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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर हिंडा” का अंक १० “तारे गिनों, भाई !” लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

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सु दर्शन को क्या पत्ता...आज़कल आनंद कुमार खफ़ा है, बाबू गरजन सिंह यानी ज्ञान चंद अग्रवाल से ? श्योपत सिंह ने चाय की केन्टीन पर बैठे-ठाले यों ह...

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सुदर्शन को क्या पत्ता...आज़कल आनंद कुमार खफ़ा है, बाबू गरजन सिंह यानी ज्ञान चंद अग्रवाल से ? श्योपत सिंह ने चाय की केन्टीन पर बैठे-ठाले यों ही कह दिया, बाबू सुदर्शन बाबू को “भय्या। गिनने का काम दे रखा है, आनंद कुमारजी को..तब से गिनते जा रहे हैं, तारे।

“क्या आपको पागलपन का दौरा पड़ गया है, जो आप एक भले-चंगे आदमी के लिए ऐसा कह रहे हैं ? बेचारे डाक देखते-देखते, क्या अब तारे गिनेंगे..?” स्कूटर को मेन स्टेंड पर रखते हुए, बाबू सुदर्शन ने कहा।

“दफ़्तर के अन्दर तशरीफ़ रखें, हुज़ूर..फिर आप ख़ुद देख लेंगे, साहबे आलम लंकेश क्या कर रहे हैं ? वहां आपको भागीरथ ज़रूर मिल जाएगा..बेचारा कब से काम से दबा जा रहा है, और हमारे आली जनाब लंकेश आनंद कुमारजी उससे टंकण कार्य करवाते-करवाते थकने का नाम भी नहीं लेते।” इतना कहकर श्योपत सिंह ने सिगरेट सिलगाई, व चाय का ख़ाली कप नीचे रखा।

सुदर्शन बाबू दफ़्तर में दाख़िल हुए, गलियारा पार करते उनको पीछे से बाबू भागीरथ ने आवाज़ लगायी।

“साहब, नमस्कार।”

सुदर्शन ने पीछे मुड़कर देखा, तो बाबू भागीरथ को हाथ जोड़े खड़े पाया। कनिष्ठ लिपिक भर्ती के लिए आयोजित आर.पी.एस.सी. परीक्षा को अनुसूचित जाति के आरक्षित कोटे से पारित करके, भागीरथ बाबू ने इस दफ़्तर में कार्य-ग्रहण किया था। इसका चेहरा-मोहरा भी ऐसा..जनाब की शक्ल देखकर कोई नहीं कह सकता कि, यह महानुभव अनुसूचत जाति से बिलोंग करता है। ललाट पर चन्दन का तिलक लगा हुआ, चेहरा गोरा-आकर्षक, सर पर पंडितों जैसी चुटिया और बदन पर क्रीज़ किये हुए पेंट-बुशर्ट। ऐसा लगता था, यह गोरा-चिट्टा छोरा एलिमेंटरी दफ़्तर के संस्थापन प्रभारी ज्ञान चंद अग्रवाल यानी गरज़न सिंह का शागिर्द हो ? उनके साथ रोज़ जोधपुर से रेल-गाड़ी से आना-जाना, जोधपुर में अचल नाथ के मंदिर में दर्शानार्थ जाना और वहां चन्दन का तिलक लगाना वगैरा काफ़ी गुण बाबू गरज़न सिंह से मिलते थे। इसके साथ इस दफ़्तर का बाबू भाग चंद आचार्य भी आर.पी.एस.सी. की परीक्षा उत्तीर्ण करके, इस दफ़्तर में एल.डी.सी. पद पर लगा था। उस वक़्त ज़िला शिक्षा अधिकारी [प्रारंभिक शिक्षा] दफ़्तर में ओ.बी.सी. कोटे से कई एल.डी.सी. पदस्थापित हुए थे, जिनमें कई एल.डी.सी. भागीरथ के मित्र थे। जिनमें पदम सिंह तंवर, आनंद कुमार, दिनेश कुमार सोलंकी वगैरा इसके दोस्त ठहरे। इनके बिना भागीरथ का मन, इस दफ़्तर में लगा नहीं। यहाँ इस दफ़्तर के कार्यालय सहायक आनंद कुमार उससे टंकण कार्य बहुत करवाया करते थे, जिससे बेचारे को कहीं एक मिनट बाहर जाने का वक़्त नहीं मिलता। इस कारण वह अपना तबादला, कार्यालय जिला शिक्षा अधिकारी [प्रारम्भिक शिक्षा] में करवाना चाहता था। उसको पूरी जानकारी थी कि, ‘ज़िला शिक्षा अधिकारी [प्रारंभिक शिक्षा] जनाब कपूरा राम गर्ग के साथ, सुदर्शन के अच्छे रसूख़ात हैं। अगर सुदर्शन बाबू गर्ग साहब से सुफ़ारस कर दे, तो ज़रूर उसका तबादला कार्यालय ज़िला शिक्षा अधिकारी [प्रारम्भिक शिक्षा] में हो सकता है।’ और वह यह भी जनता था, ‘उसके दफ़्तर में, बाबू सुदर्शन अक्सर भाग चंद आचार्य को छात्रवृति प्रभार का काम सिखाने आया करते हैं।’ वे यहाँ जब भी आते, तब भागीरथ उनसे अपना तबादला एलिमेंटरी दफ़्तर में करवाने की बात ज़रूर करता।

