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दोहा साक्षी समय का.................... डॉ. प्रभा ब्यौहार

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दोहा साक्षी समय का....................

डॉ. प्रभा ब्यौहार

खण्डेलवाल कॉम्पलेक्स,

महानद्दा जबलपुर


जायसी का एक कथन हैः-

‘‘जो इतना जलेगा, वह कैसे नहीं महकेगा’’।

यह उक्ति दोहा संकलन क्रमशः

1. दोहा-दोहा नर्मदा।

2. दोहा सलिला, निर्मला।

3. दोहा दीप्त दिनेश, पर पूर्णता चरितार्थ होती है। (विश्व हिन्दी संस्थान समन्वय प्रकाशन जबलपुर 2018)

काव्य की प्रक्रिया मूलतः अत्यन्त जटिल हैं सर्वप्रथम भाव बीजों का अन्तःकरण में स्फुटन फिर भाषा के माध्यम से ग्राहक अथवा सहृदय तक सम्प्रेषण और फिर कवि की मनः स्थिति के अनुरूप भोक्ता की मनः स्थिति का एकाकार जो विभिन्न रसों को निष्पादित करते है इस समुची प्रक्रिया में कवि एक विशिष्ट संवेदनशील व्यक्ति दृष्टिगत होता है, जो काव्य की विविध शैलियों में से अपने अनुरूप किसी एक को चुनता है और उसे नये भाव, नये शब्द देता है।

दोहा भी वह काव्य विधा है जिसमें दोहा का संसार और जीवन के विविध अनुभवों से प्रभावित होकर काव्य पंक्तियाँ कह उठता है जहाँ तक उपर्युक्त दोहा संकलनों का प्रश्न है। सम्पादक संजीव वर्मा सलिल ने

‘‘ दोहा गाथा सनातन, शारद कृपा पुनीत।

साँची साक्षी समय की, जनगण मन की मीत।।’’

कहकर दोहों की परिभाषा, इतिहास, विस्तार पर गहन विवेचन प्रत्येक संकलन में किया है यह वह दोहा विधा है जो ‘‘जनगणमन को मुग्ध कर, करे हृदय पर राज’’।

दोहों का विस्तृत इतिहास है अपभ्रंश से क्रमशः विविध बोलियों में दोहा का हुये इनमें चन्दबरदाई, अमीर खुसरों, कबीर, तुलसीदास के दोहे तो ग्रामीण अंचल के निरक्षरों के मुख से भी सुने जा सकते है।

उपर्युक्त दोहा संकलनों में प्रत्येक में 15-15 दोहाकार है जो प्रत्येक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते है विषयगत समानता के अतिरिक्त दोहों में अन्वति और ंिंबंम्ब योजना कई स्थान पर दर्शनीय है। उदाहरणार्थः-

अ. खेत से डोली चली, खलिहानों की ओर।

पिता गेह से ज्यों बिदा, पिया गेह की ओर।।

(अखिलेश खरे)

ब. किरणों की है पालकी, सूरज बना कहार।

ऊषा कुलवधू सी लगे, धूप लगे गुलनार।।

(जयप्रकाश श्रीवास्तव)

स. झूमी फसलें खेत में, महक रही है बौर।

अमराई संसद बनी, है तोतों का शोर।।

(अविनाश ब्यौहार)

इन दोहों का विश्लेषण करने पर मुख्यतः तीन विषय दृष्टिगत होते है- प्रकृति या पर्यावरण के प्रति आकर्षण, जीवन, परिवार के प्रति रागात्मक रूझान जो सुखद संकेत देते है। राजनैतिक जीवन में हा्रस होते नैतिक मूल्य, निश्चय ही प्रकृति सौन्दर्य को मुनष्य ही नष्ट कर रहा है और इसलिए- ‘‘आदम के हाथों हुआ, है जंगल लहू लुहान’’।

और आवश्यक है-

‘‘रक्षित कर वातावरण, बचा जीव अस्तित्व।

टालों महाविनाश को, रहे मनुज स्वामित्व’’।।

परिवर्तित मूल्य, तकनालॉजी के हस्तक्षेप से संबंधों का विखराव हुआ, परिवार टूट रहें है मानों किसी ने जीवन में नागफनी बो दी है। अविनाश तो कह उठते हैः-

‘‘पत्थर का शहर है, यहाँ बाजों का वास।

और राजनीति का क्षेत्र तो मूलहीनता के उस स्तर पर है कि प्रजातंत्र की अवधारणा ही नष्ट हो रही है।

उपर्युक्त संकलनों के प्रत्येक दोहाकार के दोहे का अर्थ पूर्ण सम्प्रेषण करते है। छन्द और भाषा कथ्य को स्पष्ट करते है। अभिधा, लक्षणा का अधिक प्रयोग है, व्यंजना का कम प्रयोग संभवतः कथन की स्पष्टता के लिये है।

कुल मिलाकर दोहे प्रभावित करते है और निश्चय ही 45 दोहाकार अगरबत्ती की कड़ियों की तरह देर तक महकते रहेंगे।

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द्वारा अविनाश ब्यौहार, रॉयल स्टेट कॉलोनी,

कटंगी रोड, जबलपुर

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