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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक १४ - “लीडरी” - लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक १४ “लीडरी”

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लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित


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सोमरस की ख़ाली बोतल नाले में फेंककर, मास्टर गिरधारी सिंह चीख़ उठे “आज़ से सब बंद।” फिर मास्टर राम रतन बोहरा को ज़बरदस्ती नाले की पाल पर बैठाकर, कहने लगे “मैंने फैंसला कर लिया है, अब अध्यक्ष की कुर्सी सबसे पहले, बाकी हर चीज़ बाद में।”

थैली से नयी दारु की बोतल बाहर निकाली..फिर बोतल का कर्क हटाया, और दारू के चार घूँट पीकर वे पुन: चहके “दुनिया का हर धर्म-शास्त्र कहता है ‘जीवन एक नाटक है।’ मैं इस कथन का, अपवाद बनना नहीं चाहता। जब सारा जीवन नाटक है, तो हो जाए नाटक ही।” राम रतन बोहरा का कंधा झंझोड़ते हुए, गिरधारी सिंह आगे कहने लगे “सुनते हो, भा”सा ? पहले मैं ज़िला अध्यक्ष बनूंगा, फिर मंडल अध्यक्ष..सुन लो कान खोलकर, जब मैं रिटायर्ड जाऊंगा ..तब छोडूंगा यह बोतल...फिर भा”सा, कर लूंगा धरम-करम भी।”

बेचारे मास्टर राम रतन फंस गए, इस पियक्कड़ के चक्कर में...एक तो साला पीता जा रहा है, और ऊपर से यह जनाब को ‘हाँ में हाँ’ मिलाने के लिए अलग से मज़बूर करता जा रहा है...इसके कहे-कहे हाँ में हाँ न मिलाये तो भगवान की कसम, क्या कर बैठे यह पियक्कड़..? इसकी हाँ में हाँ मिलाते बेचारे राम रतन भूल गए, ज़र्दे की फांकी लगाना। उन्हें अब एलिमेंटरी दफ़्तर के बाबू प्रदीप पर गुस्सा उबल पड़ा ‘वह क्यों उलझा, इस पियक्कड़ गिरधारी सिंह से..? साला प्रदीप, तू तो बड़ा कमीना निकला..वेतन-दिवस केंद्र पर तूने बैठे ठाले तिली सिलागाकर झगड़े की लाय लगा दी..और ख़ुद उठकर चला गया, अपने दफ़्तर..और इस पियक्कड़ को खुला छोड़ दिया, दारु पीने ?’

“भा”सा, छोडूंगा नहीं इस प्रदीप के बच्चे को। समझता क्या है, अपने-आपको ? कमबख़्त कहता है, अधिकारी से बात करो..आख़िर, नहीं बताया मुझे समर्पित बिल के बारे में ?” इतना कहकर, गिरधारी सिंह ने शेष बची दारु मुंह में उंडेलकर ख़ाली बोतल को फेंक दी नाले में। फिर आगे बकवास करते हुए, गिरधारी सिंह कहने लगे “अब ग्रामीण शिक्षक संघ के अध्यक्ष का चुनाव लड़ना तय, भा”सा। बस, कल से प्रचार शुरू..!” गिरधारी सिंह दारू के नशे में, बोल उठे।

“शाबास, मेरे शेर।” मास्टर राम रतन बोहरा बोल उठे “अब तुम सीख गए, इस जीवन का सही मतलब। दुनिया का हर आदमी एक हाथ से दौलत व पद बटोरता है, और दूसरे हाथ से थोड़ा-बहुत दान-पुण्य भी करता है। मुझे खुशी है कि, तुम वक़्त पर चेत गए। मेरी बातों पर तुम चले तो वह दिन दूर नहीं, जब तुम युनियन की प्रांतीय-अध्यक्ष पर कुर्सी पर बैठोगे।” ऐसे पियक्कड़ के साथ झगड़ा न करके, उसकी मस्कागिरी करने में ही अपना हित है। इस बात पर अमल करते हुए, राम रतन बोहरा ने मक्खनबाजी का कथन गिरधारी सिंह को कह डाला। जिससे गिरधारी सिंह हाइड्रोजन से भरे बेलून की तरह आकाश में उड़ने को छटपटाने लगे, मगर यहाँ तो यह ऐसा बेलून ठहरा जिसकी डोर का एक सिरा चोखट से बंधा है। फिर, गिरधारी सिंह बोले “मैंने निश्चय कर डाला भा”सा, अब मैं आपके बताये रास्ते पर ही चलूँगा। यदि आप कहेंगे, घास खाओ तो मैं घास भी खा लूँगा।”