“हुज़ूर, सुना आपने ? मुझे बाबू साहब गरज़नजी ने, तबादले सम्बन्धी काम के लिए बुलाया है..आपके दफ़्तर। शायद, और भी कोई ज़रूरी काम हो ? तबादले के लिए आप तो हमारी सुफ़ारश करेंगे ही, गर्ग साहब से...। बस आप यहाँ से जाते वक़्त, मुझे अपने साथ ले लें..स्कूटर तो आप लाये ही होंगे ?” भागीरथ बोला।

“चलना यार, ज़रूर चलना। स्कूटर पर बैठकर चलेगा, मेरे सर पर तो बैठेगा नहीं..?” ज़वाब देकर, बाबू सुदर्शन लेखा शाखा के कमरे में दाख़िल हो गए। अन्दर जाकर उन्होंने वहां बैठे शाति लाल भंडारी को नमस्कार करते हुए कहा “भंडारी साहब, मुजरो सा..जय जिनेन्द्र।”

“जय जिनेन्द्र, भाई सुदर्शन। तुम तो ईद के चाँद बन गए यार, आज़कल आते नहीं ?” शांति लाल ने, लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए कहा।

“ईद का चाँद तो हुज़ूर आकाश में नज़र आता है, मगर हम तो आपकी ख़िदमत करने ज़मीन पर खड़े हैं।” सुदर्शन ने ज़वाब दिया।

“अरे यार, कभी-कभी मिट्टी की ठीकरी फोड़ देती है घड़ा। इसलिए तू अब ज़मीन का वास्ता मत दे मेरे भाई, अक्सर यह ज़मीन की रेत उड़कर बड़े-बड़े हुक्मरानों के सर पर चढ़ जाया करती है।” इतना कहकर, लेखा शाखा के कार्यालय सहायक शान्ति लाल भंडारी ने अपने बगल में रखी कुर्सी पर सुदर्शन को बैठाया। फिर, मुस्कराकर कहने लगे “कैसे आना हुआ, सुदर्शन ? बिना काम तू यहाँ आता नहीं, अगर तू बिना काम यहाँ आ जाए तो मैं आसमान से तारे तोड़कर दिखला दूं तूझे।”

“जनाब, ऐसी तक़ल्लुफ़ करना मत। सुना है आज़कल तारे गिनने का काम आनंद कुमारजी को दे रखा है, कहीं इन तारों की गणना में कमी आ गयी तो आपकी ख़ैर नहीं।” लबों पर व्यंगात्मक मुस्कान लाकर, सुदर्शन बोल पड़े।

“यार उस्ताद तू तो बड़ा तीस मारखां निकला..बहुत दूर से, तीर मार लिया यार। ख़ैर जो होगा, देखा जाएगा। हमारे पीछे, कौनसी सुफ़ारस है ? सब जानते हैं इस कार्यालय में कार्यालय सहायक की दो ही पोस्टें थी, और बैठे थे हम तीन..एक मैं, दूसरे नारायण दासजी और पीछे से आ गए तीसरे आनंद कुमारजी। फिर भय्या, एक को तो तारे गिनने ही पड़ेंगे...!” इतना कहकर शान्ति लाल ने टेबल पर रखे सेकेंडरी और सीनियर हायर सेकेंडरी स्कूलों के संस्था प्रधानों के सेवाभिलेख उठाये, फिर यह कहते हुए उन्होंने सीट छोड़ दी “ठहरो यार, अभी इन सेवाभिलेखों पर बड़े साहब के हस्ताक्षर करवाकर ले आऊँ।” इतना कहने के बाद, वे सेवाभिलेखों का बण्डल लिए डी.ई.ओ. साहब के कमरे की तरफ़ चले गए।

“कलाकार.... आओ यार इधर, क्या भंडारी साहब ही है क्या...इस कमरे में ?” भंडारी साहब की सीट के पहलू वाली सीट पर बैठे, कनिष्ठ लेखाकार ओम प्रकाश खमनेरा बोल उठे।

“खमनेरा साहब, वास्तव में, मैं आपसे ही मिलने आया था। क्योंकि, मुझे छात्रवृति का मेटर पर आपसे ही डिस्कस करना था।” सुदर्शन ने कहा।

“तशरीफ़ रखे, हुज़ूर। अगर आपको यहाँ आने-तक कोई तक़लीफ़ हुई हो तो, आप माफ़ करावें।” ओम प्रकाश ने झट कलम फ़ाइल पर रख दिया, और फिर उन्होंने बाबू सुदर्शन को अपने पास बैठाकर कहने लगे “पहले आप बैठिये, और बैठने के बाद कीजिये डिसकस। अब बोल यार, इस वक़्त मैं फ्री ही हूँ। क्या कहना है, तूझे ?

क़रीब दस मिनट लगे होंगे, मेटर डिसकस करने में। वहां से निपटकर, सुदर्शन ने सोचा “चलते हैं ज़रा, नारायण दासजी से मिल लिया जाय ?”

