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समीक्षा // एक कवि द्वारा देखे गए सपनों में शामिल होने का समय

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पुस्तक-सपने और पेड़ से टूटे पत्ते

विधा-कविता (काव्य संग्रह)

कुल पृष्ठ सं-100

मूल्य-रू 295/-

प्रकाशक-राज बुक कंपनी, पोस्ट ऑफ़िस बिल्डिंग, गली नं 1, कौशिक पुरी, पुराना सीलम पुर (पूर्व), दिल्ली-110032

संस्करण वर्ष-2019 (प्रथम संस्करण)

रचनाकार-सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

समीक्षक-डॉ मनोज मोक्षेंद्र


एक कवि द्वारा देखे गए सपनों में शामिल होने का समय

(समीक्षा)

--डॉ मनोज मोक्षेंद्र (समीक्षक)

सुरेंद्र कुमार अरोड़ा लघुकथा के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित नाम है। यों तो, अरोड़ा जी ने लघुकथाओं के सिवाय काफ़ी कहानियाँ भी लिखी हैं और मुद्रित दुनिया में कोई तीन दशकों से इनकी दख़ल होने के साथ-साथ, सोशल मीडिया पर तथा पत्र-पत्रिकाओं में इनके रचना-कौशल और रचनाकर्म को पाठकों ने मुक्त कंठ से सराहा है, तथापि एक साहित्यकार के रूप में यदि यह कहा जाए कि इनका सृजन-परास अत्यंत व्यापक है जो सिर्फ़ गद्यात्मक विधा तक ही सीमित नहीं है तो इस बाबत उनके रसिया पाठक तनिक विस्मित तो होंगे ही। बहरहाल, मैं साहित्य के पाठकों को इस तरह वाकजाल में उलझाने से बेहतर है कि यहाँ यह सीधे-सीधे उद्घोषित कर दूँ कि अरोड़ा जी एक सिद्धहस्त गद्यकार होने के साथ-साथ एक अच्छे कवि भी हैं; सतत प्रवाहमान काव्य सरिता की लहरों से खेलने वाले एक कुशल काव्य साधक भी हैं।

यद्यपि कभी-कभार सोशल मीडिया और इंटरनेट की पत्र-पत्रिकाओं में अरोड़ा जी की कविताएँ पढ़ने को उपलब्ध हो जाती हैं तथापि हम उन्हें पढ़ते हुए इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं कि उनकी कविताओं में उनका स्वर कितना मुखर और अभिव्यंजक है। उनके द्वारा प्रचुर मात्रा में रची गई कविताएँ, और वह भी सभी काव्यांगों को ध्यान में रखते हुए, अत्यंत हृदयस्पर्शीय हैं जैसाकि उनके सद्यः प्रकाशित काव्य संग्रह “सपने और पेड़ से टूटे पत्ते” के अनुशीलन से परिलक्षित होता है।

इस संग्रह की कविताओं के संबंध में एक ख़ास बात रेखांकित की जानी चाहिए कि इनमें प्रेम की लोकप्रिय भावना अत्यंत प्रभावशाली है। यदि यह कहा जाए कि पूरा संग्रह ही प्रेम सबंधी रचनाओं का महत्वपूर्ण संग्रह है तो यह बेजा नहीं होगा। इस संग्रह में संकलित प्रेमपरक कविताओं में कवि की भावनात्मक और भौतिक गर्माहट का अहसास करते हुए मुझ जैसा पाठक तनिक विस्मित हो जाता है क्योंकि प्रेम के संबंध में वे बहुरंगी तस्वीरें उकेरने में, और वह भी बड़ी ही चित्रोपम शैली में, पूरे कौशल्य और विस्तृत अनुभवों का आलंबन लेते हैं। ऐसा लगता है कि प्रेम के विविध रूपों को उन्होंने पूरे तन-मन से भोगा है। क्योंकि प्रेम का इतना बहुआयामी विश्लेषण भोगे गए अनुभवों के माध्यम से ही संभव हो सकता है। अस्तु, प्रेम को मांसल रूप में भोगना उनके लिए एक साधना की तरह है और यदि इसे भौतिक रूप में न भी भोगा जाए तो इसका लक्ष्य आध्यात्मिक ही होता है—

“देह से अलग प्यार तो नैसर्गिक आराधना है,

प्यार ईश्वरीय कर्म है और विनम्र साधना है।”

