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मनोरंजक लोक कथाएँ - 4 - भालू ने अपनी पूँछ कैसे खोयी - नौर्स देशों की लोक कथाएँ-2// सुषमा गुप्ता


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4 भालू ने अपनी पूँछ कैसे खोयी[1]

यह लोक कथा नौर्स देशों के पाँच देशों में से नौर्वे देश की लोक कथाओं से ली गयी है।

बच्चो, क्या तुम जानते हो कि भालू करीब करीब हर जानवर पर जो भी उसको जंगल में मिलता है क्यों गुर्राता है? वह ऐसा हमेशा से नहीं था।

पहले जब भी कोई उसके पास आता था तो उसको देख कर वह बड़े दोस्ताना अन्दाज़ में अपनी लम्बी पूँछ हिलाता था जैसे कि कुत्ते हिलाते हैं और बहुत प्यार से बात करता था।

पर आजकल? आजकल ऐसा नहीं है। तो फिर वह ऐसा कैसे हुआ?

तो हुआ यों कि एक बार जाड़े के एक दिन में एक मछियारे ने बहुत सारी मछलियाँ पकड़ीं और उन सबको एक रस्सी में बाँध कर पानी में वहीं छोड़ दिया ताकि वे ताजा रहें।

चालाक लोमड़े ने यह देख लिया कि मछियारे ने मछलियाँ पकड़ीं और उनको पकड़ कर पानी में ही छोड़ दीं और वह चला गया। सो जब वह मछियारा उधर नहीं देख रहा था तो उसने उसकी उन मछलियों को चुरा लिया और उनको ले कर घर चल दिया।

घर जाते समय उसको रास्ते में बैठा एक भालू दिखायी दे गया। भालू ने लोमड़े को बहुत सारी मछलियाँ ले जाते देखा तो उसको देख कर उसने अपने दोस्ताना अन्दाज में उसकी तरफ अपनी पूँछ हिलायी।

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उसको वे मछलियाँ देखने और खुशबू में बहुत ही अच्छी लग रहीं थीं सो भालू ने लोमड़े से पूछा — “लोमड़े भाई, ये मछलियाँ तुमको कहाँ से मिलीं?”

लोमड़े ने झूठ बोला — “मिलेंगी कहाँ से? मैंने इनको पकड़ा है। ”

असल में लोमड़े को बहुत शरम आ रही थी क्योंकि उसको लगा कि भालू ने उसको वे मछलियाँ चुराते हुए देख लिया था। पर ऐसा कुछ नहीं था। भालू को तो यह पता ही नहीं था कि लोमड़े ने ये मछलियाँ चुरायी थीं।

भालू ने फिर पूछा — “लेकिन तुमने इनको पकड़ा कैसे लोमड़े भाई, झील तो सारी जमी पड़ी है?”

लोमड़े ने फिर झूठ बोला — “मेरे पास इनको पकड़ने का एक खास तरीका है। ”

भालू बोला — “ये मछलियाँ तो दिखायी भी बहुत अच्छी दे रही हैं लोमड़े भाई और खुशबूदार भी बहुत लग रही हैं। क्या तुम इनमें से थोड़ी सी मुझे भी दोगे?”

लोमड़ा बोला — “नहीं भाई। तुम अपनी मछलियाँ अपने आप पकड़ो। ”

भालू बड़ी नम्रता से बोला — “मैं भी ऐसी मछली पकड़ना चाहता हूँ। क्या तुम मुझको मछली पकड़ने का अपना वह खास तरीका बताओगे जिससे मैं भी इस जमे हुए बरफ में से ऐसी ही मछलियाँ पकड़ सकूँ?” और ऐसा कह कर उसने अपनी पूँछ फिर से हिलायी।

लोमड़ा भालू के साथ उस झील पर फिर से जाना नहीं चाहता था क्योंकि उसको डर था कि वह मछियारा कहीं उसको पकड़ न ले जिसकी मछलियाँ उसने चुरायी थीं।

पर उसको भालू का उसकी तरफ देख कर बार बार पूँछ हिलाना भी अच्छा नहीं लग रहा था सो उसने भालू से एक और झूठ बोलने का निश्चय किया।

लोमड़े ने भालू से कहा — “मछलियाँ पकड़ना बहुत आसान है भालू भाई। मैं तुम्हें बताता हूँ। पहले तुम बरफ में एक छेद करो फिर तुम उस छेद पर ऐसे बैठ जाओ जिससे तुम्हारी पूँछ उस छेद में नीचे गिर जाये। पर तुमको अपनी पूँछ पानी में काफी देर तक लटकानी पड़ेगी।

सो अगर तुम्हारी पूँछ को थोड़ी तकलीफ भी हो तो चिन्ता मत करना क्योंकि उस तकलीफ का मतलब होगा कि मछलियाँ तुम्हारी पूँछ को काट रही हैं। जितनी ज़्यादा देर तक तुम अपनी पूँछ पानी में रखोगे उतनी ही ज़्यादा मछलियाँ तुम पकड़ पाओगे।

जब तुम देखो कि अब तुम अपनी पूँछ हिला भी नहीं पा रहे हो तो समझना कि अब तुम अपनी पूँछ बाहर निकालने के लिये तैयार हो। बस फिर तुम एक दम से उठ कर खड़े हो जाना और जितनी जल्दी से अपनी पूँछ बाहर निकाल सको निकाल लेना। ”

उफ़, यह चालाक लोमड़ा भालू से कितना झूठ बोला?