“ख़ाक खाओगे..?” मास्टर राम रतन बोहरा ऐसे बोल पड़े, मानो उन्हें खट्टी डकार आयी हो ? उन्होंने, आगे कह डाला “यह तो तब पत्ता चलेगा, जब तुम ज़िला अध्यक्ष बन जाओगे।” इस दफ़े ऐसी खट्टी डकार आयी, राम रतनजी को..जिससे वे बेचारे, अतीत के सागर में गौते खाने लगे।

हमेशा की तरह महीने की एक तारीख़ को मिडल स्कूलों के हेडमास्टर, पाली शहर की मेला दरवाज़ा मिडल स्कूल में कबूतरों के झुंडों की तरह इकट्ठे हो गए। यह स्कूल वेतन केंद्र होने के कारण, इस स्कूल के दफ़्तर के बाहर..हाथ में बैग लिए हेडमास्टर, छितरा गए। कोई इधर खड़ा, तो कोई उधर खड़ा..बस, चारों तरफ़ ये बुद्धिजीवी ही नज़र आने लगे। दफ़्तर में बैठा, बेचारा खाज़िन महेश कुमार शर्मा गर्मी के मारे पसीने से नहा गया। एक तरफ़ तो इन बुद्धिजीवियों का एक-एक करके उसके ऊपर गिरना, और दूसरी तरफ़ संगृहित बिल का योग, वाउचरों के योग से मेल नहीं खा रहा था। वह बेचारा, चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था “योग नहीं मिल रहा, अब ख़ाक बांटू..रुपये ?” पास बैठे प्रदीप को टिल्ला मारकर, वह कह उठा “यार प्रदीप, तेरे वाउचरों की टोटलें आपस में मेल नहीं खा रही है..?”

उसको झल्लाते हुए देखकर, प्रदीप सीट से उठा, और पास खड़े हेडमास्टरों और शिक्षकों को धक्का देकर कमरे से बाहर निकालने लगा। उनको बाहर निकालकर, फिर वापस आया महेश के पास। और, उसके नज़दीक आकर कहने लगा “इस कमबख़्त जस्सिये को आती नहीं है जोड़े लगानी, फिर इसने काहे हाथ डाला वाउचर बनाने में ? साला आ गया यहाँ, टेस्ट-ट्यूब बोर्न कोटे से ? नक़लें मारकर की होगी इसने, दसवी पास।”

बेचारे गिरधारी सिंह कब-तक कमरे के बाहर खड़े रहते, बेचारे ठाकुर साहब का वेतन तो गया खटाई में..मगर, अब आवेदन किया हुआ समर्पित बिल का भुगतान तो उठना चाहिए। आख़िर बेचारे इन्तिज़ार न पाए, झट कमरे के दरवाज़े को धकेलकर वे अन्दर तशरीफ़ ले आये। आते वक़्त प्रदीप की बात उनके कानों में गिरी, जो बाबू जस्सा राम को कोमेंट कसता हुआ कुछ कह रहा था। प्रदीप की बात सुनकर, उन्होंने अपने लबों पर व्यंगात्मक मुस्कान बिखेरी और प्रदीप का कटाक्ष करते हुए बोल उठे “राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास करके आपने कौनसा तीर मार लिया, बाबू साहब ? आप तो थर्ड ग्रेड अध्यापकों से भी कम वेतन उठाते हैं, तुम सालों को सरकार ने बना डाला एक तरह से चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी। दफ़्तर में आकर चार फाइलें क्या मार ली तुमने, और बन गए शेर..?” गिरधारी सिंह को तो पहले से ही गुस्सा आ रहा था इस प्रदीप पर, वे सोच रहे थे “इस साले में इतनी हिम्मत कहाँ से आ गयी, उनको कमरे से बाहर निकालने की ..? इन कमबख़्तों को कहाँ है सलीका, किसी राष्ट्र के कर्णधार के सामने कैसे पेश आया जाए ? आख़िर, शिक्षक है क्या ? राष्ट्र का निर्माता, और क्या..?”

