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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 198 // महर // हुस्न तबस्सुम ‘‘निहाँ‘‘

प्रविष्टि क्रमांक - 198


हुस्न तबस्सुम ‘‘निहाँ‘‘

महर

रजिया दुल्हन बनी सहेलियों के बीच बैठी थी। तभी छोटी फुफी सबको हटाती हुई उसके पास आईं और झप से बगल में बैठ गईं और बोलीं ‘‘ मुझे रजिया से कुछ जरूरी बात करनी है‘‘ लड़कियां थोड़ा उधर खिसक गईं और वह रजिया के कान में फुसफुसाने लगीं-

‘‘ देख रजिया, शादी की पहली रात क़यामत की रात होती है। उस दिन जरा संभल कर रहना होता है। निखालिस दिल से नहीं, दिमाग से काम लेना होता है, वर्ना ये मर्द हमेशा के लिए ठग लेते हैं।‘‘

‘‘ क्या मतलब फुफी?‘‘

‘‘ देख ये मर्द बड़े घाघ होते हैं। अपना कुछ भी ज़ाया नहीं होने देते। आज कल ये रिवायत चल गई है कि मर्द बड़ी चालाकी से या फिर इमोशनली ब्लैकमेल करके लड़की से पहली रात को ही महर माफ करवा लेता है। लडकियां जज्बात में आ कर माफ कर देती हैं। बाद में पछताती हैं। ‘‘

उसने हां में सिर हिला दिया।

विदाई हो गई।

रात को जब जमील रजिया के पास पहुंचा तो वही हुआ। जमील ने बड़े अदब से रजिया को सलाम किया

‘‘ अस्सलामवलैकुम‘

‘‘ वालैकुमअस्सलाम‘‘ रजिया ने झिझकते हुए जवाब दिया।

‘‘ मोहतरमा, अब तो आप हमारी शरीक ए हयात बन चुकी हैं। ( जमील को अपने दोस्तों की बात याद आई, ‘‘ यार पहले महर माफ करवा लेना फिर हाथ लगाना)

वह आगे बोला- ‘‘आपसे एक इल्तिजा है। आप अपने इस नाचीज को एक बोझ से आजाद कर दीजिए तो मेहरबानी होगी।‘‘

‘‘ ...जी..?‘‘ वह अबूझी सी बोली।

‘‘ जी..,अगर आपको भी इस नाचीज से उतनी ही मुहब्बत है तो हमें महर के कर्ज से आजाद कर दीजिए।‘‘

रजिया के कानों में फुफी के लफ्ज गूंज -

‘‘ आपकी मुहब्बत सिर आंखों पर। लेकिन आपको एक बात बताना चाहूंगी कि महर कर्ज़ नहीं फर्ज़ होता है।‘‘

जमील को उसकी इस तरह से मुखालफत अच्छी नहीं लगी। तब भी वह हार नहीं माना और खिसयाया सा बोला-

‘‘ अच्छा मान लो कि मेरी इतनी हैसियत नहीं है कि अदा कर सकूं ?‘‘

‘‘ यह कोई दलील नहीं हुई मोहतरम। मेरे बाबा की भी हैसियत नहीं थी कि वो आपकी मांगें पूरी कर सकें। मगर उन्होंने किया।

जमील को जैसे करंट मार गया। वह झल्ल से दरवाजा खोल कर बाहर निकल गया।

वह चुकी सी बैठी रह गई। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। अगर माफ कर देती है तो जो थोड़ी बहुत मजबूती है उससे भी जाती है। मर्द जात का कौन भरोसा। और अगर नहीं माफ करती है तो शौहर से भी हाथ धो देगी। उधर, जमील को ये सोच कर नींद नहीं आई कि जो लड़की इतनी लंबी जुबान रखती हो कि पहली ही रात में उसे चारों खाने चित्त कर दिया उससे वह बाकी जिंदगी में कैसे पार पाएगा। सुबह पिता से कह दिया कि लड़की का किरदार सही नहीं है। उसे वापस भेज दें।

अब्बू कुछ सोच कर दुल्हन के कमरे में गए तो दुल्हन फोन पर कह रही थी-

‘‘ फुफो, ऐसे भिखमंगों के साथ तो नहीं होगा गुजारा मेरा। एक नंबर का खसीस है। जो आदमी बीबी का महर तक न अदा कर सके वो क्या खा के बीबी रखेगा। यहाँ से ले चलो मुझे। मेरा दम घुटता है।‘‘

जमील के अब्बू उल्टे पांव वापस हो गए।

1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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