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नागेन्द्र नाथ गुप्ता की ग़ज़लें

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1    ग़ज़ल

दूर  तुम क्या  हुए  जलजला  रह गया
उम्र भर के लिए  फलसफा रह गया।।

तुमने वादे किए हमने शिकवे किए
वायदा  जो  किये  वायदा रह गया।।

जब हमारी तुम्हारी थी मंजिल वही
मिल न पाए मगर दरमियां  रह गया।।

रिश्ते  बनते नहीं खुद बनाए खुदा
वो  फ़साना  नहीं  वाक़या  रह गया।।

दिल ने चाही मुहब्बत जुदाई मिली
दर्द  अपना मगर  अनसुना रह गया।।

दो किनारे न मिलते नदी के कभी
जिंदगी  भर  वही  फासला रह गया।।

सारी  पूंजी गंवाई कोई गम नहीं
हाथ  खाली  मगर  हौसला  रह गया।।

    
2
पतझड़ों में गुल कभी खिलते नहीं
आजकल वो सामने मिलते नहीं।।

दो किनारों की दिशा रहती अलग
छोर नदियों के कभी मिलते नहीं।।

किसको है परवाह दुनिया की यहां
प्यार जो करते कभी डरते नहीं।।

है बहुत मुश्किल रहे खामोश दिल
बिम्ब जल में बिन हिले रहते नहीं।।

आपकी मर्जी अलग मेरी अलग
आसमां  धरती  कभी मिलते  नहीं।।

खाक होती है कसौटी प्यार की
प्यार  में  शिकवे  गिले चलते नहीं।।

है कोई जिसकी तड़प भी आप हैं
बिन तुम्हारे रात  दिन  ढलते नहीं।।

जिंदगी की राह क्या आसान है
रहगुजर खामोश कुछ कहते नहीं।   


3        
पंछियों  का  आशियाना   देखिए
प्यार कुछ उनका  सुहाना  देखिए।।

आदमी का डर  सताता हर समय
खुद को दुश्मन से बचाना देखिए।।

है  मोहब्बत पे भरोसा इक उन्हें
उनके दिल में कर ठिकाना देखिए।।

गर्ज  पे  मायूस  करते  आदमी
रोनी   सूरत  कर  बहाना   देखिए।।

तीर  ख़ंजर हैं नहीं कुछ काम के
हर तरफ  हाज़िर  निशाना  देखिए।।

हम खिलाए प्यार की बगिया यहाँ
भौरों  का  दिल आशिकाना  देखिए।।

प्यार नफरत जंग मजहब हैं यहाँ
आज क्या गुजरा  ज़माना   देखिए।।


4
जिसको हरदम मुस्काना आता है
उसको  उलझन  सुलझाना आता है

रौनक महफिल की बढ़ती है अकसर
गर  पीना  और  पिलाना  आता  है।।

लोग खिलाफत  करते रहते उसकी
जिसको   केवल  गुर्राना   आता   है।।

गाडी  पटरी  से  उनकी ना  उतरे
गर फौरन याद बहाना आता है।।

दुनिया उसकी होती ज्यादा कायल
जिसको बस बात बनाना आता है।।

खुशियां उससे हर्गिज़ दूर न होती
जिसको गम दूर भगाना आता है।।

भाव  उसी  को  देती  है  ये  दुनिया
गर  हंसना और हंसाना आता  है।।


          
5     "अच्छा नहीं लगता"
              
किसी मुद्दे को भटकाना हमें अच्छा नहीं लगता
नफे नुकसान में जाना हमें अच्छा नहीं लगता।।

जुड़े  रहते जमीं से जो वही आलिम जमाने में
जमीं को छोड़ इतराना हमें अच्छा नहीं लगता।।

नहीं हमको तुम्हारे  प्यार पे पूरा भरोसा था
कसम हर बात में खाना हमें अच्छा नहीं लगता।।

तुम्हीं रहबर हमारे हो, तुम्हीं हो हमसफर अपने
उन्हीं बातों को दुहराना हमें अच्छा नहीं लगता।।

रिफा़क़त औ मुहब्बत के कई किस्से सुने हमने     (मैत्री)
तसल्ली दे के बहलाना हमें अच्छा नहीं लगता।।

नहीं क्यों गौर फरमाते जरूरी सामने मुद्दे
दिवाला कह मुकर जाना  हमें अच्छा नहीं लगता।।

जरूरत के  मुताबिक  हम  बनाते हैं नये रिश्ते
लिया जो कर्ज लौटाना हमें अच्छा नहीं लगता।।