नारायण दासजी इस दफ़्तर में, विधि शाखा के कार्यालय सहायक ठहरे। इनके पास भी, सुदर्शन की तरह विधि और जांच प्रकरणों का प्रभार था। एक ही प्रभार होने से सुदर्शन क्यों न चाहेंगे कि, वे जांच प्रकरणों को निपटाने के लिए कौनसी नीति काम लेते हैं ? फिर क्या ? सुदर्शन दाख़िल हो गए, विधि शाखा के कमरे में। जहां खिड़की के पास, नारायण दास की सीट लगी थी, उनके बगल वाली कुर्सी ख़ाली थी, जिस पर सुदर्शन आकर बैठ गए। वहीं पास में, एक टेबल भी रखी थी। जिसके नीचे भेजी जाने वाली डाक, लिफ़ाफ़ों में बंद करके रखी गयी थी। उन लिफाफ़ो को गूंद लगाकर, चिपकाना बाकी था। द्वारका प्रसाद वहां आँगन पर बैठा-बैठा, उन लिफ़ाफ़ों पर गूंद लगाकर उन्हें चिपका रहा था। उस टेबल के सामने ही आवक-जावक शाखा के प्रभारी की सीट थी। इस वक़्त, इस सीट पर कोई बैठा नहीं था। अक्सर इस शाखा के प्रभारी रणछोड़ बाबू, जिन्हें यहाँ के चपरासी लोग प्यार से काकू नाम से बतलाया करते थे...जो चपरासी से क्रमोन्नत होकर, इस दफ़्तर में एल.डी.सी. बने थे..उनका शौक, यहाँ के चपरासियों से हफ्वात हांकने का रहा। कारण यह था कि, ये जनाब, इसी दफ़्तर में पहले चपरासी थे। यहाँ के सभी पुराने चपरासी, इनके साथी रहे थे। जनाब ने किसी तरह मरते-गुड़ते दसवी पास की, और आनंद कुमारजी की मेहरबानी पाकर इसी दफ़्तर में चपरासी वाले कोटे से परमोशन पाकर वे यहाँ एल.डी.सी. बन गए। चपरासी से सीधा एल.डी.सी. बन जाने से, वे लिपिक कार्य नहीं जानते थे। इस कारण, इनको आवक-जावक शाखा का प्रभारी बनाया गया। और इस कार्य को, द्वारका प्रसाद जैसा चपरासी भी संभाल सकता था। ये जनाब अक्सर पोर्च में बीड़ी पीते रहते, और वहां बैठे चपरासियों से गप-शप करते हुए अपना वक़्त जाया करते। उनको पूरा भरोसा था कि, उनका यह काम द्वारका प्रसाद अच्छी तरह से संभाल लेगा। फिर इनको काहे की ज़रूरत, वहां बैठकर काम करने की ?

लिफ़ाफ़ा चिपकाकर, अचानक द्वारका प्रसाद ने निगाहें उठायी और वहां बाबू सुदर्शन को बैठा देखकर वह चौंक गया। उसके मुख से, अनायास ये अल्फ़ाज़ निकल गए “हुज़ूर, आप कब तशरीफ़ लाये ? हमने तो, आपको देखा ही नहीं..? वाह उस्ताद, यह तो आपके पहने चोर जूतों का करिश्मा होगा..?”

“क़ाबुल के गधे, जानता नहीं मैंने रोकड़ा पांच सौ रुपये ख़र्च करके ये एक्शन कंपनी के जूते ख़रीदे हैं। और तू कहता है इन्हें, चोर जूते ? तेरा दिमाग़ ठिकाने है, या नहीं ? क्या हम, तूझे चोर-उठाईगीरे नज़र आते हैं ?” आँखें तरेरकर, सुदर्शन बोले।

“अरे उस्ताद, चोर न सही...चोर-उचक्कों की सोहबत तो ज़रूर रखते हैं..हम दोनों। कह दिया होगा इसने भूल से, मगर अपना क्या जाता ?” नारायण दास ने, अपने लबों पर तबस्सुम बिखेरते हुए कहा। इतना कहकर नारायण दास ने टेबल पर रखी एक-एक फ़ाइल उठाकर, सुदर्शन को दिखालाते हुए आगे कहा “देख यार, अपुन दोनों के पास विधि और जांच-प्रकरणों का प्रभार है ना..? फिर बता तू, अपने पास किनके प्रकरण आते हैं ? बोल, इन चोर-उचक्के मास्टरों के..? ले देख, यह फ़ाइल है परीक्षा की उत्तर-पुस्तिकाओं की चोरी करने वाले मास्टर की..देख इस फ़ाइल को, इसमें इस अध्यापक पर मार-पीट और बलात्कार का आरोप लगा है..तो सुन मेरे भाई, इन सबसे हमारा पाला पड़ता है।”

“जनाब छोड़िये, ये चोर-उचक्के गए भाड़ में। हम तो आप जैसे कलाकार की बात करते हैं, जो अभिनेता उत्पल दत्त की कार्बन कॉपी है। मैं तो चाहता हूँ यार, क्या पड़ा है इस पाली शहर में ? आप तो निकल जाओ बम्बई के लिए, और पहुँच जाओ फिल्म सिटी। जो भी डायरेक्टर आपको देखेगा, वह आपको उत्पल दत्त ही समझ लेगा। फिर, आपकी तो चांदी ही चांदी है। फिर हम आपको यहाँ देखेंगे नहीं.. गनीमत है, तारे ही गिनेंगे हम..और क्या ?” इतना कहकर, सुदर्शन ने टेबल पर रखी फाइलों का अवलोकन करने लगे..जाँच प्रकरणों की स्थिति का ज़ायजा लेने।

“वाह भाई, वाह। आपके यहाँ जांच-प्रकरण बढ़ते ही जा रहे हैं, जांच अधिकारी की नियुक्ति भी हो जाती है और केस का डिस्पोजल होता कहीं नज़र नहीं आता।” सुदर्शन ने फाइलों का अवलोकन करते हुए, सवाल उठाया।

