लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 135 व 136 // पद्मा मिश्रा

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प्रविष्टि क्रमांक - 135 पद्मा मिश्रा पुतला-दहन बिरजू की आँखें रोते रोते सूज गईं थी. अब तो इन सूजी आँखों में आंसू का एक कतरा भी शेष नहीं बचा...

प्रविष्टि क्रमांक - 135



पद्मा मिश्रा

पुतला-दहन

बिरजू की आँखें रोते रोते सूज गईं थी. अब तो इन सूजी आँखों में आंसू का एक कतरा भी शेष नहीं बचा था --बस, चिंता थी कि बापू का अंतिम संस्कार कैसे होगा? पास में जितने पैसे थे -सब उनकी दवा दारू में खर्च हो गए. अपने ठेकेदार मालिक से भी उधार नहीं ले सकता था क्योंकि बापू के इलाज में पहले ही इतना पैसा ले चुका था कि , ''और मांगने पर उसे नौकरी से ही निकाल देता . उस पर नियति का खेल देखो कि तीन दिन से बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही है. - सूखी लकड़ियाँ इतनी महंगी कि पैसों के अभाव में उन्हें खरीदने की सोच भी नहीं सकता था बिरजू. बारिश नहीं होती तो जंगल से ही सूखी लकड़ियाँ बटोर लेता या नेताजी से ही कुछ बंदोबस्त कर लेता . अब तो पड़ोसियों का ही आसरा है.

वह बस्ती के हर दरवाजे पर गया . कुछ पैसे तो मिले पर उनसे सूखी लकड़ियाँ नहीं खरीदी जा सकती थीं . ,उसने नेताजी से गुहार लगाई --जवाब मिला --''कल ही दिल्ली से लौटे हैं --आराम कर रहे हैं. इस बारिश में लकड़ियाँ कहाँ से मिलेंगी--जा,भाग --'' बदले में में दया वश बीस रूपये नौकर फेंक कर चला गया. ,''बिरजू को रोना आ गया,मजबूरी में अपना लकड़ी का हाथ-ठेला ही जलाने का विचार किया ,बापू को एक धोती में लपेट उसमें डाल दिया और घाट की ओर चल दिया . चौराहे पर भीड़ जमा थी. --बरसात में टूटी-फूटी सड़कों के विरोध में लोग नेता जी का पुतला जला रहे थे . पुतले के नीचे करीने से सजी सूखी लकड़ियों का बड़ा ढेर. बैनर,-घास-फुस ,जमा था . बिरजू की आँखों में एक चमक आई. --पास खड़े बाबूजी से पूछा--बाबू,!. मै इनमें से कुछ सूखी लकड़ी ले लूँ? -बापू का संस्कार करना है . '' लोग भड़क गए -मरने -मारने पर तुल गए ---''पगला गया है क्या ?. लाश लिए घूमता है ?-लकड़ियाँ क्या तेरे बाप की हैं ,जा,भाग --कहीं और से मांग ''. वह चुपचाप सोचता हुआ आगे बढ़ गया ---वाह! भगवान --नेताजी की भी क्या तकदीर है, जिनके पुतले को भी सूखी लकड़ियाँ नसीब हैं पर एक इंसान को नहीं. आज उस गरीब के लिए न तो लकड़ियाँ हैं . न चार कंधे . वहां सैकड़ों की भीड़ जमा है ,एक पुतला-दहन के लिए --'बिरजू सोच रहा था --ये लोग नेताजी का नहीं इंसानियत ,का पुतला-दहन कर रहे हैं. -- आज इंसानियत मर गई है.