“मास्टर साहब, आप बाहर जाइए। हमें डिस्टर्ब मत कीजिये।” कड़े लफ़्ज़ों में, प्रदीप बोला, जिससे गिरधारी सिंह का सोचना स्वत: बंद हो गया। बस, फिर क्या ? वे झट तुनककर, बोल उठे “आपको पहले बताना होगा, जिसके कारण मैं यहाँ एक घंटे से खड़ा हूँ। बताइये, मेरे सरेंडर बिल का भुगतान उठा या नहीं ?” टेबल पर मुक्का मारते हुए, गिधारी सिंह गुस्साये शेर की तरह दहाड़ते हुए बोले। कहीं माहौल बिगड़ न जाय, इस आशंका को लिए लेखाकार घसीटा राम झट सीट से उठे, फिर गिरधारी सिंह को कमरे से बाहर एक तरफ़ ले जाकर समझाया और उनका गुस्सा किसी तरह शांत किया।

शाम के क़रीब अब पांच बज गए, तब कहीं जाकर टोटलें मिली। और फिर बाद में, हेडमास्टरों को वेतन एवं अन्य भुगतानों का पेमेंट हुआ। तब बेचारे राम रतनजी अपनी स्कूल का भुगतान उठाकर, वहां से रवाना हुए।

घर आकर बेचारे राम रतन बोहरा ने जैसे ही अपना बैग अलमारी में रखा, तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई और गिरधारी सिंह के पुकारने की आवाज़ उनको सुनायी दी। वे झट अलमारी को लोक करके झट बाहर आये, सामने उनको गिरधारी सिंह मोटर साइकल पर बैठे नज़र आये...जो उन्हें आवाज़ देकर, बुला रहे थे। उनको देखते ही, गिरधारी सिंह ने ताना देते हुए कहा “वाह यार, भा”सा। अकेले-अकेले वेतन उठाकर चल दिए, अपने घर..? कम से कम आपको, हम जैसे गरीबों का भी ध्यान रखना चाहिए।” फिर, चहकते हुए आगे कहने लगे “वाह यार, क्या कहें तुम्हे ? तुम तो यार डी.ई.ओ. साहब के पी.ए. बने फिरते हो..? इससे, हमें क्या फ़ायदा ? कम से कम तुम हमारी दोस्ती के ख़ातिर, हमारे पद का बज़ट तो निदेशालय बीकानेर से मंगवा लेते..? तब यार, हमारा भी वेतन उठ जाता और हम भी आपके दर पर रोज़ सुबह-शाम आपको धोक धोक लगा जाते।” उनकी बात सुनकर, बेचारे राम रतन बोहरा किंचित-कर्तव्यमूढ़ होकर सोचते रहे “मैंने अपने स्टाफ़ की सेलेरी उठायी, मेरे वेतन उठाने से इसे क्यों जलन हुई..? इसे वेतन नहीं मिल रहा है, तो इसमें मेरा क्या दोष..? कमबख़्त डेड होश्यारी करके जी.ओ. करवाकर आ गया, मिडल स्कूल पुरानी कचहरी में..? साले ने इतना भी नहीं सोचा एक बार, वहां उसके योग्य कोई पोस्ट है या नहीं ? इस मर्दूद को सोचना चाहिए, वहां हेडमास्टर की पोस्ट व्याख्याता समकक्ष है..फिर इस बेवकूफ़ का वेतन, वहां कैसे उठेगा..? अब तो ऐसे आदमी को, कोहनी पर गुड़ लगाकर ही मारना अच्छा।”

