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परित्याग // रचना सिंह" रश्मि"

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अक्सर,रात को हम दोनों के बीच न.चाहते हुए भी आयरा का अहसास आ ही जाता और मैं, बेचैन हो जाती। आज भी यही हुआ...सारी रात आयरा के अहसास से सो नहीं पाती ।क्यों वो मेरे हिस्से का प्यार लूट रही क्यों वो मुझे अमन से जुदा करना चाहती है मेरी बेचैनी और बढ़ गयी आज मैं फैसला करके रहूँगी अब और  धोखा बर्दाश्त नहीं कर सकती मैं ! पर इसमें आयरा का क्या दोष। गलती तो अमन की है मैं क्यों अपनी जिंदगी को तबाह होने दूँ ?अम्मा की कही बात मुझे याद आ गई, “मर्द की जात" हमेशा औरत को दोष देता है वह कभी नहीं कहेगा कि वो तुमको माँ नहीं बना सकता ।

मैं भी माँ बनना चाहती हूँ मैं पति का पूर्ण समर्पण चाहती हूँ किसी कीमत पर अपनी मुहब्बत के दरख्त को सूखने देना नहीं चाहती। बहुत कोशिश की क्या कमी है मुझमें?पर अमन का तो जैसे मुझ से मन.भर गया था  आखिर कब तक चुपचाप सहती रहूंगी अब और मुझसे बर्दाश्त नहीं होता मैं अपने साथ अन्याय नहीं होने दूंगी। कुछ सोचना पडेगा..........अमन के लिए मैंने. अपनी सरकारी नौकरी तक छोड दी मैंने अमन के लिए अपनी हर खुशी कुर्बान कर दी। मैं तो बस एक प्यार करने वाला पति और माँ बनना चाहती थी। अमन तो अपने अय्याशियों से से ही फुर्सत नहीं मिल रही थी। जैसे खुद थे वैसे ही सबको समझते थे शायद इस लिए मेरी नौकरी छुड़वा दी। आज नौकरी रहती तो तो  इस तरह मुझे सहना ना पड़ता और!जब भी नौकरी की बात करती  बौखलाने लगते अमन कहते है चुपचाप घर संभालो...नौकरी का ख़्वाब छोड़ दो...

मैं ..आयरा को तो हरगिज बीच में नहीं रहने दूँगी  बगल में सोये अमन को मैं, हिलाकर जगाया आपके शरीर से आयरा की गंध आ रही है ...अमन ने उठते ही मुझे एक थप्पड़ जड़ दिया हद.होती है ये क्या बदतमीजी है रात को चैन से सोने.भी नहीं देती हद है कर दी अपने.पागलपन की रात के 2बज रहे है क्या आयरा,आयरा  बक रही ह़ो?

आज मैं मन ही मन निर्णय कर चूंकि थी आज सोने नहीं दूंगी आपको...सच-सच बताओ...आयरा से शारीरिक संबंध भी है न तुम्हारे ?? मैं पागल की तरह अमन को झकझोरते हुए बोली

हाँ---है मेरे संबंध...आयरा  के साथ मैं उससे बेपनाह मुहब्बत करता हूँ.. उसके साथ जल्दी ही शादी भी करने वाला हूँ सुनते ही मैंने अपना सर दीवार पर पटकर मैं चिल्लाई तुम मुझे माँ नहीं बना सकते हो तुम अपनी कमी को छुपाना चाहते दुनिया को बताना चाहते हो कि मैं माँ नहीं बन सकती ।...... मैं सब सह लूँगी बस हम दोनों एक दूसरे के साथ जी लेंगे... यहीं प्यार था शादी से पहले तो तुम मेरे लिए सब कुछ छोड़ने को तैयार थे जब मैं तुम्हारी कुछ नहीं थी आज तो मैं तुम्हारी अर्धांगिनी हूं । तुम आयरा को छोड दो सब सही हो जायेगा। नहीं मैं आयरा को नहीं छोड़ सकता .........

मैं चिल्लाई,  “तो क्या..मुझे भी साथ रखोगे और आयरा.को भी ?

“हाँ—तुम्हें भी क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ

“प्यार...या...समझौता ? मैं आयरा के साथ....... आपको! कभी नहीं बांट सकती घृणा होने लगी आपसे ...मुझे  तलाक चाहिए

“मैं तलाक नहीं दूंगा।

  क्यों नहीं .........? बताओ

क्योंकि..मैं नहीं चाहता...

इस वजह से मेरी बहन और तुम्हारी दो छोटी बहन कुँवारी रह जाये । जो पत्नी के साथ विश्वासघात कर सकता है। वो किसी का नहीं हो सकता है तुमको मेरी बहनों की नहीं। अपनी बहन की चिंता है कि लोग क्या कहेंगे। आज मैं मन ही मन निर्णय कर चुकी थी। अब और  तुम्हारे साथ नहीं रह सकती हूँ ।

अगर मेरे संबंध किसी और पुरुष होते तो तुम स्वीकार कर पाते!इसी तरीके से मेरे साथ में रह पाते! यदि किसी अन्य पुरुष से मैं शारीरिक संम्बंध बनाती तुम माफ कर पाते! मुझे  चरित्रहीन कहकर मेरा परित्याग करते।

क्योंकि तुम पुरुष हो इसलिए बर्दाश्त करूँ तुम  जवाब दो जवाब क्यों नहीं देते आज मैं फैसला कर चुकी हूं मैं तुमको छोड़कर जा रही हूँ तुम मुझे माँ नहीं बना सके मैंने तुम्हारा परित्याग कर दिया।

अब दुनिया को बताऊँगी कि मैंने तुम्हारा परित्याग इसलिए किया कि तुम अधूरे पुरुष हो आधे अधूरे...

                                     रचना सिंह" रश्मि"

                                         आगरा उ.प्र

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  1. परित्याग बहुत ही उत्कृष्ट कहानी है मे लेखिका रचना जी को हार्दिक बधाई देता हूं

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