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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 93 से 95 // डॉ. विनीता राहुरिकर

प्रविष्टि क्रमांक - 93

डॉ विनीता राहुरिकर

1 : दान....

"ले लो न दीदी। मैं भीख नहीं मांगता। अगरबत्तियाँ बेचकर अपना और अपनी पत्नी का पेट पालता हूँ।" एक बूढ़ा मंदिर के बाहर अगरबत्ती का पैकेट उसकी ओर बढाकर दूसरी बार फिर गिड़गिड़ाया।

बुढापे, कमजोरी और अगरबत्तियों के पैकेट के झोले के वजन से उसकी पीठ झुक रही थी।

"नहीं चाहिए भैया।" सुरभि ने उसे टाल दिया।

"आपसे कमाए हुए बीस रुपये हमारे लिए बहुत मायने रखते हैं दीदी। इन्हीं पैसों से हम गरीब दो जून रूखी-सूखी खा पाते हैं।" बूढ़ा लगातार मिन्नतें करता जा रहा था।

"अरे आगे जाओ न बाबा। पीछे ही पड़ गए। अगरबत्ती की जरूरत नहीं है मुझे।" सुरभि झल्लाकर उस पर चिल्लाई।

बूढ़े की आंखों में बेबसी के आँसू भर आये। हताश होकर वह पलटा और थके कदमों से दूसरे लोगों के पास जाकर अगरबत्ती बेचने का प्रयत्न करने लगा।

सुरभि मंदिर में गयी। दान पात्र में सौ का नोट डाला और भगवान से प्रार्थना की-

"हे भगवान! इस बार तो बेटा बारहवीं अच्छे नम्बर से उत्तीर्ण हो जाये ग्यारह सौ रुपये चढ़ाऊँगी।"

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प्रविष्टि क्रमांक - 94

डॉ विनीता राहुरिकर

2: पुरुषत्व....

लोकल ट्रेन के उस डिब्बे में पाँच-छह लड़के तब से उसे देख देख कर भद्दे इशारे कर के जुमले कस रहे थे। उसकी शारीरिक कमी को इंगित करके उसका मजाक उड़ा कर खुद के पुरुषत्व की ईशारो ईशारो में बढाई कर रहे थे। वह बेचारा साड़ी के पल्लू को कंधे पर कसकर लपेटकर सीट के एक कोने में सिकुड़ कर दबा सह्मा हुआ सिर झुका कर बैठा था। चुपचाप सब सुनता हुआ। शायद होश संभालने के बाद से ही उसे इन्हीं बातों की आदत होगी। डिब्बे की अन्य सवारियां उसके अपमान का मौन तमाशा देख रही थी। सब उससे परे छिटककर ऐसे बैठे थे मानो वह कोई छूत की बीमारी हो।

तभी अगले सटेंशन से चार-पांच लड़कियां उस डिब्बे में चढ़ी और उसे देखकर उसके आस-पास ही खड़ी हो गई। लड़के अब उसकी जगह लड़कियों पर अश्लील छीटाकशी करने लगे।

" अरे उसके पास क्या मिलेगा वह तो . ..है। आओ यहां हमारे पास।" 

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लड़कों की बदतमीजी पर इतनी देर से मौन बैठा वह अचानक क्रोधित होकर तमतमा कर उठ खड़ा हुआ। खड़े होते ही उसकी कद काठी और बल देखकर लड़के सिटपिटा गए।

" यह हमारे कॉलेज के सामने चने आइसक्रीम बेचता है। मेहनत करके सिर्फ अपना ही पेट नहीं भरता बल्कि चार गरीब लड़कियों की फीस भी भरता है। इसकी वजह से कोई आवारा बदमाश लड़के हमारे कॉलेज के पास तक नहीं फटकते।" एक लड़की ने कहा।

" एक्स्ट्रा क्लास के कारण अगर हमें देर हो जाए तो यह हमें घर तक सुरक्षित पहुँचाता है तभी अपने घर जाता है।हम सब इसे राखी बांधती हैं क्योंकि वास्तव में यह हमारा रक्षक है।" दूसरी लड़कों की और हिकारत से देखते हुए बोली।

"पुरुषत्व शरीर का नहीं चरित्र का भाव है। और ठीक वैसे ही हिजड़ा आदमी तन से नहीं मन से होता है। इस देश को अब पुरुषत्व की नई परिभाषा गढ़ लेनी चाहिए"

उनका स्टेशन आ चुका था। वह लड़कियां और सर पर चने की टोकरी रखें उनका रक्षक नीचे उतर गए।

3 : सन्तान...