“आख़िर यार, तुम तो जागीरदार हो..यार। क्या कमी है, आपको..? वेतन जैसी चीज़ तो आप जैसों सरदारों के लिए, ज़ेब-खर्ची है। मगर, हमें तो महीने-भर गृहस्थी की गाड़ी गुड़कानी पड़ती है।” राम रतन ने दुशाले में लपेटकर, व्यंग-बाण दे मारा।

“छोड़ो भा”सा। आज़ तो मूड ख़राब है, साले इस प्रदीप ने मेरा अच्छा-ख़ासा मूड ख़राब कर डाला...अब तो यह मूड गुटका खाने से ही ठीक होगा। और वह भी, गुटका खिलाओगे आप।” गिरधारी सिंह ने कहा, और आगे यह भी पूछ डाला “मंजूर तो है, कहीं गुटका खिलाने से आपका दिल तो नहीं दुखेगा..?”

“क्या गुटके जैसी छोटी बात करते हो, अरे यार ऐसी बात करना जागीरदारों को शोभा नहीं देता। फिर तुम तो यार, कुम्पावत ठाकुरों के ख़ानदान से ताल्लुक़ात रखते हो..फिर, यार आपके मुख से ऐसी ओछी बात..राम राम ?” राम रतन बोहरा ने मस्का-मार व्यंग-बाण का उपयोग, आख़िर कर ही डाला...और फिर, आगे बोलते गए “आपके बुजुर्गों को राजा कर्ण की बेला किसी ब्राह्मण के दर्शन हो जाते, तो वे उसको पूरा गाँव दान में दे देते।” मस्का लगाकर उन्होंने बेचारे ठाकुर गिरधारी सिंह को चढ़ा दिया सूली पर, और फिर वे मन-ही-मन बोल उठे “चढ़ जा बेटा सूली पर, भला करेगा राम।” चपरकनातियों के वंश को मात देकर, राम रतन बोहरा ने गिरधारी सिंह के मुख से कहलवा दिया “भा”सा, अब तो आपको चलना ही होगा, सूरज-पोल। वहां, गुटका क्या ? जनाब की ख़िदमत में, रबड़ी भी हाज़िर।”

इस पाली शहर में सूरज-पोल एक ऐसा स्थान है, जहां निक्कमों की चहल-पहल बनी रहती है। कोई चाय की दुकान पर तो कोई पनवाड़ी की दुकान पर, और कोई चटोरा होगा तो वह रबड़ी की दुकान पर ज़रूर नज़र आ जायेगा। इसके साथ-साथ पनवाड़ी की दुकान की पास वाली गली में, इन पियक्कड़ों के लिए दारु का ठेका भी मौजूद..! जो हर-वक़्त खुला रहता है, गिरधारी सिंह जैसे पियक्कड़ों के स्वागत के लिए।

आख़िर, गिरधारी सिंह राम रतन बोहरा को ले गए, रबड़ी की दुकान पर..वहां गिरधारी सिंह ने दुकानदार से रबड़ी से भरा एक पंजाबी ग्लास लेकर, उनको थमा दिया। रबड़ी चढ़ाकर, राम रतन बोहरा ने अपने होंठों पर ज़बान फेरकर उन्हें साफ़ किया...और फिर, उनसे पेट भर जाने की बात कही। सुनकर गिरधारी सिंह ठठाकर हंस पड़े, और कहने लगे “यार भा”सा आज़-तक मैंने तुम्हारे बारे में ऐसा नहीं सोचा कि, तुम तो इतने छोटे पेटू निकले। अब क्या कहूं यार, तुम्हारे दादाजी चरी भरकर मलाई वाला दूध गटका जाते..और उसके बाद जाते, न्यात का जीमण जीमने।” इतना कहकर, गिरधर सिंह लगे चहकने “तुम्हें जान लेना चाहिए, भा”सा। अब तुम किसी पाकेटमार के सेक्रेटरी नहीं हो, यूं वुड बी पी.ए. ऑफ़ युनियन प्रेसिडेंट ऑफ़ टीचर्स। अब तुमको, अपनी तोंद का घेरा बढ़ाना होगा।” अब बताइये आप, कैसा रहा हमारे गिरधारी सिंह के दर्शन का ज़वाब।