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भालू ने उसको बड़ी नरमी से धन्यवाद दिया और एक बार फिर से अपनी लम्बी पूँछ हिलाता हुआ उस जमी हुई झील की तरफ चल दिया।

रास्ते में भालू ने एक मछियारे से बरफ खोदने वाला औजार और एक आरी उधार माँगी और उनसे उसने जमी हुई झील की बरफ में एक छेद किया।

जैसे लोमड़े ने उस मछियारे की बिना इजाज़त के उसकी मछलियाँ चुरा ली थीं भालू ने ऐसा नहीं किया।

जब भालू का छेद तैयार हो गया तो उसने उस मछियारे के औजार वापस किये और उससे इजाज़त ले कर वह उस छेद पर आ कर बैठ गया। उसने अपनी लम्बी पूँछ उस छेद में अन्दर डाल दी।

उतनी कड़ी सरदी में उस ठंडे पानी में अपनी पूँछ डाल कर बैठना उसको बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था पर वैसी ही सुन्दर, ताजा और खुशबूदार मछलियाँ पकड़ने के लिये वह यह भी करने को तैयार था।

वह बेचारा वहाँ तब तक बैठा रहा जब तक पानी ने उसकी पूँछ के चारों तरफ जमना नहीं शुरू किया।

पानी जमने की वजह से अब उसकी पूँछ में दर्द होना शुरू हो गया था तो उसको लोमड़े की बात याद आयी कि “अगर तुम्हारी पूँछ में थोड़ा बहुत दर्द भी हो तो चिन्ता मत करना, यह समझना कि मछलियाँ तुम्हारी पूँछ को काट रही हैं। ”

इसलिये वह वहाँ खुशी खुशी बैठा रहा और तब तक बैठा रहा जब तक उसकी पूँछ के चारों तरफ का पानी ठोस तरीके से जम नहीं गया।

जब भालू को लगा कि अब वह अपनी पूँछ बिल्कुल भी नहीं हिला पा रहा है तो उसने सोचा कि लगता है कि अब उसकी पूँछ से बहुत सारी मछलियाँ चिपक गयी हैं इसलिये अब खड़े होने का समय आ गया है। वह खड़ा हो गया और एक झटके से उसने अपनी पूँछ पानी में से बाहर खींच ली।

भालू तो बहुत ताकतवर जानवर होता है सो जैसे ही उसने अपनी पूँछ बाहर खींची वह बाहर तो निकल आयी। पर यह क्या?

उसकी पूँछ तो अभी भी पानी में रह गयी थी। वह इसलिये कि पानी में जमी रहने की वजह से उसकी पूरी पूँछ निकल ही नहीं पायी और झटके से खींचने की वजह से टूट गयी।

जो पूँछ उसकी बाहर थी उसमें कोई मछली नहीं थी और बाकी की पूँछ उसकी पानी के अन्दर ही रह गयी थी। बस अब तो वह एक बहुत ही छोटी सी पूँछ वाला जानवर रह गया था।

भालू को लोमड़े पर बहुत गुस्सा आया कि लोमड़े ने उसके साथ इतने नीच किस्म की यह चालाकी खेली।

उस दिन के बाद से भालू की पूँछ बढ़ी ही नहीं, वह उतनी की उतनी ही है। और तभी से वह जंगल में जब किसी से भी मिलता है तो उससे वह प्रेम का बरताव नहीं करता और हर एक पर गुर्राता ही रहता है।

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[1] How Bear Lost His Tail? – a folktale from Norway, Europe. Adapted from the Web Site

http://www.mikelockett.com/stories.php?action=view&id=63

Retold and written by Mike Lockett.

[A similar story is told by Americans also. Read it in published in the Book “America Ki Lok Kathayen-1” and “Aisa Kyon Hota Hai” by Sushma Gupta in Hindi language under the title “Bhaaloo Ne Apni Poonchh Kaise Khoyi”.]

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से सैकड़ों लोककथाओं के पठन-पाठन का आनंद आप यहाँ रचनाकार के  लोककथा खंड में जाकर उठा सकते हैं.

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