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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 138 // यादगार भूमिका // राजेश आहूजा

प्रविष्टि क्रमांक - 138


राजेश आहूजा

यादगार भूमिका

“कअअट...वैल-डन...बहुत बढ़िया सुषमा जी...”

निर्देशक ने तालियाँ बजाते हुए सुषमा के अभिनय की प्रशंसा की और फिर पूरा सेट तालियों से गूँज उठा। थियेटर में सुषमा ने कई अच्छे रोल करके नाम कमाया था लेकिन फ़िल्मों में उसे अब भी एक ऐसी भूमिका की तलाश थी, जो यादगार बन जाए। इस फ़िल्म से उसे बहुत आशाएँ थीं। इसमें वह एक बारह वर्षीय बच्ची की माँ की भूमिका निभा रही थी।

अगले दृश्य की तैयारियाँ शुरू हो गईं। सेट और प्रकाश-व्यवस्था में फेर-बदल किया जाने लगा। सिनेम़ॉटोग्राफ़र कैमरा दूसरी जगह लगवा रहा था। मौसम अच्छा था इसलिए सुषमा, वैनिटी वैन में जाने की बजाय, स्क्रिप्ट लेकर वहीं एक तरफ़ बैठ गई और अगले सीन के लिए अपने को तैयार करने लगी। फ़िल्म में उसकी बेटी बनी दिव्या, कुछ दूर बैठी अपने डायल़ॉग याद कर रही थी। एक स्पॉट-बॉय ने आकर उससे कुछ कहा और वह स्क्रिप्ट लेकर सेट से बाहर चली गई। थोड़ी देर बाद वही स्पॉट-बॉय सुषमा के लिए चाय लाया। ट्रे से कप उठाते हुए उसने पूछा, “दिव्या कहाँ गई है?”

“उन्हें डायरेक्टर साहब ने बुलाया था। अगला सीन समझाने के लिए,” कहते हुए स्पॉट-बॉय आगे बढ़ गया।

सुषमा को बेचैनी होने लगी। उसने चाय की दो-तीन चुसकियाँ भरीं लेकिन बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसने कप एक तरफ़ रखा और तेज़ क़दमों से निर्देशक के टेंट की तरफ़ चल दी। वहाँ पहुँचकर उसके क़दम ठिठके। अंदर से निर्देशक की, सीन समझाने की आवाज़ आ रही थी। लेकिन साथ ही दिव्या के असहज होने की आवाज़ें भी साफ़ सुनाई दे रही थीं। बिना देर किए, वह टेंट के आगे का पर्दा हटाकर भीतर पहुँच गई। उसे इस तरह अचानक देखकर निर्देशक सकपकाकर एक तरफ़ हट गया। सहमी हुई दिव्या भागकर सुषमा से चिपक गई। उसने उसे अपनी बाहों में समेट लिया और निर्देशक से बोली, “आपको तो पता ही है कि फ़िल्मों में आने से पहले मैं थियेटर किया करती थी। हमारी रिहर्सल तक़रीबन एक महीना चलती थी। नाटक से कुछ दिन पहले, सारे कलाकार कॉस्ट्यूम पहन कर रिहर्सल करते थे। लेकिन मैं पूरा दिन कॉस्ट्यूम पहन कर घूमती रहती थी ताकि उस चरित्र में समा जाऊँ। अपने-आप को चरित्र में ढालने की आदत अब भी है। अगर कैमरे के सामने मैं इसकी माँ हूँ, तो जब तक शूटिंग चलेगी, सेट पर मैं इसकी माँ बनकर रहूँगी।” यह कहकर उसने दिव्या का हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ ले जाते हुए बोली, “चल बेटी, आगे से सीन, सिर्फ़ सेट पर ही समझना।”

बाहर जाते हुए सुषमा के चेहरे पर सुकून था। उसे लग रहा था कि उसने अपने जीवन की यादगार भूमिका निभा ली है।

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