रबड़ी की दुकान के बिल्कुल सामने एक गली है, जहां दारू के ठेके पर बैठा चपरासी मोहम्मद शफ़ी चंचल-चपला जोगनियों को बोतल में उतार रहा था।

“बाबू साहब, दो-दो रुपयों में जोगनियाँ ओढ़ना बिछाने का काम नहीं करती..ऐसा ही शौक है तो, चले जाओ मिरासिनियों के पास।” एक जोगन, कटीली मुस्कान होंठों पर फैलाकर कह रही थी। तभी मोहम्मद शफ़ी से सटकर खड़ी दूसरी जोगन, जो क़रीब २५ साल की होगी..उसने झट मोहम्मद शफ़ी के हाथ में थामे दस के नोट को छीनकर, झट अपनी चोली के अन्दर डाल दिया। फिर गीत गाती हुई, कहने लगी “चोली के नीचे क्या है, चोली के नीचे है मेरा दिल..दूंगी मैं अपने यार को..” मगर मोहम्मद शफ़ी को इस फूहड़ गीत से, क्या लेना-देना ? बस उसने झट बढ़ा दिया हाथ, वापस नोट को लेने के लिए..? और साथ में अपनी लाल-पीली आँखों को नचाकर, कह उठा “साली निखेत रांड, दो रुपये छोड़ तूझे चवन्नी बख़्सीस न देऊँ।” रबड़ी की दुकान पर खड़े ग्राहक, उसकी हरक़त देखकर हंस पड़े..मगर, ठाकुर गिरधारी सिंह को यह फूहड़ खेल कैसे पसंद आता..? आख़िर इस इलाके के राजपूतों के ख़ानदानों में, ठाकुर गिरधारी सिंह अपना अच्छा-ख़ासा वर्चस्व था। कोई भी जाति-बन्धु जब-कभी इनसे मुलाक़ात करता, तो इनके साथ सम्मान के साथ पेश आता। अब इनके सामने ही कोई शिक्षा विभाग का कर्मचारी बेहूदी हरक़त करता नज़र आ गया, यह कैसे बर्दाश्त करते ठाकुर साहब..? बस, जनाब वहीँ से गरज़ उठे “ओय शाफ़िया, साला मिरासनी का जाया..विभाग की इज़्ज़त बढ़ा रहा है, मरदूद..?”

ठाकुर गिरधारी सिंह की गरज़ती आवाज़ को सुनकर, बेचारा मोहम्मद शफ़ी थर-थर कांपने लगा। फिर, क्या ? दौड़ता हुआ आया वहां, और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया..गिरधारी सिंह के सामने। मोहम्मद शफ़ी के बदन पर सिल्क का चूड़ीदार पायजामा और लखनबी अंदाज़ का कुर्ता, शोभा दे रहा था। फिर उसके खिचड़ी बालों को ढके रेशमी गोल टोपी, चार चाँद लगा रही थी। झट ठाकुर साहब के सामने मोहम्मद शफ़ी ने मिरासाई अंदाज़ में सलाम ठोककर, ख़ुदा से उनके हज़ार साल ज़िंदा रहने की दुआ मांग बैठा। मोहम्मद शफ़ी के मक्खन से लबरेज़ हर अल्फ़ाज़ पर, गिरधारी सिंह का दिल बाग़-बाग़ हो गया। उसकी गुस्ताख़ी को नज़र-अंदाज़ करके गिरधारी सिंह ने, उसे एक खाली थैली और एक नोट सौ का हाथी छाप थमा दिया।

