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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 56 // साथ // दिलीप लोकरे

प्रविष्टि क्रमांक - 56


-दिलीप लोकरे

diliplokreindore@gmail.com

लघु कथा

साथ

रात भर सो नहीं पाया था वह। आज अपने कलेक्टर मित्र से मिलने कि उत्तेजना ने उसे सोने ही नहीं दिया। दोपहर २.३० का समय दिया था किन्तु वह २ बजे से ही आकर ऑफिस में बैठ गया। .चपरासी ने बताया, अभी साहब दूसरी मीटिंग में व्यस्त हैं आपको इंतज़ार करना होगा। इंतज़ार की इन घड़ियों में बचपन के विचारों ने उसे घेर लिया।

भावेश नाम था उसका। आज जिस कलेक्टर मित्र से भावेश मिलने आया था वह उसका बालसखा है दिनकर। ऊपर दरवाज़े के पास लगी नेम प्लेट पर नज़र गयी तो लिखा देखा, दिनकर वासुदेव सांवला। छुटपन से ही उसे पूरा नाम लिखने कि आदत है जिसमें पिता का नाम शामिल होता था। वह पिता जो बेहद अभावों में अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे थे। लेकिन अभावों को उन्होंने कभी बच्चों की शिक्षा में आड़े नहीं आने दिया। दो बच्चे, एक लड़का और एक लड़की। बच्चे भी उनकी उम्मीदों पर सौ टका खरे उतरे। बेटी मेडिकल की पढाई कर डॉक्टर बनी तो बेटा प्रशासनिक सेवा में कलेक्टर।

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भावेश के परिवार में पुश्तैनी कारोबार चला आ रहा है जिसे उसने अच्छे से संभाल लिया था किन्तु बाद में माता- पिता से मन मुटाव के चलते इसने परिवार से अलग हो स्वतंत्र रूप से व्यापार शुरू किया। घाटा हुआ। जैसे तैसे गुज़ारे लायक कमाई होती रही है। और अब बुढापे में माता-पिता भी असहाय होने से मजबूरी में उसके साथ ही रहने लगे है। आर्थिक तंगी के चलते रोज घर में कलह होती है। पति –पत्नी दोनों को बूढा- बूढी एक भार के रूप में महसूस होते हैं।

पिछले दिनों जब दिनकर के अपने ही शहर में कलेक्टर के रूप में आने की खबर लगी तभी से यह सोच कर उससे मिलने के प्रयास में है कि शायद व्यापार में कुछ मदद हो जायेगी। वैसे कुछ आशंकित भी था क्यूँकि दिनकर कि छवि एक सख्त अधिकारी के रूप में थी।

हलके से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ से भावेश की तंद्रा टूटी ,देखा तो सामने ही दिनकर खड़ा था। चपरासी हड़बडा कर खड़ा हो गया लेकिन दिनकर उसे अनदेखा कर भावेश की ओर बढ़ा , बड़ी आत्मीयता से उसे गले लगाया और भीतर की और चलने के लिए आमंत्रित किया। चपरासी हक्का- बक्का होकर देखता ही रह गया।

भीतर जाकर बड़ी देर तक इधर उधर की बाते हुई। कारोबार में जो उचित मदद हो सकती है उसके बारे में आश्वासन भी मिला। घूम फिर कर बातचीत का सिलसिला परिवार की ओर मुड़ा तो दिनकर ने पूछा कि बा और दादा कैसे हैं ? कहाँ रहते है ? तब भावेश का पारा फूट पडा “ कुछ मत पूछो भाई। दोनों मेरे साथ ही रहते हैं , काम धाम कुछ हैं नहीं। दिन भर खाली बैठे बैठे टोका टोकी करते रहते हैं। बीमारियां अलग है दोनों को ,मेरी आधी कमाई तो इनकी दवाइयों में ही ख़र्च हो जाती है। जन्म भर की परेशानी है मुझे तो।” भावेश जब यह सब कह रहा था तो दिनकर के चेहरे के भाव कुछ बदल से गए थे।

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तभी भावेश ने दिनकर से पूछ लिया “ और बताओ तुम्हारे बाबूजी और माँ कैसे हैं ? तुम्हारे साथ ही रहते हैं ?” तब दिनकर ने बड़े स्थिर भाव से कहा “ नहीं भावेश। मेरी ऐसी हैसियत नहीं की माँ बाबूजी मेरे साथ रह सके। बड़े उपकार हैं उनके मुझ पर सो मैं और मेरा परिवार उनके साथ रहता है “।

भावेश को जैसे काटो तो खून। नहीं जिस कुर्सी पर बैठा था उसके हत्थे को जोर से जकड़ लिया। लगा जैसे कुर्सी समेत धरती में समा जाएगा।

-दिलीप लोकरे

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E – ३६ , सुदामा नगर ,नानी माँ धर्मशाला के पास ,हवा बंगला रोड ,इंदौर ४५२००९ म प्र

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 168429701509625868

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  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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