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ऐतिहासिक कहानी - “ न्याय की देवी अहिल्या बाई ” ⚫ शिव कुमार ’दीपक’

न्याय की देवी अहिल्या बाई

होल्कर वंश के संस्थापक, इंदौर के महाराजा श्रीमंत मल्हार राव होल्कर की पुत्रवधू एवं मालवा राज्य की कुशल व लोकप्रिय प्रशासिका  महारानी अहिल्याबाई होल्कर उदारता, न्यायप्रियता, धार्मिक सद्भावना तथा धार्मिक परायणता के लिए बहुत प्रसिद्ध थीं। इसी कारण प्रजा उन्हें आदर पूर्वक  ‘माँ साहिब’ कहकर संबोधित करती थी।फरियादियों के लिए राजदरवार में एक घण्टा लटका हुआ था। कोई भी पीड़ित घंटा बजाकर निडरता पूर्वक न्याय माँग सकता था।

देवी अहिल्या बाई होल्कर का कुँवर माले राव होल्कर बहुत ही उदंडी एवं जिद्दी स्वभाव का  था। एक दिन माले राव होल्कर राजबग्घी द्वारा तेजी से निकल कर जा रहे थे ,अचानक बग्घी पर नियंत्रण न होने से एक गाय का बछड़ा बग्घी से कुचल कर मर गया।  मृतक बछड़े की माँ पास में खड़ी फूट-फूट कर रो रही थी। कभी बछड़े को इधर से चाटती, कभी उधर से चाटती। गाय जोर-जोर से रभा रही थी और आंखों से आंसू बह रहे थे। मृतक बछड़े के पास काफी संख्या में गौ भक्तों की भीड़ लग गई।

कुछ गौ भक्त ब्राह्मण उस गाय को लेकर राज दरबार में आ गए और न्याय के लिए घंटा बजा दिया। राज दरबार में प्रजा की काफी भीड़ लग गई। मातेश्वरी अहिल्याबाई होल्कर भगवान शिव की पूजा अर्चना में मग्न थीं। पूजा के समय  न्याय के घंटे की आवाज सुनकर रानी दरबार में आयी और देखा कि - “घंटे की डोरी गाय के मुंह में लगी है , जो घंटे को जोर - जोर से बजा रही है”। गाय के आंखों से आंसू निकल रहे थे।

चारों तरफ लोगों की काफी भीड़ लगी हुई थी माँ साहिबा यह सब देख कर स्तब्ध हो गईं और कहा- “ हे गाय माता तुम्हें न्याय अवश्य मिलेगा “ भरे दरबार में उपस्थित प्रजा से घटना के बारे में पूछा - ”गाय के साथ क्या हुआ है ? ” सभी लोग शांत खड़े रहे। डर के कारण किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि राजकुमार की लापरवाही को कैसे बताया जाए? रानी ने पुनः कहा - “ डरो मत , निःसंकोच बताओ। क्या हुआ है ?  तब कहीं हिम्मत जुटाकर प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि “मां साहेब आपके पुत्र कुँवर मालेराव की राजबग्घी द्वारा इस गाय का बछड़ा कुचल कर मर गया है , गाय के साथ - साथ हम सब न्याय चाहते हैं “ पूरी घटना सुनने के बाद भरे दरबार में रानी ने गाय को न्याय देते हुए कहा - “ जिस स्थान पर गाय का बछड़ा मरा है , उसी स्थान पर माले राव होल्कर को लिटा कर बग्गी से कुचलकर मृत्युदंड दिया जाए “।

महारानी के सख्त आदेशानुसार कुँवर मालेराव के हाथ-पैर बांधकर घटनास्थल पर लिटा दिया गया। देवी अहिल्याबाई होल्कर की आज्ञा पर बग्घीवान ने यह पाप करने से विनम्रता पूर्वक साफ मना कर दिया। बग्घीवान की विवशता को समझते हुए न्याय प्रिय रानी ने स्वयं राज बग्घी पर बैठकर लगाम अपने हाथ में थाम ली। यह सब देख कर समस्त प्रजा कुँवर मालेराव के लिए दया की प्रार्थना करने लगी। चारों तरफ सन्नाटा छा गया। किसी भी अधिकारी में हिम्मत नहीं थी जो रानी को रोक सके। रानी दूर जाकर तेजी से बग्घी  दौड़ाती हुई बंधे पड़े मालेराव की ओर आ रही थी।

तभी प्रजा यह देख कर आश्चर्यचकित रह गई कि कुंवर की रक्षा के लिए वही गाय स्वयं बग्घी के सामने आकर खड़ी हो गई है। कुछ लोग तो कहने लगे कि भगवान ने गाय रूप में रानी के न्याय की परीक्षा ली है और रानी के न्याय से गाय खुश होकर मालेराव को बचाने आड़े आ गई है।

बग्घी के सामने गाय के आने पर रानी ने बग्घी को रोक लिया। बग्घी पर सवार रानी ने गाय को हटाने का आदेश दिया , लेकिन विनम्रता पूर्वक समस्त प्रजा व उच्च अधिकारियों ने देवी अहिल्याबाई होलकर से प्रार्थना करते हुए कहा - “ माँ साहिब ! जब गाय ने कुँवर मालेराव को माफ कर दिया है तो आप भी माफ कर दीजिए “ पहले तो रानी ने नहीं मानी लेकिन कुछ समय सोचने के बाद विधि का विधान समझ कर सभी की राय मान ली तथा मालेराव को माफ कर दिया। उसी समय से उस स्थान का नाम आड़ा चौक एवं उस बाजार का नाम आड़ा बाजार पड़ गया जो कि  आज तक प्रचलित है। न्याय की देवी मातेश्वरी अहिल्याबाई होल्कर का गाय के प्रति न्याय अद्वितीय एवं प्रणम्य है।

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शिव कुमार “दीपक”

बहरदोई ,सादाबाद

हाथरस (उ०प्र०)

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