“हुज़ूर, गुस्ताख़ी माफ़ हो, इस बन्दे के सूखे होंठों का भी ख़्याल कीजिये..इनायत होगी अल्लाह आप पर मेहरबान होगा।” मोहम्मद शफ़ी ने थैली और सौ का नोट थामकर, अपनी मांग ठाकुर साहब के सामने प्रस्तुत कर दी।

“हट मरदूद, ले पकड़..और अब जल्दी लेकर आ वापस।” इतना कहकर, गिरधारी सिंह ने दस-दस के पांच नोट उसे और थमा दिए। “अभी लाया हुज़ूर, आपकी ख़िदमत में आपकी गुलाब, केसर..।” इतना कहकर, नोट और थैली लिए मोहम्मद शफ़ी फ़टाफ़ट भगा...दारु के ठेके की तरफ़। इस कमबख़्त मोहम्मद शफ़ी को, नोट क्या मिले..? वह तो अपने-आपको रेसकोर्स का घोड़ा समझ बैठा। शफ़ी के जाने के बाद, गिरधारी सिंह ने राम रतन बोहरा से पूछ लिया “भा’सा, मुझे भाषण कितनी जगह देना होगा..?”

राम रतन बोहरा बोले “देखो जागीरदारों। यह है चुनाव, यानी मरने-जीने का सवाल। एक-दो दिन में नामांकन भरना है, तुम्हें फिर दिन-रात भाषण ही भाषण ही देने हैं.. भाषण सुनने वाले अध्यापकों से लम्बे-चौड़े वायदे करने होंगे, और साथ में अपने भाषण में इन दफ़्तर के बाबूओं और अफ़सरों को गालियाँ देते रहना है। वायदों की फ़ेहरिस्त, मैं तुम्हारे लिए बनवा दूंगा।”

“मगर यार, भा”सा..तुम इतने सारे भाषण तैयार करवाते, मेरी लंगोटी तक बिकवा दोगे यार ?” गिरधारी सिंह कुछ रुआंसे होकर, बोले। मगर, यहाँ तो राम रतन बोहरा थे काईयां..यानी तू डाल-डाल, और मैं पात-पात। यहाँ तो राम रतन बोहरा ने सोच रखा था, तेरे हर बोल पर मेरा ज़वाब तैयार..फिर क्या ? जनाब बोल उठे “मैं बिकने दूंगा, तब बिकेगी।” और, आगे राम रतन कहते गए “”अभी तुमने लीडरी के हाथ, देखे कहाँ है ? जागीरदारी करके, भोले-भाले किसानों को लूटते आये हो ? ज़िलाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठकर, अध्यापकों की जेबें काटनी सीख जाओगे। एक तरफ़ कैसे बाबू और अफ़सरों से मेल-मुलाक़ात रखना, और दूसरी तरफ़ उनको गालियाँ थोक में निकालकर इन भोले-भाले शिक्षकों को दूहना..सब सीख जाओगे प्यारे..समझे ? इस उस्ताद का साथ रहा तो तुम इस सियासती खेल के शातिर खिलाड़ी बन जाओगे, समझे ?” तभी राम रतन बोहरा की नज़र, सामने पान की दुकान पर गुटका अरोगते चपरासी छगन पर गिरी..उसे देखते ही, उसे बुलाने के लिए उन्होंने जोर से आवाज़ दी “छगन..! अरे, ओ छगनिया।”