प्रेम के विविध रूपों को अनुभूत करने की जो क्षमता अरोड़ा जी में नज़र आती है, वह उनकी काव्य साधना को संपोषित करती है। लेकिन, यह उल्लेखनीय है कि वे वैयक्तिक आधार पर विश्लेषित प्रेम में कहीं भी व्यक्तिवादी नज़र नहीं आते हैं; वे अपनी प्रेयसी का अहसास प्रकृति के विभिन्न अंगों-उपांगों में करते हैं। प्रकृति में अपनी प्रेमिका की उपस्थिति का अहसास वे वर्ड्सवर्थ और सुमित्रानन्दन पंत की तरह ही करते हैं। लिहाज़ा, उनके विरह में क्षुब्धता कहीं परिलक्षित नहीं होती है। एक उद्धरण दृष्टव्य है—

“कूकती है कोयल तो लगता है गूँजा है स्वर तुम्हारा,

झरता है झरना तो लगता है संगीत तुम्हारा

*** *** ***

खिलती है धूप तो लगता है गर्मी है तुम्हारी

निकलता है चाँद तो लगता है शीतलता है तुम्हारी।”

अपनी प्रेयसी से प्रेम का समुचित पारितोषिक न मिल पाने पर भी कवि आशा से सराबोर रहता है; उसे अपनी प्रेमिका का भान कहाँ-कहाँ नहीं होता है—

“होती रहें कहीं इनकार की बातें

दिल के अंदर गोकुल की धरती से निकला

उसका ही जल बहता है।

बोलती हुई कृष्ण की बाँसुरी के साथ

हृदय में हर पल उसका ही वृंदावन खिला रहता है।”

पर, उससे विछोह में उसकी स्मृतियों में खोए रहने की प्रेमी की मनःस्थिति को रूपायित करने में कवि के शब्द अत्यंत मार्मिक हैं—

“भुलाकर दूरियाँ दिन-रात की

आ-बैठती हैं मेरे पास अब भी तुम्हारी यादें

क्या करूं, क्या न करूं

वीरानियों में खो चली हैं

जीवन की मेरी सारी सौगातें।”

चुनांचे, प्रेम की शक्ति से साक्षात्कार कर चुका यह साधक-कवि, इसे मोक्ष का एक माध्यम भी मानने लगता है; क्योंकि प्रेम के बिना तो ईश्वर को भी रिझाना दुष्कर है—

“प्यार आडंबरों से मुक्ति का मार्ग बन जाता है।”

अस्तु, वर्तमान समाज में आपत्तिजनक परिवर्तनों के कारण प्रेम-विनिमय में आए बदलावों को कवि उचित नहीं मानता है—

“जिन दिलों से आत्मीय संवेगों की बात थी

उन्हें रोग-जनक परजीवी उसूलों ने रोगी बना दिया है।”

कवि को रुग्णता, चाहे वह मनुष्य के विचारों में हो या समाज में कहीं भी, कभी रास नहीं आती है। सामाजिक भ्रष्टाचार के खिलाफ़ वे अपनी आवाज़ तो अपनी कहानियों और लघुकथाओं में पहले से ही बुलंद करते रहे हैं, यहाँ कविताओं में भी भ्रष्ट समाज को दुतकारने में वे कतई पीछे नहीं हैं। वे सच के चेहरे को ढंकने वाले झूठ से सख़्त नफ़रत करते हैं—

“झूठ का, फ़रेब का मुखौटा है ओढ़ा हुआ

नादान सूरतों का तिलिस्म है लपेटा हुआ

धोखे के तालाबों से भरपूर उनकी बंदगी

कैसे-कैसे लोग, कैसी-कैसी उनकी ज़िंदग़ी?”

इसी क्रम में, आम आदमी के काले करतूतों की कलई खोलने वाली अरोड़ा जी की ये पंक्तियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—

“अर्थियों की दुकान सजाता है वो

फिर भी भाई कहलाता है वो।”

पर, कवि भ्रष्ट समाज के कुकर्मों को कभी बर्दाश्त करने वाला नहीं है। वह भ्रष्टाचारियों से पूरे जोश-खरोश से पंजा लड़ाकर उन्हें धूल चटाने का माद्दा रखता है—

“इंसाफ़ की हांडी पर चढ़ा मेरा गर्म ख़ून

उन्हें उनकी हैवानियत का फ़लसफ़ा समझाएगा।”

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि उन्हें भलीभाँति अपनी क्षमता का भान है जिसके बलबूते पर वह न केवल सामाजिक भ्रष्टाचारियों को, बल्कि सरहद-पार देश के दुश्मनों को भी ईंट का ज़वाब पत्थर से देने के लिए तैयार हैं। इस प्रयोजनार्थ वह समूचे देशवासियों से एकता के सूत्र में बंधने की गुहार लगाते हैं—