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प्रविष्टि क्रमांक - 136


---आजादी --

पद्मा मिश्रा

कमरे में टीवी तेज आवाज के साथ मौजूद था --गणतंत्र दिवस की धूम और जश्न का मुख्य समारोह दिल्ली से प्रसारित हो रहा था,गाँव से वर्षों बाद अपने बेटे के पास आये स्वतंत्रता सेनानी दादाजी पूरे जोश में थे, और पास बैठे पोते-पोतियों के साथ उत्साहपूर्वक स्वतंत्रता की लड़ाई की यादें ताजा करते करते--कभी प्रसन्नता के आवेग में उछल पड़ते तो कभी धीरे से आँखें पोंछने लगते थे . छोटे बच्चे तो कुछ अनुशासित - -एकाग्र हो टीवी पर आ रहे गणतंत्र दिवस की परेड पर नजरें जमाये थे, परन्तु बड़े -युवा बच्चों को तो यह सारा आयोजन ही नागवार गुजर रहा था. -किसी का क्रिकेट मैच तो किसी का फ़िल्म समारोह का प्रसारण समारोह छूटा जा रहा था. --''अरे, अब हो गया न? , झंडा फहरा दिया जायेगा, फिर थोड़ी देर में राष्ट्र-गान , फिर क्या बचेगा ? दादाजी टीवी छोड़ देंगे,'' ,सब धीरे धीरे फुसफुसाते हुए एक दूसरे को सांत्वना दे रहे थे .

उधर दिल्ली में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी मंच की ओर बढ़ रहे थे -इधर दादाजी का फरमान जारी हुआ --'' सब खड़े हो जाओ '' ,-''क्यों?''-, छोटे बच्चे ने धीरे से पूछा ,

''राष्ट्रीय ध्वज को आदर देने के लिए'' , , वाक्य समाप्त ही हुआ था कि झंडा फहरा दिया गया और राष्ट्रीय गान प्रारम्भ हो गया --''जन-गण-मन ,अधिनायक जय हे ''दादाजी सावधान की मुद्रा में खड़े गुनगुना रहे थे ,बच्चे भी साथ गा रहे थे अपनी अनगढ़ -भाषामे -स्कूल में तो रोज ही गाते हैं,और जो खड़े नहीं थे दादाजी की घूरती नजरों के डर से खड़े हो गए पर राष्ट्र-गान तो याद ही नहीं था,-गाया होगा स्कूल में कभी ,- - अब इतने साल हो गए ,कौन याद रखता है! ,अब टीचरजी थोड़े ही न डांटने आएँगी ?''

राष्ट्र-गान समाप्त हो चूका था -दादाजी ने जोरदार आवाज में -कहा -''यही सीखा है तुमने अपनी शिक्षा से ,देश का, राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना तुम्हे नहीं आता ?''

''अरे दादाजी,जब स्कूल में थे तब याद था,अब इंजीनियरिंग की मोटी मोटी किताबें पढ़ें ,उनके प्रोजेक्ट बनाएँ या राष्ट्र-गान याद करें?''