राम रतन बोहरा की स्कूल थी, मिल चाली के पास। वहां उनकी स्कूल में काम करने वाला यह चपरासी छगन लाल, था बड़ा एक नंबर का मक्कार...जिसका चेहरा ऐसा, मानों धूर्तता उसका सीना फाड़कर बाहर टपक पड़ी हो..? वह उनके स्कूल का काम भी देखता था, और उनके पाँव भी दबाता था। यूं तो वह, उनका गला दबाने के बारे में भी कई बार सोच चुका था। मगर, जब भी ऐसा सोचता, उसकी आँखों के सामने “डेपुटेशन” शब्द घूम जाता। बदक़िस्मती से वह इनकी स्कूल में बिना पद ही काम कर रहा था, बेचारा काम यहाँ करता और इसकी सेलरी उठती किसी दूसरी स्कूल में। और वह स्कूल भी यहाँ से कोसों दूर, अगर उसका डेपुटेशन ख़त्म हो गया तो..? बेचारे को, वापस उस दूरस्थ स्कूल में जाना होगा। जाने की बात दिमाग़ में आते ही, वह सिहिर उठता। मगर यहाँ राम रतन बोहरा ने उसे आश्वासन दे डाला था कि, उनके साथ रहता हुआ वह होश्यार हो गया तो..वे ज़रूर इस स्कूल में उसके लिए स्थायी पोस्ट मंगवा देंगे। यही कारण था, उसके हाथ उनके गले तक आते-आते रुक जाते थे। अन्यथा बीस तरह की खोपड़ी वाले अध्यापक जिस स्कूल में हो, और वे भी हर वक़्त उसे प्रवचन  देने वाले...जो हर वक़्त बिना मांगे, उसको अनमोल वचन सुना जाते..वहां रहना, उसके लिए कोई खेल नहीं। खैर, छगन ने अपने गले का तावीज़ ठीक किया, फिर राम रतनजी के पास आकर खड़ा हो गया। तब राम रतन बोहरा बोले “तुरंत जाओ, और उन पाँचों भाइयों को नाले के पुल पर ले आओ।” छगन जैसे ही वहां आया, वैसे ही वह वहां से चला गया।

“ये पाँचों भाई क्या बला है, भा”सा ? कहीं हफ्ता माँगने वाले, बम्बई के कोई टपोरी तो नहीं है ?” गिरधारी सिंह ने, अपना संदेह प्रकट किया। सुनकर, राम रतन हंस पड़े और कहने लगे “तुम्हारी भरपाई करने की कोशिश कर रहा हूँ, देखो तुम अपने प्रचार में टेम्पलेट छपवाओगे। गाँव-गाँव से अध्यापकों को, वोट पटकाने के लिए बुलाओगे। इन सबके के लिए, किसी जीप या कार को भी बुक करोगे..? इस काम में, खर्चा तो होगा ही..! अब तुम समझ लो, ये पाँचों ही भाई बड़े धूर्त हैं..अफ़वाहें फैलाने का काम, इनके बाएं हाथ का खेल है।”

“इनको कौनसा काम सौंपेंगे, आप ?” गिरधारी सिंह ने, राम रतन से सवाल किया।

“देखो भाई। बात यह है..” राम रतन बोहरा आगे कहते गए “तुम्हें बनना है ज़िलाध्यक्ष, और मुझे बनना है तुम्हारा सेक्रेटरी। इसलिए, तुमको प्रशिक्षण भी देना ज़रूरी है। राजनीति के लिए, बहुत उम्दा मगर शैतान किस्म की खोपड़ी की ज़रूरत होती है। कोई मरे या कोई जीये, किसी अध्यापक का एरियर बिल बने या उससे वसूली हो..इसके चक्कर में पड़ना, शिक्षक संघ के नेता का काम नहीं। उसका काम है, किसी तरह से अपना उल्लू सीधा करना। इसलिए सौ-पच्चास छुट्टियों की क़ुरबानी देनी पड़े, तो ग़म नहीं। अच्छा नेता वही है, ‘जिसके पास कहने के लिए सभी गुण है, मगर करने के लिए एक भी नहीं..समझे ? मैं अब इन पाँचों भाइयों को काम दूंगा, अफ़वाहें फैलाने का। वे मेरे कहे अनुसार, अफ़वाह फैलायेंगे कि ‘ठाकुर गिरधारी सिंह ज़रूर चुनाव जीत जायेंगे। उन्हें देवी भवानी सिद्ध है, वह उनको रोज़ रात को दर्शन देती है। देवी के आशीर्वाद से वे शिक्षक संघ के अध्यक्ष बनेंगे, फिर मंडल अध्यक्ष और बाद में प्रांतीय अध्यक्ष।’ फिर, उनका क्या कहना ? ख़ुद उदय सिंह राठौड़ आएगा इनके दरबार में, और इनसे मिन्नत करता हुआ इनसे कहेगा “हुज़ूर, कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष की कुर्सी ख़ाली कर रहा हूँ, मेहरबानी करके आप इस कुर्सी पर बिराजिये।” फिर, पल-भर राम रतन बोहरा रुके कुछ सोचने के लिए। उतावली में गिरधारी सिंह बोल उठे “फिर क्या ? आगे कहिये, भा”सा।”