“लड़ाई भले ही विकट है पर इरादे हमारे नेक हैं,

विश्वास की डगर पर कामयाबियाँ अनेक हैं

न्याय की राह में आए न कोई अब यहाँ

कह दो इस विश्व से हम सब अब एक हैं।”

उनके पास समाज को सुधारने-संवारने का बेशकीमती नुस्खा भी है—

“क्यूँ न कुछ ऐसा करें

कि मुश्किलों को हरेक की निज बाज़ुओं से हल्का करें

तालीम से महरूम अनपढ़ों को हरफ़ों से सजाया करें।”

कवि अपनी पूरी संवेदनशीलता से परिवार, पड़ोस, समाज, देश और विश्व का भला चाहता है। मानवोचित सदाशयता के साथ जहाँ वह सहज मनोभावों को पूरा सम्मान देता है, वहीं वह रिश्तों के प्रति भी अत्यंत सचेष्ट है जिन्हें वह स्वस्थ समाज के लिए निष्ठापूर्वक अटूट बने रहने की कामना भी करता है। एक प्रसंग यहाँ दृष्टव्य है—माँ के ममत्व का उल्लेख तो सभी कविगण करते हैं, पर पिता के वात्सल्य पर किसी का ध्यान नहीं जाता, सिर्फ़ अरोड़ा जी के सिवाय—

“सबकी हैं सह जाते वो

पीड़ा नहीं बताते वो।”

इसी क्रम में वे बाल कविताएँ रचकर अपनी उपस्थिति बाल साहित्य में भी दर्ज़ करते हैं। “नन्हीं गुड़िया” और “गुड्डो रानी” शीर्षक से दो बाल कविताएँ उल्लेखनीय हैं। कुछ पंक्तियाँ उदाहरण के लिए—

“मैं नन्हीं सी गुड़िया हूँ

मैं ज़ादू की पुड़िया हूँ।”

और

“सबको बातों से बहलाती

गाना सुनती तब कुछ खाती।”

निःसंदेह, इस संग्रह की सत्तासी कविताएँ जीवन के विभिन्न पक्षों को रूपायित करती हैं। कवि इन्हीं कविताओं में सपने के ऐसे पेड़ उगाने की ज़ुर्रत करता है जिनकी छाया में समाज का सौष्ठवीकरण संभव हो सके तथा उन सपनों के पेड़ों से टूटकर अलग हुए पत्तों पर घड़ों आँसू बहाता है ताकि लोगबाग इससे सबक लें और परिवार तथा समाज में ऐसी टूटन न आए। वह कामना करता है कि—

“नाकामियाँ बारिश से पहले की आँधियों में समा जाती हैं

दुश्वारियाँ वसंत की तैयारियों का खाका खींच जाती हैं।”

संग्रह की सभी कविताएँ अत्यंत सरस हैं जो कवि के सहज उद्वेग से उद्भूत मानवीय भावनाओं को चित्रित करती हैं। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि हर वय का व्यक्ति, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, इन्हें पढ़कर न केवल आनन्द की पराकाष्ठा तक पहुँच सकता है बल्कि जीवन में बेहतरी के लिए इनसे ज़रूरी सबक भी ले सकता है। कवि ने काव्यात्मक भाषा का प्रयोग करते हुए तथा छांदिक अनुशासनों को धता बताते हुए भी काव्योचित लय और प्रवाह को बनाए रखने में अपनी महारत का अच्छा प्रदर्शन किया है। मैं कविता के रसिया पाठकों से अनुरोध करूंगा कि वे “सपने और पेड़ से टूटे पत्ते” में कवि द्वारा देखे गए सपनों का हिस्सा बनें और उन टूटे हुए पत्तों को फिर से पेड़ों से जोड़ने के लिए कोशिश करें। ऐसा समय की भी मांग है।

***

जीवन-चरित

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लेखकीय नाम: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र {वर्ष 2014 (अक्तूबर) से इस नाम से लिख रहा हूँ। इसके पूर्व 'डॉ. मनोज श्रीवास्तव' के नाम से लेखन}

वास्तविक नाम (जो अभिलेखों में है) : डॉ. मनोज श्रीवास्तव

पिता: (स्वर्गीय) श्री एल.पी. श्रीवास्तव,

माता: (स्वर्गीया) श्रीमती विद्या श्रीवास्तव

जन्म-स्थान: वाराणसी, (उ.प्र.)