"अरे यह क्या है?" लाली ने भूरा से पूछा।

"बच्ची है। कोई कचरे के ढेर पर फेंक गया था।" भूरा बोला।

"तो..."

"तो क्या मुझसे इसका रोना देखा नहीं गया तो मैं इसे उठा लाया वरना यह रोते-रोते ही मर जाती बेचारी।" भूरा दुःख भरे स्वर में बोला।

"जिसने पैदा किया उसने फैंक दिया और तू उठा लाया तू भी न..." लाली बोली।

"क्या करूँ मैं इसे कचरे के ढेर पर मरने के लिए छोड़ नहीं पाया। इंसान नहीं हूँ न..." भूरा कुत्ता जीभ से चाटकर बच्ची को पुचकारने लगा।

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प्रविष्टि क्रमांक - 95

डॉ विनीता राहुरिकर


4 : भेदभाव....

बहुत दिनों से बेटी के बार-बार अनुरोध करने पर गीता का मन भी डोल रहा था  बेटी फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करना चाहती थी। गीता को याद आया वह भी तो फूड एंड न्यूट्रिशन की पढ़ाई करना चाहती थी लेकिन पिता को बस उसकी शादी की चिंता थी। बाकी सब बातें उनके लिए गौण थी। बी.ए. सेकंड ईयर में ही शादी कर दी उसकी लेकिन बीस बरस में जमाना बदल गया है। उसके टूट गए तो क्या वह बेटी के सपने जरूर पूरे करेगी। कुशाग्र बुद्धि की है बेटी जरुर सफल होगी।

"सुनो जी गुड़िया फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करना चाहती है" हिम्मत करके पति के सामने एक दिन बोल ही दिया।

" पर वह तो बहुत महंगा होता है इतने पैसे नहीं है मेरे पास" पति ने छूटते ही इनकार कर दिया।

" उसके विवाह के नाम पर पच्चीस लाख जमा तो कर रखा है।"

" पर वह तो उसके ब्याह के वास्ते हैं। उस पैसे को हाथ भी न लगाना खून पसीना एक करके जमा करा है।"

" उसी में से थोड़ा पढ़ाई में लगा दो विवाह में खर्चा थोड़ा कम करना। आखिर  हमारे लिए तो उसकी खुशी पहले है।"  गीता ने मिन्नत की।

"ब्याह में कम खर्चा करके बिरादरी में नाक कटवानी है क्या?  और फालतू के कोर्स करके क्या करेगी उससे बोल बी.ए. कर चुपचाप से और अच्छे घर में शादी करके जीवन सफल कर। लड़कियां उम्र रहते अपने घर चली जाएं वही ठीक रहता है।"

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" तो लड़के के इंजीनियरिंग के लिए रखे रूपयों में से दे दो। वह तो पढ़ने में इतना अच्छा भी नहीं है क्या फायदा उसे इंजीनियर बनाने में लाखों रुपया लगाने से।"

" पागल हुई है क्या?  बेटा तो बुढ़ापे का सहारा है वही आगे कमाकर खिलाएगा। खबरदार फिर से मुंह से ऐसी बात निकाली तो उसकी पढ़ाई तो पहले जरूरी है" पति गुर्राया।

"सच बात है सिर्फ लड़कों को पढ़ाना जरूरी है। और लड़कियों  का भविष्य तो बस शादी करके बच्चे पैदा करना ही हैं। मैं अपनी बेटी के साथ गलत नहीं होने दूंगी उसे पढ़ाई का पूरा मौका दूंगी। मेरे बाप ने मुझे नहीं पढ़ाया तो क्या हुआ लेकिन मुझे गहने दे कर मेरी बेटी की पढ़ाई का इंतजाम तो कर गया।"

कहते हुए गीता लॉकर से गहने निकालने चल दी।

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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