“तुम्हें यह राज बता दें, तो फिर हमें कौन उस्ताद मानेगा ? अरे भय्या, थोड़ा दिमाग़ पर ज़ोर लगाओ..कुछ आया समझ में ?” नारायण दास बोले।

“आप कह दीजिये, उस्ताद। काहे ज़ोर लगवा रहें है, इस दिमाग़ पर ?” सुदर्शन बोले।

“अरे यार, इतना भी नहीं समझ रहा है तू..? अगर हमारे पास जितने ज़्यादा प्रकरण होंगे, उतनी ही हमारी पूछ होगी..और यह प्रभार ज़िंदा रहेगा। न तो प्यारे, हम स्कूलों में भटकते फिरेंगे या फिर यहाँ बैठकर तारे गिनेंगे।” इतना कहकर, नारायण दास मुस्कराए। तभी ड्राइवर श्योपत सिंह इस कक्ष में आ घुसा, और बेचारे द्वारका प्रसाद को एक और धकेलकर नारायण दास के पास रखे स्टूल पर आकर बैठ गया। फिर कहने लगा, नारायण दास से “सिन्धी बाबूजी, क्या हाल है ? हमारी फ़ाइल को माल-पानी खिला-पिलाकर, मोटी की या नहीं ? या फिर, पहले जितने ही दो पेपर डाले हुए हैं ?”

“कह दिया श्योपत, हम ऐसे-वैसे गए-गुज़रे नहीं हैं..जो तुम्हारा ध्यान नहीं रखेंगे। तुम्हारी फ़ाइल में, वैसे भी कोई दम नहीं। बस, शातिर लोगों की शरारत है। बता तू, क्या लगाया आरोप ? डीज़ल चोरी का ?” नारायण दास बोले।

“डीज़ल की चोरी हो, या डकैती..? कोई लगाओ, आरोप इस बन्दे पर। कोई असर पड़ने वाला नहीं, इस बन्दे पर। कह दीजिये जांच अधकारी शिव कुमारजी को, बैठकर इस फ़ाइल की पूजा करे।” इतना कहकर, श्योपत सिंह उठ गया और वहां से रुख़्सत हो गया।

“नारायण दासजी, ज़रा इस रहस्य पर पर्दा उठाइये ना..००७ जेम्स बांड की तरह। बताइये, श्योपत सिंह, फ़ाइल और शिव कुमारजी..ये तीनों फेक्टर एक साथ कैसे ?” सुदर्शन ने, सवाल उठाते हुए, कहा।

“देख सुदर्शन, कई ऐसी बातें होती है..जिसे कहते हैं अफ़सरों की सनक। यह घटना भी, कुछ ऐसी ही है। अब तू बता, इसे कहकर गोपनीयता कैसे भंग करूँ ? मगर, तू है मेरा याड़ी। तुझसे कैसे छिपाऊँगा, यार ? अपुन दोनों का धंधा एक, फिर पर्दा कैसे ?” इतना कहकर, नारायण दास ने पूरा किस्सा सविस्तार बताते गए “बात उन दिनों की है, जब आनंद कुमार के भाई..तुम्हारी नाम राशि का, समझे ? वह इसी दफ़्तर में, पदास्थापित था। उस वक़्त, उसके पास रोकड़ और भंडार का प्रभार था। केश्यिर रूम के बिल्कुल सामने भण्डार का कमरा था, वहां पर रखे काग़ज़ों के कट्टों के पास श्योपत सिंह हमेशा की तरह ऊंघ ले रहा था। तभी चपरासी माँगी लाल, दबे पाँव स्टोर रूम में घुसा। इस चपरासी की आदत थी, बात करते कंधे उचकाने की। यही कारण था, सभी चपरासी इसे माँगी लाल न कहकर हड़माना नाम से पुकारा करते। कारण यह था कि, ‘दफ़्तर में यह माँगी लाल बन्दर की तरह, उछल-कूद ख़ूब मचाया करता था।’ इस वक़्त श्योपत सिंह को नींद में पाकर, वह झट सीधा जाकर काग़ज़ों के कट्टे को ब्लेड से काटा। फिर उसने कुछ काग़ज़ों के बण्डल खींचकर बाहर निकाले..मगर जैसे ही काग़ज़ों के बण्डल बाहर निकले और उस बारदान के कट्टे की खंक उड़ी। और यह खंक श्योपत सिंह के नाक में चली गयी, और भाई लगे छींकने तड़ा-तड़। छींक आते ही वह उठ गया, और सामने क्या देखा ? हड़माना चुपचाप अपने गमछे में, उन बंडलों को ले जाने के लिए लपेट रहा था। उसकी आँखें आश्चर्य के मारे, खुली की खुली रह गयी। उसको जगा हुआ पाकर, हड़माना झट काग़ज़ के बंडलों के साथ नौ दो ग्यारह हो गया। जैसे बिल्ली को देखकर चूहा छूमंतर हो जाता है।”

अब आज़ तो होगा, धमाका।” यह सोचकर श्योपत सिंह जा पहुंचा, संस्थापन प्रभारी भवानी सिंह के पास। और, कहने लगा उनसे “भाबा, आज़ ज़रूर होगा धमाका। अब कर लो, तैयारी।” इतना कहकर, उसने भवानी सिंह को अपनी पूरी योजना समझा दी। तदन्तर शाम के छह बजे, हड़माना हुआ तैयार..काग़ज़ों के बण्डल साइकल के करियर पर बांधकर।

