससे ले क्यों नहीं आता ?"

“लेने गया था पर उसने नहीं दिया . कह रहा था कि उसे तो पडा मिला था चबूतरा पर .. उसने चुराया थोडी है . जब खेलकर मन भर जाएगा तब लौटा देगा .”

“वाह , घर में नहीं हैं दाने ,अम्मा चली भुनाने .”--मुझे गुस्सा आ गया।

“अपनी सूरत देखी है उसने कि इतने मँहगे खिलौने से खेले ? मैं जाती हूँ . खिलौने को तो उसका बाप करमा भी लौटाएगा।

जग्गू की माँ 'नरबदा' हमारे घर काम करती है। जग्गू उसके साथ कभी-कभी आ जाता था और पानी देने ,बर्तन जमाने जैसे कामों में माँ की मदद कर दिया करता था लेकिन सीधा-सादा दिखने वाला वह सात साल को छोकरा इतना मक्कार होगा ,कौन जान सकता था। और उसकी माँ को क्या बिल्कुल पता नहीं होगा ? चोर लुटेरे ऐसे ही तो बनते हैं।

मैं तनतनाती हुई करमा की झोपडी तक पहुँची। वहाँ देखा किवाडों पर बाहरी साँकल लगी है . यानी घर में कोई नहीं है . शायद पति-पत्नी दोनों ही काम पर निकल गए होंगे। मैं लौट ही रही थी कि कहीं से आती आवाज ने मेरे पाँव रोक लिये। यह खिलौना के चलने की आवाज ही थी जो जमीन पर उसके पहिया रगड़ने से निकलती है। मैं आवाज की दिशा में कुछ ही चली कि बगल की झोपडी में से ,जिसके दरवाजे पर टटिया लगी थी आवाज साफ आने लगी। मैंने झाँककर देखा तो हैरान रह गई। जग्गू उसी हवाई-जहाज से खेल रहा था। अकेला अपने आप में तल्लीन। कभी मुँह से आवाज निकालते हुए उसे ऊपर की ओर ले जाता और फिर लहराता हुआ नीचे उतारता। कभी दाँए घुमाता तो कभी बाँए मोड़ता। वाहन के तेज व धीमे चलने की प्रक्रिया को उसके होंठों से निकली आवाज स्पष्ट कर रही थी। उसकी आँखें लक्ष्य की ओर तनी और होंठ बाहर की ओर फैले हुए थे। लगातार आवाज निकालने से होंठों के बाहर कुछ थूक भी निकल आया था जिसकी उसे परवाह नहीं थी। उस समय जग्गू मुझे मजदूर करमा का बेटा नहीं एयर-इण्डिया का पायलट लग रहा था। गुड्डन के पास बहुत सारे खिलौने हैं लेकिन इतनी तल्लीनता से और आनन्द के साथ खेलते हुए तो उसे मैंने कभी नहीं देखा। खिलौना भले ही गुड्डन का है पर उसको सार्थक जग्गू ही बना रहा था।

अचानक मैं लौट पड़ी। चुपचाप,.. दबे पाँव। मानो चोरी जग्गू ने नहीं मैंने की हो।

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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 5880472489784752402

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  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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