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रोचक आलेख // घंटा और घड़ियाल // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

घंटी कहें या घंटा, यह एक ध्वनि है जो प्राय: हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए बजाई जाती है। भगवान का ध्यान आकर्षित करने के लिए हम मंदिर में घुसते ही घंटा बजाते हैं और भगवान को चेतावनी देते हैं कि लो मैं आ गया, ज़रा संभाल के रहना ! स्कूल की घंटी बजते ही बच्चे परेशान हो जाते हैं; अब टालमटोल करने का कोई वक्त नहीं रहा, लो बज गया घंटा, अब स्कूल तो जाना ही पडेगा। कुछ अशक्त और बूढ़े लोग जब बीमार पड़ते हैं उन्हें अपनी बीमारी में मौत की घंटी सुनाई देने लगती है। उन्हें लगता है कि अब जाने का वक्त आ गया। कैंसर जैसी बीमारियों के मरीज़ तो, बेचारे जब तक ज़िंदा रहते हैं अपनी मौत की घंटी बराबर सुनते ही रहते हैं। घंटा इस प्रकार काल का प्रतीक बन जाता है। घंटे के साथ घडियाल, जो पानी में रहने वाला एक हिंसक पशु है शायद इसीलिए जुड़ गया है। वरना घंटा और घड़ियाल, इन दोनों के बीच कोई सार्थक सम्बन्ध कम से कम मुझे तो दिखाई नहीं देता। भाषा भी अजीब चीज़ है, बिना देखे भाले चाहे किसी शब्द को किसी भी अन्य शब्द के साथ जोड़ देती है, अब खुजाते रहिए अपना सर !

पर घंटा या घंटी है बड़े काम की चीज़ ! ध्यान आकर्षित करने के काम तो आती ही है, बुलाने के काम भी आती है। साहब लोग घंटी बजा कर ही चापरासी को बुलाते हैं। चपरासी अक्सर बैठे-बैठे सो जाता है। घंटी उसकी चेतना को जाग्रत करती है।

घंटा समय का सूचक भी है। कई घड़ियाँ हर घंटे घंटा बजाती हैं, एक से लेकर बारह तक – जो भी समय हो। समय को हमने घंटों में बाँध रखा है, भले ही समय अभी तक किसी की पकडाई में न आया हो, और यह जानते हुए भी कि वह पकडाई में कभी आ ही नहीं सकता, फिर भी शहरों में घंटा-घर तक बनवा दिए गए हैं।

कहते हैं सृष्टि के आरम्भ होने पर जो ‘नाद’ हुआ था, तभी से घंटा अपने अस्तित्व में आया। पर कमाल यह है कि वह आजतक बजता ही चला जा रहा है। जिस तरह सृष्टि कभी ख़त्म नहीं होती, समय का घंटा भी बजता ही रहता है।

लोग अभी तक इस बात पर एकमत नहीं हो सके हैं कि घंटा काम आरम्भ करने के लिए होता ही या उसे समाप्त करने के प्रतीक के रूप में बजाया जाता है। सकारात्मक सोच के लोग उसे काम करने का आरम्भ मानते हैं जबकि, जिनका सोच नकारात्मक होता है, वे उसे कार्य के अंत के रूप में उसे ग्रहण करते हैं। अब आप ही बताइए दो कक्षाओं के बीच जो घंटा बजता है वह अगली कक्षा के आरम्भ का द्योतक है या चल रही कक्षा का अंत है ? समन्वय-वादियों का विचार है कि दोनों ही बातें सही हैं। हर स्कूल घंटा बजने पर ही आरम्भ होता है और घंटा बजते ही स्कूल की छुट्टी भी हो जाती है। हम सब घंटे के मारे हैं। बिना घंटे के कोई काम ही नहीं हो पाता। काम के ख़त्म करने की सूचना भी घंटा ही देता है। परिक्षा कक्ष में घंटा बजते ही परचे बाँट जाते हैं और और आखिरी घंटा बजते ही कापियां छीन ली जाती हैं।

घंटा यदि बेतरतीब बजाया जाए तो कर्ण-कटु हो सकता है, यदि उसे ताल और सम-गति से बजाया जाए तो संगीत का आनंद दे सकता है। मुझे याद है कि छुटपन में मेरा स्कूल मेरे घर के पास ही था। जब सुबह का स्कूल हुआ करता था, तो उस समय तक मैं अक्सर सोया ही रहता था। और स्कूल का घंटा मुझे सुलाए रखने में मदद करता था। वह ऐसी ताल और गति से बजता था कि नींद में मुझे लगता था जैसे मैं कोई संगीत सुन रहा हूँ। टन टन टन / टन टन टन / टन टन टन ....| और यह क्रम काफी देर तक चलता रहता था।

घंटा नाद है। ब्रह्म है। घंटा काम का आरम्भ है और अंत है। घंटा समय है। घंटा काल है। घंटा घड़ी है, घंटा घड़ियाल है। घंटा शोर है; घंटा संगीत है। घंटा सूचना है। घंटा चेतावनी है। बजाने की चीज़ है घंटा, घंटा सुनने की चीज़ है।

क्या समझे ? घंटा ! घंटा ठेंगा है।

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--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी

१, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

2 टिप्पणियाँ

  1. हर बार की तरह यह भी रोचक आलेख है आ.सुरेन्द्र वर्मा जी ।

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  2. घड़ियाल का अर्थ गुजराती भाषा में घड़ी होता है। लेख रोचक होने के साथ साथ जानकारी भी देता है। काल को समय का बंधन नहीं होते हुए भी पल क्षण मिनट घंटा दिन रात में मनुष्य महाकाल को बांधने की निरर्थक किन्तु सार्थक चेष्टा करता है

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