शिक्षा: जौनपुर, बलिया और वाराणसी से (कतिपय अपरिहार्य कारणों से प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रहे) १) मिडिल हाई स्कूल--जौनपुर से २) हाई स्कूल, इंटर मीडिएट और स्नातक बलिया से ३) स्नातकोत्तर और पीएच.डी. (अंग्रेज़ी साहित्य में) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से; अनुवाद में डिप्लोमा केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो से

पीएच.डी. का विषय: यूजीन ओ' नील्स प्लेज़: अ स्टडी इन दि ओरिएंटल स्ट्रेन

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष 2000, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 2-अक़्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष 2004, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-अपूर्णा, श्री सुरेंद्र अरोड़ा के संपादन में कहानी का संकलन, 2005; 4- युगकथा, श्री कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित संग्रह में कहानी का संकलन, 2006; चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष 2010, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष 2008, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इंक़लाब (कहानी संग्रह), वर्ष 2009, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6.एकांत में भीड़ से मुठभेड़ (काव्य संग्रह--प्रतिलिपि कॉम), 2014; 7-प्रेमदंश, (कहानी संग्रह), वर्ष 2016, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 8. अदमहा (नाटकों का संग्रह) ऑनलाइन गाथा, 2014; 9--मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा (राजभाषा हिंदी पर केंद्रित), शीघ्र प्रकाश्य; 10.-दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास); 11. चार पीढ़ियों की यात्रा-उस दौर से इस दौर तक (उपन्यास) पूनम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, 2018; 12. महापुरुषों का बचपन (बाल नाटिकाओं का संग्रह) पूनम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, 2018

संपादन: महेंद्रभटनागर की कविता: अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति”

संपादन: “चलो, रेत निचोड़ी जाए” (साझा काव्य संग्रह)

--अंग्रेज़ी नाटक The Ripples of Ganga, ऑनलाइन गाथा, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

--Poetry Along the Footpath अंग्रेज़ी कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य

--इन्टरनेट पर 'कविता कोश' में कविताओं और 'गद्य कोश' में कहानियों का प्रकाशन

--महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा, गुजरात की वेबसाइट 'हिंदी समय' में रचनाओं का संकलन

--सम्मान--'भगवतप्रसाद कथा सम्मान--2002' (प्रथम स्थान); 'रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान--2012'; ब्लिज़ द्वारा कई बार 'बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक' घोषित; 'गगन स्वर' संस्था द्वारा 'ऋतुराज सम्मान-2014' राजभाषा संस्थान सम्मान; कर्नाटक हिंदी संस्था, बेलगाम-कर्णाटक द्वारा 'साहित्य-भूषण सम्मान'; भारतीय वांग्मय पीठ, कोलकाता द्वारा ‘साहित्यशिरोमणि सारस्वत सम्मान’ (मानद उपाधि); प्रतिलिपि कथा सम्मान-2017 (समीक्षकों की पसंद); प्रेरणा दर्पण संस्था द्वारा ‘साहित्य-रत्न सम्मान’ आदि

"नूतन प्रतिबिंब", राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक

"वी विटनेस" (वाराणसी) के विशेष परामर्शक, समूह संपादक और दिग्दर्शक

'मृगमरीचिका' नामक लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका के सहायक संपादक

हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, कथाक्रम, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा, व्यंग्य यात्रा, उत्तर प्रदेश, आजकल, साहित्य अमृत, हिमप्रस्थ, लमही, विपाशा, गगनांचल, शोध दिशा, दि इंडियन लिटरेचर, अभिव्यंजना, मुहिम, कथा संसार, कुरुक्षेत्र, नंदन, बाल हंस, समाज कल्याण, दि इंडियन होराइजन्स, साप्ताहिक पॉयनियर, सहित्य समीक्षा, सरिता, मुक्ता, रचना संवाद, डेमोक्रेटिक वर्ल्ड, वी-विटनेस, जाह्नवी, जागृति, रंग अभियान, सहकार संचय, मृग मरीचिका, प्राइमरी शिक्षक, साहित्य जनमंच, अनुभूति-अभिव्यक्ति, अपनी माटी, सृजनगाथा, शब्द व्यंजना, अम्स्टेल-गंगा, इ-कल्पना, अनहदकृति, ब्लिज़, राष्ट्रीय सहारा, आज, जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, कुबेर टाइम्स आदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं आदि में प्रचुरता से प्रकाशित

आवासीय पता:--सी-66, विद्या विहार, नई पंचवटी, जी.टी. रोड, (पवन सिनेमा के सामने), जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत. सम्प्रति: भारतीय संसद में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत


इ-मेल पता: drmanojs5@gmail.com

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