दवा  देते  वहीं  जो  घाव  देने  में  रहे आगे
सहज को शोख ठहराना हमें अच्छा नहीं लगता।।


6
रस्तों  के  कांटे  हटाता  है  कोई
फूल पतझड़ में खिलाता है कोई।

उसकी हम ताकीद सुनते हैं कहाँ
दोस्त   बन  के  बचाता  है  कोई।

जब जरूरत तब दिखाये आईना
जुर्म - इकबाले  कराता  है कोई।

हम  ख़ता  करते  रहे नादान बन
दिन में  भी तारें दिखाता है कोई।

आदमी  कमजोर  उसके  सामने
असलियत तेरी छिपाता है कोई।

वक्त  अच्छा  बुरा  हो  फर्क क्या
प्यार  कर के मुस्कराता है कोई।

देते  हम  दस्तक  जरूरत पे उसे
नाम  ले -ले  के  बुलाता है कोई।।


7
जाने क्यों यूँ उदास दिखते हैं
चेहरे   से  हताश   दिखते  हैं।

वक्त  पे  रहनुमा  नहीं मिलते
सिर्फ खाली गिलास दिखते है।

झूठी  उम्मीद  का नतीजा  है
जिंदगी  से  निराश  दिखते हैं।

गर हकीकत पे हम नजर डालें
हम खुदी बदवहास दिखते है।

इंतिहा  प्यार  की  नहीं  होती
जख्म गहरे ख़राश दिखते हैं।

रिश्ते सीसे जैसे होते नाजुक
जुड़  गये  तो  खास होते हैं।

ख़त्म हो दूरी है यही कोशिश
लोग फिर अपने पास दिखते हैं।।


8
खिलाफत है दिल में, जुबां पे जहर है
मिली जो रियायत उसी का असर है।

न जन्नत समझते मगर मान लेते
जहन्नुम जो कहते ये कैसी नज़र है।

तेरी हैसियत खाक मेरी बला से
शराफत से रहना यही रहगुजर है।

नहीं  काम आएगी  कोरी  इबादत
कहाँ छोड़ी तुमने.कोई भी कसर है।

सुनो ध्यान से मशवरा है हमारा
चमन के बिना आज उजडा सज़र है।

हकीकत से अपनी न नज़रें चुराओ
तेरी  बद्दुआएं  यहाँ  बेअसर है ।।

उगलते जहर हो हिमाकत न करना
तुम्हारे लिए तो कहर ही कहर है।।

बनो रहनुमा तुम करो प्यार दिल से
सिखाया है किसने ये किसका असर है।।
           

9
अपने गीतों  में  जवानी आ गयी
फिर पुरानी वो कहानी आ गयी।।

छोड़ आए हम कभी थे प्यार को
लौट के खुशबू  सुहानी आ गयी।।

दिल बदलने से बदलती है फ़िजा
पास  उसके  रातरानी  आ  गयी।।

डोर जिसने सौंप दी उसको कभी
उस  इबादत  में रुहानी आ गयी।।

खूबसूरत  ज़िन्दगी  उसकी बने
जिसको करनी मेजबानी आ गयी।।

सोच  में होने  लगे  जब बेहतरी
चांद  सी उसमें  नूरानी आ गयी।।


10
फूल  खुशबू  लुटाते  रहे
भौरे  नजदीक  आते रहे ।।

जल गये देख खुशियां कई
लोग  मातम  मनाते  रहे ।।

हम  भी मजबूर बेबस हुए
दर्द  अपना  भुलाते  रहे ।।

उनको अफसोस हर्गिज नहीं
दूरियां   वो   बनाते  रहे ।।

इतनी नाराजगी किसलिए
नजरे डर डर मिलाते रहे ।।

दर्द सहने की आदत मेरी
जख्म  कितने रुलाते रहे ।।

उनकी मुश्किल समझ से परे
खैर  अपनी   मनाते  रहे ।।

कोशिशें  रंग लाए अगर
खतरे  हरदम उठाते रहे ।।

खुश रहे वो, दुआ है मेरी
क्यों न हंसते  हंसाते  रहे ।।

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परिचय -
नाम-      नागेन्द्र नाथ गुप्ता
पता-       B-1 / 204, नीलकंठ ग्रीन्स
              मानपाडा, थाणे ( मुंबई )
              पिन -  400610
गतिविधियां- कविता, गीत, ग़ज़ल लेखन,विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन,कवि गोष्ठी सम्मेलन में सहभागिता

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