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‘‘मकर संक्रांति खुशी का पर्व’’ श्रीमती उमा एम् ए हिंदी -डॉ.नवीन मेहता

‘‘मकर संक्रांति खुशी का पर्व’’

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श्रीमती उमा एम् ए हिंदी -डॉ.नवीन मेहता

मकर संक्रांति भारतवर्ष का महत्वपूर्ण पर्व है। यह सम्पूर्ण भारत में ही नहीं वरन् पड़ोसी देश नेपाल में भी बड़ी श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है। वहाँ इस पर्व को उत्तरायणी‘‘ कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण इसी समय आता है। इसी दिन सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, इसीलिए इस पर्व को मकर संक्रांति कहते हैं।

clip_image004इस पर्व को भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से बुलाते हैं। कर्नाटक, केरल तथा आंध्रप्रदेश में इसे संक्रान्ति कहते हैं तमिलनाडु में पोंगल तथा नेपाल में उत्तरायणी कहते हैं। पंजाब, हरियाणा में संक्रांति के एक दिन पूर्व लोहड़ी नाम से यह पर्व मनाया जाता है। सायंकाल के समय परिवार के सदस्य तथा आस-पड़ोस के व्यक्ति इकट्ठे होकर आग जलाते हैं और हर्षोल्लास से रेवड़ी, मूँगफली और लावा खाते हैं। नाचते और गाते हैं। यह नई फसल के आगमन की खुशी का त्यौहार है। जिस घर में नव विवाहिता बहू हो या किसी के घर पुत्ररत्न की प्राप्ति हो तो उसकी खुशी में पूरी कॉलोनी में रेवड़ी और लड्डू बाँटे जाते हैं।

कहा जाता है कि सूर्य देवता अपने पुत्र शनि देव से मिलने इसी दिन आते हैं। शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं। गंगा नदी राजा भगीरथ के पीछे-पीछे, कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में पहुँची थी। भीष्म पितामह ने अपने देह का त्याग इसी दिन किया था।

यह पर्व दान का पर्व है। धर्मालु व्यक्ति समूह पवित्र नदियों के संगम पर स्नान कर सूर्य देव को अर्ध्य देते हैं और दान देकर पुण्य अर्जन करते हैं। इस दिन तिल,गुड़ और अन्न के दान का विशेष महत्व है। पशुओं को चारा खिलाना तथा हरे चने खिलाने की परम्परा काफी पुरानी है।

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गिल्ली-डंडा खेलना तथा पतंग उड़ाना संक्रांति के पूर्व ही प्रारम्भ हो जाता है। गुजरात प्रान्त की पतंगबाजी सर्वश्रेष्ठ रहती है। हरिद्वार,प्रयागराज,उज्जयिनी,ओंकारेश्वर,गंगासागर में इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करते हैं, सूर्यदेव को अर्ध्य देते हैं और तिल,अनाज आदि का दान करते हैं।

सुहागिन महिलाएँ पौष माह के रविवार का उपवास रखती हैं। इस दिन नमक नहीं खाते हैं। पौष माह की दोनों एकादशियों का बहुत अधिक महत्व है। महिलाएँ अपनी सन्तान के उज्ज्वल भविष्य की कामना हेतु इस दिन व्रत रखती हैं। अपने से उम्र में बड़ी महिलाओं को सुहाग का सामान दान स्वरूप भेंट, करती हैं। तथा उनसे सुखी जीवन तथा अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। तिल का उबटन लगाकर स्नान किया जाता है। तिल-गुड़ का दान देते हैं और गाय माता को चारा तथा छोड़ खिलाए जाते हैं।

नदियों में स्नान करना स्वास्थ्यवर्धक है। दान करना भी मानसिक तृष्टि तथा पुण्यलाभ अर्जित करने के लिए आवश्यक है। परन्तु पवित्र नदियों की दुर्दशा हो रही है। नदियों में भारी मात्रा में गंदगी फैंकी जाती है। फूल,पत्ते प्लास्टिक सामग्री, जूते-चप्पल, मृत पशु,कलकारखाने का गंदा पानी, आदि से चमड़ी के रोग तथा अन्य व्याधियाँ होती हैं इसलिए नदी स्नान, छोटी नदियों में करना हानिकारक हो सकता है। इसलिए प्रतीकात्मकरूप से घर पर ही गंगाजल डालकर स्नान कर सूर्यदेव को अर्ध्य देकर मकरसंक्रांति पर्व का दान देना श्रेयस्कर है।

पतंगबाजी में भी कई बार दुर्घटना घटित हो जाती है। कई बालक कालकवलित हो जाते हैं। यदि मैदान में पतंगबाजी की जाए तो वह सुरक्षित रहती है। आजकल बाजार में चायनाडोर की बिक्री की जाती है। इस डोर का उपयोग खतरनाक है। कई पतंगबाजों की गर्दन,हाथ आदि कट जाते हैं। गहरे घाव होने से कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। शासन ने इस डोर पर अंकुश लगा रखा है। फिर भी चोरी छिपे इसका व्यापार होता है। माता-पिता समझदार बच्चे यदि अपने मन पर अंकुश रखें और अनुशासित रहकर पतंगबाजी करें तो वे इस पर्व का जी-भरकर आनन्द उठा सकते हैं और मकरसंक्रांति पर्व के उत्साह को द्विगुणित कर सकते हैं।

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श्रीमती उमा एम् ए हिंदी-डॉ.नवीन मेहता

सीनियर एमआईजी 103 व्यासनगर

ऋषिनगर विस्तार,उज्जैन,मप्र 456010

आलेख 3714042499899490303

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