“कहाँ ले जा रहे हो ? छुट्टी हो गयी, फिर भी...” श्योपत सिंह इतना कहकर, साइकल के आगे आकर खड़ा हो गया। और पीछे खड़े हो गए, दफ़्तर के दूसरे चपरासी। इधर खड्डा, और उधर खाई..अब बेचारा हड़माना, जावे किधर ? रामायण के हनुमान ने फटा-फट समुन्द्र लांघ दिया, मगर इस बेचारे कलियुगी हड़माना से चार क़दम पार करना हो गया मुश्किल। वह बेचारा, मुश्किल से इतना ही कह पाया “जागीरदारों, रास्ता दे दीजिये..आगे बहुत लेट हो गया है। अभी काग़ज़ की रिमें कटवाकर लाऊंगा, फिर चक्रांकित करूंगा...सुबह मेरे पास कई काम है, इसलिए यह काम कर नहीं पाऊँगा..मेहरबानी रखो, जागीरदारां।” घबराया हुआ, हड़माना बोला। फिर जेब से बीड़ी का बण्डल और माचिस की डिबिया बाहर निकालकर, बीड़ी सिलगाने लगा।

“रिमें काट देना, यार। पहले बीड़ी तो पिला, अकेला-अकेला कैसे पी रहा है तू ? बीड़ी पिलाकर, फिर चले जाना।” श्योपत सिंह ने कहा। तभी दूसरे चपरासी भी आ गए, सामने। फिर क्या ? स्टेंड पर साईकल रखकर हड़माना चबूतरे पर बैठ गया, फिर सबको एक-एक बीड़ी थमाकर, उनकी बीड़ियाँ माचिस से सिलगा दी। फिर सबने सुलगती बीड़ियों से धुंए निकालकर, बीड़ियों के टुकड़ों के ढेर लगा दिए। फिर कहीं जाकर, छुट्टी मिली हड़माना को। अब क्या ? हड़माना रवाना तो हो गया, साइकल पर सवार होकर। अब उसकी साइकल जहां रुके, वहां श्योपत सिंह तैयार..कभी रतन लाल तो कभी द्वारका प्रसाद तैयार। और मांगे उससे, ला बीड़ी। बेचारा हड़माना एक घंटे तक साइकल के पीछे काग़ज़ों के बण्डल डाले घूमता रहा। आख़िर उसने हाथ जोड़ दिए, और कहने लगा “साहब बहादुर, जाने दीजिये मुझे स्टोर कीपर ने ये रिमें कटवाकर किताबों की फर्म ‘मु.ट्रेडिंग” पर रखने का आदेश दिया है।”

आख़िर श्योपत की नज़रों में सच्च उगल दिया गया, फिर क्या काम ? श्योपत सिंह अपनी मंडली को लेकर चल दिया दफ़्तर की ओर, और जाते-जाते वह कह गया “सरकार को ४०० रुपयों का चूना लगाकर, अहमक चार रुपये पाता है....करने दो, कोयले की दलाली..बीड़ी के बण्डल के ख़ातिर।”

दूसरे दिन पेशी पड़ गई, डी.ई.ओ. के दरबार में। मगर बड़े साहब ने गहनता से जांच नहीं की, और हुक्म दे डाला “इस कमबख़्त मांगी लाल को कर दो निलंबित, अक्ल ठिकाने आ जायेगी।” मगर, मांगी लाल उर्फ़ हड़माना था तो आख़िर सहायक कर्मचारी..इन चपरासियों का साथी। फिर श्योपत सिंह, कैसे इन सहायक कर्मचारियों के साथी को कोई नुक्सान पहुंचाता ? अगर ऐसा हो जाता तो कई चपरासी नाराज़ होकर, आनंद कुमारजी के गुट में चले जाते ? बस, फिर क्या ? पास खड़े श्योपत ने साहब के आगे गुहार की “साहब, चार रुपयों की दलाली के ख़ातिर काहे इस बेचारे ग़रीब को दंड दे रहे हैं ?” बड़े साहब को भी रहम आ गया, और उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया। इस तरह, श्योपत के रहमो-करम से बेचारा हड़माना निलंबित होने से बच गया। हड़माना कमरे से निकलकर, बाहर आ गया। उसके जाने के बाद, श्योपत सिंह ने बड़े साहब को बताया “इस प्रकरण का, असली मुज़रिम और कोई है।” यह कहकर, उसने सारी राम कहानी उनके सामने उगल डाली।