“आगे क्या ? पकड़ो वो थैली, शफ़िया थैली लिए आ रहा है..फिर चलो, नाले के पुल पर।” हाथ में थैली लिए शफ़ी को आते देखकर, राम रतन बोहरा बोल पड़े।

“क्या खट्टी डकारे खा रहे हो, भा”सा ? ऐसे तो हमारे गाँव का सांड, भी नहीं रंभाता।” गिरधारी सिंह ने, राम रतन बोहरा से कहा। फिर उनको चुप पाकर, उनका कन्धा झंझोड़ा। कन्धा झंझोड़ते ही राम रतन बोहरा अतीत को छोड़कर, वर्त्तमान में लौट आये। आँखें मसलकर, उन्होंने पाल पर बैठे पाँचों भाइयों को देखा। अब गिरधारी सिंह ने दारु की नयी बोतल का कार्क हटाया, फिर थैली से ग्लासें बाहर निकालकर उसमें दारु डाला। पाँचों भाईयों को ग्लासें थमाने के बाद, बोतल में बची शेष दारु मुंह में उंडेलकर वे राम रतन से बोले “भा”सा, ये पाँचों ही भाई, हमारी टाइगर बिरादरी के ही हैं। अक्सर महफ़िल जमती है इनके साथ, कभी इनके दीवानख़ाने तो कभी हमारे दौलतख़ाने। यार भा”सा, अब तो तुम्हारे साथ हमारी दोस्ती और इनके साथ हमारी हम-प्याला दोस्ती ज़रूर चुनावी रंग लायेगी।”

इस तरह गिरधारी सिंह के चहकने से, राम रतन बोहरा को लगने लगा, “कहीं उनके बदन में, सौ-सौ सूंई चुभा दी गयी हो..? कब से बेचारे एक पियक्कड़ से परेशान थे, अब तो इनके टाइगर बिरादरी के पाँचों भाई और टपक पड़े। क्या करे, राम रतन बोहरा ? उन्होंने खुद ने बुलाया इन सबको, अब वे किस को दोष देते ? अब एक ही बात उनके दिल में शूल की तरह चुभने लगी “ख़ुद कीजे कामड़ा, फिर किसको देवे दोष..?”

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)


पाठकों।

यह अंक १४ लीडरी आपको बहुत पसंद आया होगा ? चाहे कोई भी क्षेत्र हो, नेता के लिए सियासती चालों का शातिर खिलाड़ी होना बहुत ज़रूरी है। न तो उसके विरोधी, उसकी लंगोट उतारकर उसे ले भगेंगे। अब आप अगला अंक १६ “पांच भाई का कारनामा” पढ़ेंगे। जिसे पढ़कर, आप ख़ूब हसेंगे। संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा’ के अंक, आपको कैसे लग रहे हैं ? आप एक टिप्पणीकार की तरह, मुझे मेरे निम्न ई मेल पर अपने विचार ज़रूर भेजें।

शुक्रिया।

दिनेश चन्द्र पुरोहित

२८ दिसम्बर २०१८

[ई मेल – dineshchandrapurohit2@gmail.com और dineshchandrapurohit2018@gmail.com ]

राजवीणा मारवाड़ी साहित्य सदन,

अँधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने,

जोधपुर [राजस्थान].

२८ दिसम्बर २०१८

संस्मरण 1219215990661828949

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