--'' शर्म आनी चाहिए तुम्हें -तुम लोग देश की उम्मीद हो, जब तुम्ही उसको आदर नहीं दोगे तो '', उस समय सारे बच्चे तो शांत होकर चुपचाप चले गए पर दादाजी के मन में सैकड़ों सवाल उठा गए - -एक स्वतंत्रता सेनानी,कर्मठ अधिकारी की भावी पीढ़ी को राष्ट्र-गान याद न हो, --गणतंत्र का महत्त्व मालूम न हो ,--यह बात उन्हें पीड़ा पहुंचा रही थी, अपने बेटे को उन्होंने जो संस्कार दिए,उसे जिंदगी के उबड़ खाबड़ रास्तों पर , चलना सिखाया. -देश व् समाज के लिए जीना सिखाया,-वह तो अपनी जिम्मेदारियां निभाते हुए जीना सीख गया है,-अब उसकी भी उम्र हो गई है, शायद वह बच्चोंको संस्कार देना भूल गया,या जीवन की आपाधापी में धन कमाने की लालसा में , सब कुछ छोड़ आगे निकल गया, -- बहू भी अपनी दुनिया में खुश है,-तभी तो ये बच्चे एक अनजानी -कल्पना कि दुनिया में जी तो रहे हैं पर अपनी पुरानी पीढ़ी के त्याग, आदर्श व् अनुभवों को पीछे भूल कर , ,'उनका मन व्यथित था आज --वे सोच रहे थे -''आजादी तू उस झंडे में ही क्यों न रह गई कैद ?''.. बाहर बगीचे में टहलते हुए दादाजी इन्हीं गम्भीर विचारों में खोये हुए थे,-तभी गेट पर उनके मित्र शर्माजी ने पुकारा ,दादाजी अपने परम मित्र को देख कर खुश हो गए और लान में पड़ी कुर्सियों पर उनके साथ बैठते हुए --'बोले 'आज तुमसे बातें करने की तीव्र इच्छा हो रही थी,''--''क्या बात हुई ''शर्माजी ने वहीँ पड़ा अख़बार उठा लिया था, कुछ देर पढ़ने के बाद तुरंत बंद कर दिया,--''क्या हो रहा है चारो तरफ,-एक दिन भी ऐसा नहीं जाता -जब अख़बार अमन-शांति की बातें करता हो ' , ,दादाजी का मौन टूटा --''कैसी अमन -शांति?,सारा परिवेश ही उलटी धारा में बहा जा रहा है,-सबको जल्दी है आगे बढ़ जाने की,भौतिकता कि तलाश में -संस्कार-नैतिकता -आदर ,सब कुछ खो दिया है ,इस पीढ़ी ने ,-अब आज ही की बात लो, टीवी पर गणतंत्र दिवस की परेड आ रही थी ,लेकिन बच्चों को यह तक पता नहीं था कि राष्ट्र-गान क्या होता है,झंडे का आदर क्यों करें ?'' , , ,शर्मा जी ने उनके थरथराते हाथों को थाम कर कहा --''हाँ,अब उन्हें फिल्मों के गीत जरुर याद और राष्ट्र-गान तो शायद ही किसी को याद हो ठीक से, अभी मैं अपनी पोती के स्कूल में गया था, छोटे बच्चों की नृत्य-प्रतियोगिता,-कहाँ आठ से दस साल के बच्चे --'छैया,छैया ,डिस्को दीवाने ,मुन्नी बदनाम हुई जैसे गानों पर नाच रहे थे,मैं शर्मसार होकर लौटा. -चाय आ गई थी ,अनुज उनका बड़ा पोता कहीं बाहर जा रहा था,शर्मा जी ने हाल -चाल पूछा,खेल रहे छोटे बच्चों ने समझा -अब भैया को डांट पड़ेगी, वे सब पास आ गये -शर्मा जी ने पूछना शुरू किया --''तुम लोग बड़े होकर क्या बनोगे ?''किसी ने कहा -'हीरो, किसी ने डाक्टर और डांसर तो किसी ने जहाज उड़ाना पसंद किया -सबसे छोटे पोते ने कहा --मैं तो दादाजी बनूँगा, मार दूंगा सब दुश्मनों को -सब दर कर भाग जायेंगे -अंगरेज भागे थे न ,.है ना दादाजी ?'''लेकिन कैसे ?-तुम तो छोटे हो अभी'', शर्मा जी को आनंद आ रहा था ,

--'अपने माथे पर सलाम की मुद्रा में हाथ रखते -कदम ताल करते हुए विभु ने जवाब दिया --ऐसे -वंदे मातरम -वंदे मातरम 'और लैफ्ट राइट करता अंदर चला गया ,प्रसन्नता के आवेग में दादाजी ने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा --''देश अभी जिन्दा है शर्मा जी ,यही आजादी तो हमने चाही थी '

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नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद 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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 135 व 136 // पद्मा मिश्रा
लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 135 व 136 // पद्मा मिश्रा
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