श्योपत सिंह के कमरे से बाहर आते ही, हड़माना ने उसके पाँव पकड़ लिए। और फिर, कातर सुर में बोला “आपका गुण कभी नहीं भूलूंगा, हुज़ूर आपने मेरी नौकरी बचा ली।” इतना कहकर, हड़माना ने क़दम बढ़ा दिए खाज़िन [केश्यिर] के कमरे की तरफ़....अंगार उगलने। बस, इस घटना के बाद केश्यिर [खाज़िन] महोदय का तबादला को गया। उसके जाने के बाद यह चार्ज कभी अश्वनी कुमार के पास रहा तो कभी हरी प्रसाद या फिर ओम प्रकाश वैष्णव के पास। मगर, इस प्रकरण की वास्तविकता क्या थी..? जो केश्यिर के चुप रहने से, बाहर आ न पायी। वास्तविकता यह थी, इस दफ़्तर में काम करते-करते कई बार कागज़ की रिमें ख़लास हो जाया करती। अक्सर टूर्नामेंट या विधान सभा सत्र के दौरान, आदेश और लिस्टें चक्रांकित अधिक होती थी। यही कारण था, इस वक़्त रिमों की ख़पत ज़्यादा हो जाया करती....तब बेचारे केश्यिर को किसी दूसरे सरकारी कार्यालय से, रिमें उधार लेकर काम चलाना पड़ता था। इस प्रकरण में भी, ऐसा ही हुआ। विधान सभा सत्र चलते वक़्त, काग़ज़ की रिमें अक्समात ख़लास हो गयी। शेष काम पूरा कराने के लिए, बेचारा केश्यिर कहाँ से काग़ज़ की रिमें लाता ? उस वक़्त ज़िला शिक्षा अधिकारी भी दफ़्तर में नहीं थे, तब वह बिना उनकी अनुमति कैसे बाज़ार से क्रय करके रिमें मंगवाता ? ऐसे हालात में, उसने पड़ोस के सेल-टेक्स दफ़्तर से रिमें उधार मंगवाई। फिर, उन रिमों को वापस लौटना भी था। मगर बज़ट आवंटित होने के बाद, जोधपुर सरकारी प्रेस से काग़ज़ की कटी हुई रिमें नहीं मिली। उसके स्थान पर ‘काग़ज़ के बंडलों के कट्टे’ मिले, इन काग़ज़ों को कटवाकर रिमें तैयार करवानी थी। और उधर सेल टेक्स दफ़्तर का स्टोर कीपर उतावली करने लगा कि, उसे रिमों की सख़्त ज़रूरत है। तब केश्यिर को रिमें भी कटवानी थी, और सेल टेक्स से उधार ली गयी रिमें भी लौटानी थी। तब उसने यही सोचा कि, छुट्टी के बाद हड़माना काग़ज़ की रिमें कहीं से कटवाकर फर्म एम.ट्रेडिंग की दुकान पर रख जाएगा...और वहां से सेल टेक्स का स्टोर कीपर, उधार ली हुई रिमें प्राप्त करके हिसाब बराबर कर लेगा। कारण यह भी था, अगले दिन केश्यिर को बिल पास करवाने के लिए कोषागार जाना ज़रूरी था। इस कारण, दफ़्तर देरी से आने की पूरी संभावना थी। जब वह दफ़्तर में मिलता ही नहीं, तब सेल टेक्स का स्टोर कीपर कैसे रिमें प्राप्त करता ? इसलिए सेल टेक्स दफ़्तर के सामने स्थित फर्म एम.ट्रेडिंग से, रिमें लेने की व्यवस्था की गयी। गहनता से जांच न करने पर, इस बेचारे एक ईमानदार खाज़िन को बदनामी झेलनी पड़ी।

यहाँ इस बेचारे खाज़िन की सुनने वाला भी था, कौन ? ख़ुद ज़िला शिक्षा अधिकारी आँखें बंद करके श्योपत सिंह पर भरोसा रखते, वहां ईमानदार आनंद कुमार के ईमानदार भाई की आवाज़ सुनने वाला था कौन ? वैसे भी देखा जाय तो यह केश्यिर यहाँ की राजनीति से परेशान हो गया था, वह स्वयं चाहता था “उसका तबादला, पाली शहर की किसी सेकेंडरी या हायर सेकेंडरी स्कूल में हो जाय तो अच्छा। ताकि, यहाँ फ़ैली राजनीति से उसे छुटकारा मिल जाय।”

हनुमान ने कभी लंका जलाई थी, मगर इस लंका में इस कलयुगी हड़मान ने शोले भड़काकर ऐसी आतिशबाजी की जिसमें एक ईमानदार शख्स घायल हो गया। अपने भाई के बिछोव को आनंद कुमार बर्दाश्त नहीं कर पाए। उन्होंने इस प्रकरण का कर्णधार, श्योपत सिंह को मान लिया। कुछ दिन बीते, किसी पब्लिक मेन ने दफ़्तर में शिकायत की “इस दफ़्तर का ड्राइवर श्योपत सिंह सरकारी डीज़ल की चोरी करके, उसे बाज़ार में बेचता है।” फिर क्या ? शिव कुमार बने, इस प्रकरण के जांच अधिकारी...और वे इस प्रकरण की जांच को, आगे बढ़ा न सके।” कारण भले, कोई रहा हो...? चाहे उनका रुन्झान, अपने निजी व्यापार की तरफ़ हो...जिसके कारण वे इस प्रकरण की ओर ध्यान न दे पाए , या फिर उनको ऐसा लगा हो कि, ‘इस प्रकरण में, कोई दम न है ?’

इतना कहकर, नारायण दास रुके। चपरासिन कमला बाई ने आकर उन्हें पानी पिलाया, तब उनका युसूबत हलक़ [सूखा गला] तर हुआ। फिर, वे आगे कहने लगे “भाई सुदर्शन, तब से छत्तीस का आंकड़ा है, आनंद कुमारजी और श्योपत के बीच। कल शिव कुमारजी से मुलाक़ात हुई, वे कह रहे थे ‘यार नारायण, इस शिकायत में कोई दम नहीं है। इस आनंद कुमार ने, भंग के नशे में बिना सोचे-समझे यह हरक़त की होगी ? और जिला शिक्षा अधिकारी ने मेरे जैसे भोले आदमी को क्यों फंसा दिया, जांच अधिकारी बनाकर..? मैं व्यापारी किस्म का आदमी, कहाँ फिरता फिरुं, गली-गली में ? यह जानने, किस गली के आदमी ने यह शिकायत की..? अब मैं कल ही बंद कर दूंगा, इस जांच को। और कह दूंगा, बड़े साहब से ‘शिकायत पत्र में शिकायत कर्ता के हस्ताक्षर नहीं है, और न यह शिकायत पांच रुपये के हलफ़नामें पर लिखी गयी है।’ तो भय्या यह है, इस दफ़्तर की सियासत।” फिर, वे फ़िल्मी गीत गुनगुनाने लगे ‘बचकर रहना ओ बाबा, बचकर रहना...’

