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व्यंग्य // चुनाव ड्यूटी से आ गया हूँ ! // पूरन सरमा


मैं चुनाव ड्यूटी से सानंद और साबुत अपने घर लौट आया हूँ। आते ही पत्नी ने सवा पाँच रूपये का प्रसाद इस खुशी में अपने इष्टदेव को चढ़ाया और मेरी कुशलता की खैर मनाई। जाते समय अनेक अपशकुन हो गये थे। पहले जहाँ टीवी ने चुनाव में हिंसा भड़कने की सूचना दी थी, उसके साथ ही घर से निकलते ही बिल्ली रास्ता काट गई थी। मैं कंधे पर बिस्तर का बीटा टिकाये तथा हाथ में एक थैला लटकाये काफी देर तक किसी दूसरे आदमी के रास्ते से निकल जाने की प्रतीक्षा करता रहा, लेकिन किसी ने रिस्क नहीं ली। आखिर देर होती देख मैंने 'हनुमान चालीसा' का पाठ करते हुए दोस्तों को बेसब्री से इंतजार करते पाया। उनकी साँस से साँस आई कि चलो मैं भी आ गया। पीठासीन अधिकारी ने पहले से ही हैलमेट लगा रखा था। मैंने टोका भी यह मतदान के समय बतौर एहतियात के लगाना, लेकिन किसी अंजाने डर से नहीं उतारा। दूसरे साथियों को हैलमेट नहीं लाने का पछतावा हो रहा था, परन्तु हनुमान जी का स्मरण कर हम लोग ट्रक में बाँस बल्लियों सहित पेटियों के साथ सवार हो गये।
रास्ते भर अपने बचाव के उपायों पर विमर्श चलता रहा और निष्कर्ष हर बार यही निकल कर आया कि काम बहुत सावधानी से करना है। मतदान क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील है। बूथ कैप्चरिंग हो सकती है अथवा ईवीएम लूट कर हैक किए जा सकते हैं, यही क्यों हम पाँचों को बंधक भी बनाया जा सकता है, लेकिन आश्वस्त इसलिए थे कि सुरक्षा प्रबंध इस बार काफी माकूलता के साथ किया बताया। पुलिस के जवान साथ होंगे, कैसा घबराना ? लेकिन पीठासीन अधिकारी हैलमेट पर हाथ फेर कर बार-बार यही दोहरा रहे थे कि यह भारतीय पुलिस है, पता नहीं वारदात के समय कहीं थड़ी पर बैठ कर चाय तो नहीं पी रही होगी, लेकिन मैंने आश्वस्त किया था कि चुनाव का मामला है, जरा-सी भी अनदेखी और असावधानी नौकरी से हाथ धुलवा सकती है। इस बात से हम सबको काफी ढ़ाँढ़स भी मिलाता था। सर्दी वाली रात और खुला ट्रक, जिसमें बातों की गर्मी से रास्ता पार हो रहा था। यह तो तय था कि चुनाव सम्पन्न होने के बाद जो डी. ए. मिलेगा, उससे चार गुना डॉक्टर को दवाओं के देने पड़ेंगे, क्योंकि ठण्ड जुकाम व वायरल बुखार की चपेट में आना तो हर हालत में है ही। लेकिन यह राष्ट्रीय काम है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता। यह स्परिस्ट हमारे भीतर थी। इसी के सहारे हम मंजिल की और बढ़े चले जा रहे थे। जब सेना के जवान युद्ध में जान से हाथ धो सकते हैं तो क्या हम लोग चुनाव भी सम्पन्न नहीं करा सकते। यही हौसला लेकर हम मतदान स्थल पर आ पहुँचे।
बिलकुल उजाड़ में अधबनी स्कूल की एक छोटी-सी बिल्डिंग। लोकतंत्र का निर्णय यहीं होना था। हमारे पास कुल एक सौ छप्पन वोट थे। ज्यादा लफड़ा नहीं था।
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उम्मीद थी कि शत-प्रतिशत मतदान हो जाये, क्योंकि जब हम वहाँ पहुँचे तो पाँच सात नौजवान हँसते हुए वहाँ आये और पूछने लगे-'आ गये आप लोग चुनाव कराने ?' पीठासीन अधिकारी थोड़े सहमे। उन्होंने हैलमेट का बटन पुनः कसा और मुझे घबराहट के साथ देखा। मैंने आत्मविश्वास बटोरा और कहा-'हाँ, चुनाव हम ही करायेंगे! पुलिस हमारे साथ है, इसलिए निर्भीक मतदान की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता।' वे फिर हँसे, बोले-'घबराइये नहीं, किसी प्रकार की चिन्ता न करें। किसी चीज की आवश्यकता हो तो हमें बता दीजिएगा। वैसे यहाँ लोगों में ज्यादा उत्साह नहीं है। दूर-दूर से आना पड़ता है। अबकी बार चुनाव आचार संहिता का पालन प्रत्याशी पूरी निष्ठा से कर रहे हैं। इसलिए मतदाता उदासीन है। हमारा मतलब वोट देने का कोई फायदा तत्काल भी नहीं है और बाद में भी स्थिर सरकार बनने के आसार नहीं लगते।'
वे लोग चले गये। जान में जान आई। बूथ बनाये, ईवीएम पर मोहरें, वीवीपैट की सीलें देखी परखीं। मतदान प्रारंभ हुआ। दूसरे दिन सुबह दस बजे तक किसी ने कष्ट नहीं किया। इसके बाद वे ही पाँच लोग आये, बोले-'क्या पोजीशन है ?' हमने कहा-'ठीक है, आप लोग मतदान करिये।' वे बोले-'हम तो मतदान पर नजर रखने निजी तौर पर आये हैं। हमारा नाम मतदाता सूची में नहीं है।' उनकी बात सुनकर हम एक-दूसरे को देखने लगे। वे चले गये। तीन मतदाता आये, फिर कुछ-फिर कुछ। इस तरह शाम तक सत्तावन वोट डलवाकर ईवीएम-वीवीपैट उठाईं और हम लोग शाम को ही अविलंब रवाना हो गये। रात में सामान जमा करवाकर घर पहुँचे तो बच्चे जाग रहे थे। हरि कीर्तन कर रहे थे। मुझे छूकर देख और भली प्रकार से देखकर प्रभु का लाख धन्यवाद कर सो गये। चुनाव ड्यूटी से डर ज्यादा है, बाकी इस राष्ट्रीय कार्यक्रम को कर्तव्य बोध के साथ पूरे हौसले से किया जाये तो कर्मचारी सानंद और साबुत क्यों नहीं आ सकता।


(पूरन सरमा)
124/61-62, अग्रवाल फार्म,
मानसरोवर, जयपुर-302020,
(राजस्थान)

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