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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 30 // यात्रा // सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

प्रविष्टि क्रमांक - 30

लघुकथा


यात्रा


सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा


          वे दोनों भाई थे क्योंकि उन दोनों को जन्म देने वाली औरत एक ही थी । जिसे वे  अपनी माँ कहते थे  ।

इसलिए दोनों एक ही घर में उसी  माँ  के आंचल की छाँव में रहकर बड़े हुए थे । उसका दूध उन दोनों ने पिया था ।

           एक दिन माँ नाम की वह  औरत , अचानक बीमार पड़ गयी ।

           माँ  दोनों की थी इसलिए दोनों ने मिलकर  तय  किया कि माँ  को डॉक्टर के पास ले जाना   चाहिए ।

           एक जाकर रिक्शा ले आया , दूसरे ने माँ को उस पर बिठा दिया । बीमार माँ, रिक्शा पर अकेले खुद को सम्भाल नहीं सकती थी इसलिए खुद भी उसके साथ रिक्शा पर बैठ गया । रिक्शे पर दो ही लोगों के बैठने की  जगह  थी । सो दूसरा चलते हुए रिक्शे के पीछे - पीछे पैदल ही दौड़ने लगा ।

             माँ बेहोश थी । बीच - बीच में दर्द से कराह उठती थी । उसकी कराहट सुनकर दोनों का मन कसैला हो उठता ।

             " भैया जल्दी - जल्दी पैर चलाओ । "  दौड़ने वाला भाई , कहता हुआ और तेज दौड़ने लगता । उसी समय रिक्शे पर बैठा भाई माँ के सर को ढककर सहलाने लगता ।

             माँ का दर्द बढ़ता जा रहा था । इसी बीच  उसने आँखें खोली । वह कुछ कहना चाहती थी । इससे पहले कि वह कुछ कह पाती उसका सिर ढलक गया । माँ की श्वासों के साथ दोनों की चीख भी निकली । रिक्शा वाला रुक गया ।

             " भैया अब आगे नहीं , माँ का सफर पूरा हो चुका है । अब हमें  वापस घर ले चलो । ' रिक्शा पर बैठे भाई ने कहा ।

              ' बाबू , हमारा रिक्शा  सवारी बैठाता  है , लाश नहीं ढोता । आप उतर कर कोई और इंतजाम कर लो  पर  उससे पहले हमारा  किराया चुका दो । '

              ' भाई ! माँ के शरीर को  लेकर घर वापस चलना है । इस रिक्शेवाले को  इसका किराया दे दो । ' रिक्शा पर बैठे भाई ने   दौड़ने वाले भाई से कहा ।

                दौड़ने वाले भाई ने एक क्षण  तक उसे देखा । जेब में हाथ डाला और फिर खाली ही बाहर निकाल लिया ।

                ' क्या हुआ ? इसे पैसे दो भाई ।  दूसरा इंतजाम करके जल्दी वापस घर लौटना है ।' रिक्शे पर बैठा भाई खीझ कर बोला ।

                ' दौड़ने वाले भाई ने थोड़ी देर अपने  अनमने चेहरे से बैठे हुए भाई को देखा , फिर  कहा , ' उतावले मत बनो । रिक्शा पर तुम बैठे थे , मैं तो पैदल दौड़ रहा था ।  इसलिए पैसे भी तुम्हीं दोगे । "

                 दोनों एक - दूसरे को क्रोध पूर्वक देखने लगे ।

                 स्थिति की भयावहता को समझ  कर रिक्शे वाले ने बीच में ही टोक दिया  , झगड़ा न करो । चिंता  की कोई जरूरत नहीं है । आपमें से कोई भी पैसे नहीं देगा । आप दोनों उस घर को वापस जाइये जो पहले  इस माँ का था और  अब आपका होगा  । इनके मृत शरीर को , मैं अपने इसी रिक्शे पर श्मशान घाट छोड़ आऊंगा  ।

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 4719636999598270369

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