वक़्त काफ़ी बीत गया, और लंच का भी वक़्त हो गया। नारायण दास उठे, घर जाने के लिए। इधर बाबू भागीरथ आ खड़ा हुआ बाबू सदर्शन के सामने, और कहने लगा “हुज़ूर, मैं तो आप के साथ चलने के लिए तैयार हूँ....मगर आपको आनंद कुमारजी से, मुझे साथ ले जाने की इज़ाज़त लेनी पड़ेगी। प्लीज, आप उनसे इज़ाज़त ले लीजिये।”

भागीरथ का यह बच्चों जैसा बचकाना व्यवहार देखकर उनको हंसी आ गयी, वे सोचने लगे ‘यह क्या ? ये जनाब तो ऐसे फ़रमा रहे हैं, मानों मुझे गर्ज़ है इनको साथ ले जाने की..? वाह, क्या ज़माना आ गया ? अब तो अंधे को जीमने भी बुलाओ, और साथ में उसके मुंह में निवाले भी देते जाओ।’ आखिर, बोल उठे सुदर्शन “चलना है तो चल यार, तूझे नज़र नहीं आ रहा है अभी लंच का वक़्त है..तूझे इज़ाज़त लेने की, कहाँ ज़रुरत ?”

“नहीं जनाब, आपको पत्ता नहीं। बाद में मालुम होने पर, आनंद कुमारजी मेरा ही तेल निकालेंगे। इज़ाज़त दिलाना, आपके लिए कोई बड़ी बात नहीं हुज़ूर। आखिर ठहरे, आपके रिश्तेदार...प्लीज, मेरे ख़ातिर आप इतना भी नहीं कर सकते ?” भागीरथ ज़राफ़त से बोला।

उसकी ऐसी दयनीय हालत देखकर, आख़िर उन्हें रहम आ गया। और, वे बोले “अब यार, तू भी क्या याद रखेगा ? चल, तेरे ख़ातिर यह भी अहसान ले लेते हैं..आनंद कुमारजी से।

मगर, उन्हें क्या पत्ता ? आनंद कुमार और बाबू गरज़न सिंह के बीच छत्तीस का आंकड़ा है, और वे इस भागीरथ को बाबू गरज़न सिंह का आदमी समझते हैं..जहां होता है छत्तीस का आंकड़ा, वहां अपनी बात न मानने पर उसका प्रेस्टीज इशू बनाना ग़लत है। यहाँ पाली के शिक्षा महकमें में गरज़न सिंह शेर है तो, आनंद कुमार हैं सवा शेर। यहाँ तो एक-दूसरे से बढ़कर, अपने-आपको समझते हैं...ये दोनों। कहते हैं, एक म्यान में दो तलवारें टिकती नहीं। तब इन दोनों के मध्य दोस्ती होना, मुमकिन कैसे ? सुदर्शन तो आनंद कुमार की असहमति पाकर आ गए, दफ़्तर के बाहर। स्कूटर स्टार्ट करके चले गए, अपने एलिमेंटरी दफ़्तर। और बेचारे भागीरथ को छोड़ दिया इन्तिज़ार करते..अब क्या ? बेचारा भागीरथ लगा तारे गिनने...कि, कब गरज़ सिंह यहाँ आये और उसको छुट्टी दिलाकर ले जावे अपने साथ।

बाबू सुदर्शन के जाने के बाद, ख़ुदा के फ़ज़ल से गरज़ सिंह ले आये तशरीफ़..और आते ही वे दाख़िल हो गए, केश्यिर के कमरे में।

“माशाअल्लाह। जनाब के दीदार हो गए, आख़िर। कहाँ बस रहे थे, इतने दिन ? हुज़ूर, आ जाइए ना इस दफ़्तर में...हमारा दिल लग जायेगा।” उनको देखते ही खाज़िन हरी प्रसाद उनके सम्मान में खड़ा हो गया, और उन्हें आराम से कुर्सी पर बैठाकर, फिर ख़ुद बैठ गया अपनी सीट पर..पूछने लगा “ख़ैरियत है ?”

खिड़की के पास बैठा श्योपत सिंह, बीच में बोल पड़ा “जहां बैठे हैं, वहां बैठे हैं ख़ैरियत से। क्या करेंगे, यहाँ आकर ? क्या इनको दो पाटों के बीच में, पिसना है क्या ?”

“ओ मेरे कोमल गुलाब के फूल, काँटों के बीच में पड़ा है यहाँ ? जहां अन्याय का बोलबाला..चमचों की चासनी से चलती है सत्ता..फिर मेरे भोले प्रसाद, तू यहाँ आकर क्यों पड़ा है ? क्या तू भी हलुआ-पुड़ी के भोग का हो गया, चटोरा ?” मुस्कराते हुए गरज़न सिंह, गरज़ते हुए बोल उठे।

तभी कमरे में आ गया, द्वारका प्रसाद...और कहने लगा “गरज़न बाबू साहब जल्दी करिए, आपको अभी इसी वक़्त हेड साहब ने बुलाया है।” यह सुनकर, श्योपत सिंह ज़ोर से हंस पड़ा। और, ठहाका लगाने के बाद कहने लगा “जाइए..जाइए गरज़न बाबू साहब। सुन आइये, भागीरथ बाबू को साथ ले जाने के उलाहने।” इतना कहने के बाद, श्योपत सिंह आनंद कुमार की आवाज़ की नक़ल करता हुआ बोल उठा “ पेट नहीं भरा तुम्हारा, एलिमेंटरी में इतने सारे टाइपिस्टों को लेकर ? फिर भी तुम, इस दफ़्तर के बाबू को मांग रहे हो ? शर्म नहीं आती ?”

