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दर्शन लेख ... सुहानी रात ढल चुकी ... कमल किशोर वर्मा

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संसार बहुत विचित्र है और विचित्र है लेखकों रचनाकारों की कल्पना ! विश्व के कण कण में एक संदेश है । सिर्फ उसे खोजने वाली बुद्धि चाहिये !
कोई लेखक, कवि, रचनाकार कुछ भी लिख देता है तो उसका अर्थ पढ़ने सुनने वाले की योग्यता और मानसिक क्षमता पर निर्भर करता है ।

आइये देखें गीत सुहानी रात ढल चुकी का दार्शनिक अर्थ ......
रात्रि में मनुष्य नींद में रहता है, यह गफलत और बेहोशी की स्थिति होती है , उस समय प्राणी वास्तविकता से दूर होकर स्वप्नलोक में विचरण करता है । इसी प्रकार यह जीवन भी मोह निशा में फँसा है । मोह माया के परदे ने सबको अन्धकार में रखा हुआ है इसी अन्धकार से आत्मा प्रकाश में जाना चाहती है - तमसो मा ज्योर्तिगमय, 
यह जीवन (सुखमय) सुहाना प्रतीत होता है और मनुष्य जीवन भर (रात भर) सुखद कल्पनाओं के स्वप्न देखता है और जैसे ही स्वप्न खत्म हुआ ? कहीं कुछ भी नही रहता है। जीवन भर दौड़-धूप आपा-धापी में जीवन बीत जाता है । अन्त में इस नश्वर असार संसार की मोह निशा से त्रस्त पस्त जीव मुक्ति की कामना और छटपटाहट में ईश्वर को पुकारता है , थकित श्रमित आत्मा ,सच्चिदानन्दघन परमात्मा को पुकारती है, भक्त अपने आराध्य को पुकारता है  -
सुहानी रात ढल चुकी ,न जाने तुम कब आओगे                                 

जहां की रूत बदल चुकी न जाने तुम कब आओगे  ।
पहले बपचन था, फिर जवानी आई, फिर बुढ़ापा आया । सोच बदली , व्यवहार बदला ,रूचि बदली ,साथी बदले और जीवन के सब खेल बदल गये । यही बात है - 

जहां की रूत बदल चुकी ।                            
नजारे अपनी मस्तियाँ दिखादिखा के खो गए

                                  सितारे अपनी रोशनी  लुटा लुटा के सो गए

                                   हरेक शम्मा जल चुकी न जाने तुम कब आओगे ।
जीवन ने बहुत सारे सुख-दुःख के रंग दिखाए, अच्छे बुरे बहुत नजारे दिखाए परन्तु अब वे नजारे खो चुके हैं और संसार की चमक दमक के सितारों की रोशनी लुट गई, खत्म हो चुकी है ।  सभी इन्द्रियों थक चुकी जीवन के दिये में तेल खत्म होने लगा । सांसों की बाती खत्म होने की अवस्था में आ चुकी , यही तो है

हरेक शम्मा जल चुकी ....
तड़प रहे हैं हम यहाँ तुम्हारे इन्तजार में                                   

  खिजां का रंग आ चला है मौसमें बहार में                                      

हवा भी रूख बदल चुकी न जाने तुम कब आओगे
अब तो प्रभु दर्शन की प्यास है । मन तड़पत हरिदर्शन को आज , ईश्वर का ही तो इन्तजार है। जवानी की बहार खत्म हो चली , वृद्धावस्था की खिजां का रंग आ चला ! संसार की हवा भी रूख बदल चुकी ! जो कल तक दीवाने थे वे आज कतराने लगे हैं । अपनी मरजी से न कहीं आ जा नहीं सकते ! खा नही सकते ! खा लो तो हजम नही होता ! जिस काया के बल पर नाज था वह जर्जर हो चुकी, साथी संगी बिछड़ गए, यही बात है -

हवा भी रूख बदल चुकी ...
अतः हे प्रभु  सुहानी रात ढल चुकी ,न जाने तुम कब आओगे
    

लेखक - कमल किशोर वर्मा कन्नौद
लेखक परिचय                                                  

कमल किशोर वर्मा , दुर्गा कालोनी कन्नौद जिला देवास म.प्र.         

   शिक्षा  -  बी. एससी . एम.ए. बी.एड.
कवि, लेखक, गीतकार, संगीतकार, च़ित्रकार, ज्योतिषी, हस्तरेखा विशेषज्ञ, सामुद्रिकशास्त्र, वास्तुशास्त्र विशेषज्ञ, आयुर्वेद के ज्ञाता, प्राचीन भारतीय संस्.ति के मर्मज्ञ इतिहासकार

लिखी गई पुस्तकें -
                 काव्यांजलि निहारिका भाग 1 तथा भाग 2  ( काव्य संग्रह )
                 एक चम्मच सच ( र्व्यंग्य लेख व कहानी संग्रह )
                 मुगल काल का काला सच ?   
                 राजा राममोहन राय का सच ?
                 कैसा महात्मा था गाँधी ?
                 सिन्धु का विनाश कारण और विश्लेषण
                 देव चर्चा

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