“सुन आओ..सुन आओ उसताद। जनाब के पेट में दर्द हैं, और बता रहे हैं दर्द सर में है।” हरी प्रसाद बोला “ना सुन पाओ तो कह देना ‘हुज़ूर, बैठे-बैठे तारे गिनिये...दफ़्तर की डाक देखना, अब आपके वश का काम नहीं’ समझे, हुज़ूर ?” इतना कहने के बाद में, हरी प्रसाद की बुलंद नज़र गलियारे में गिरी। वहां उसने, फुदकते हड़मान को देखा..जो बन्दर की तरह फुदकता हुआ चल रहा था। किसी मसख़रे ने...उसकी पेंट के पिछवाड़े की नाकी पर, एक बड़ी सूतली पूंछ की तरह बाँध रखी थी। बेचारे हड़मान को क्या पत्ता, किसी ने उसके साथ मज़हाक़ की है ? बस वह तो उस पूंछ को घसीटता हुआ, चिल्लाकर बोल रहा था “कहाँ मर गया रे, दरगला ? नाईट ड्यूटी निकाले मेरी जूती..यहाँ रात को कौन बैठेगा अकेले, तारे गिनने ?”

उसे फुदकता देख, बाबू गरज़न सिंह, हरी प्रसाद और श्योपत सिंह लगाने लगे हंसी के ठहाके। तभी घबराया हुआ रतन लाल कमरे में दाख़िल हुआ, और हाम्पता हुआ कहने लगा “गरज़न बाबू साहब, जल्दी चलिए..उस्ताद। अगर आप अभी न चले आनंद कुमारजी के पास, तो हुज़ूर मुझे वापस स्कूल में भेज देंगे तारे गिनने ****!”

“तारे गिनों भाई...” इतना कहकर गरज़ सिंह ने ज़ोर का ठहाका लगाया, और फिर चल दिए आनंद कुमार के पास।


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पाठकों।


१५ दिसम्बर. २०१८, राजवीणा मारवाड़ी साहित्य

सदन, अँधेरी-गली, आसोप की पोलके सामने,

जोधपुर [राजस्थान].


आपको बहुत खुशी होगी, आपने अब-तक संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर हिंडा” के अंक १- ९ तक आपने पढ़ें हैं, इस अंक के पढ़ने के बाद आपके सामने अंक १० “ग़लती कहाँ की..?” प्रस्तुत किया जाएगा। जिसका एक गद्यांश, नीचे दिया जा रहा है -:

“साहब। हम ना बोलेगा, ना लिखेगा मां कसम। इस कुतिया के ताऊ ने, हमें ऐसा-वैसा कहा। हज़ार बार उसके लिए लड़ा साहब, उस हेड मास्टर के बच्चे से...”

“हज़ार बार लड़े तो एक बार और सही, दे दो बयान जो देखा तुमने।”

“ऐसा नहीं हो सकता, साहब। अब कैसे कह दिया, उसने...मैंने पीटा, उसको ? नालायक को पलकों पर बैठाया, स्टाफ़ से लड़ा..आख़िर, किस के ख़ातिर..? इन ठाकुरों से बांधी दुश्मनी, किसके ख़ातिर ? पड़ा रहता था, एक कोने में। मुंह लटकाए बोलता था, ‘भाई शिव राम, मैं जात का जटिया और आप हो जाट। दोनों का दुश्मन, ठाकर...मगर, अब दुनिया बदल गयी साहब। साला गिंडक बोला, मेरे खिलाफ़..? अब क्या डूबेगा साला, मुझसे दोस्ती रखता तो इन ठाकर अध्यापकों की कर देता मैं हड्डी-पसली एक। जानता नहीं साला, गाँव में सभी डरते हैं मुझसे। आख़िर लोग मुझे इसी बात पर, कहते हैं टाइगर।”

“कुछ लिख दो, भाई। अलग-अलग, रहने से क्या होगा ? सच्चाई से, मुंह मोड़ना अच्छा नहीं।”

“छोड़िये साहब, एक बार कह दिया ‘नहीं लिखूंगा’ तो नहीं लिखूंगा। और, न दूंगा बयान। कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ, जो मुझसे ज़बरदस्ती बयान ले। यह टाइगर बोलेगा, तो अपनी इच्छा से...किसी से दबकर नहीं।”

अब आप इस अंक का बेसब्री से इन्तिज़ार करें। आपसे निवेदन है, आप अपने समालोचना/आलोचना सम्बन्धी विचार मेरे ई मेल dineshchandrapurohit2@gmail.com और dineshchandrapurohit2018@gmail.com पर अवश्य भेजें।

शुक्रिया।

दिनेश चन्द्र पुरोहित [लेखक – डोलर हिंडा ]

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रचनाकार: संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर हिंडा” का अंक १० “तारे गिनों, भाई !” लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित
संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर हिंडा” का अंक १० “तारे गिनों, भाई !” लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित
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