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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 199 से 203 // आनंद प्रकाश शर्मा

प्रविष्टि क्रमांक - 199

आनंद प्रकाश शर्मा


‘‘परिवर्तन ‘‘

उसके जीवन मनोरम में दो घटनाएं साथ-साथ घटित हो रही थीं एक वह थी जहां से उसे एक चेहरा नित्य या मौका मिलने पर देखता था। और उस चेहरे को देख उसे भी सुख मिलता था। और दूसरी घटना में वह था और उससे बातें करने वाला भी मौजूद था। वह भी उससे बातें करता था , दोनों प्यार में थे। ऐसा दोनों को महसूस होता था।

दूसरा चेहरा उसे बार-बार प्यार जताता था। एक रोज वह बोला -क्या तुम कुदरत को जानती हो ? वह बोली -हां। क्यों....?क्या मैं तुम्हें इतनी भी गंवार लगती हूं ....? व बात को फौरन संभालते हुए बोला - नहीं ,नहीं ...मेरे कहने का मतलब यह नहीं था। वह बोली - फिर क्या था ? वह बोला - ‘‘परिवर्तन‘‘।

वह सोचने की मुद्रा में आते हुए उसे देखने लगी और बड़े ही धीरे से बोली -तुम्हारा मतलब बेवफाई ....और रिश्ता खत्म हमारा -तुम्हारा। नहीं ...मैं ऐसा हरगिज नहीं करुंगी। वह बोला -मैं भी ऐसा कभी नहीं करुंगा। वक्त गुजरता गया। दोनों ने वचनपूर्वक शादी भी कर ली।

उसकी ‘शादी के उपरांत भी वह चेहरा जो उसे देखा करता था। मौका मिलते ही देखता ही रहता। हां , इस दौरान थोड़ा प्रखर जरुर हआ था। कभी -कभी थोड़ा मुस्कुरा भी देता था। मगर उसकी नोटिस में बराबर रहता था ,बगैर किसी औपचारिकता के परंतु अभिन्न। इधर वक्त बीतने के साथ ‘शादी के बाद वे दोनों थोड़े -थोड़े फिर ज्यादा व्यस्त रहने लगे। उनकी अपनी बातों की जगह किसी की बुराई करते रहने वाती बातें आने लगीं। फिर जल्द ही वे दोनों आपस में ताने देने लगे। मानो एक -दूसरे पर दोषारोपण करने लगे। आज हालात ये थे कि दोनों एक छत के नीचे ही बेगाने पराये से थे।

उधर दूसरी ओर देखने वाला चेहरा कुछ समय से उसे नजर नहीं आया वह इस चेहरे को देखने व ढूंढने की इच्छा रखता था परंतु कोई ठौर-ठिकाना भी उसे मालूम न था। ऐसे में वह शांत ही रहता फिर वह कुछ कर सकता नहीं था। ये सत्य था ....अचानक वह किसी काम से नुक्कड़ तक आया था। तभी उसे किसी की अर्थी जाते दिखी। वह खड़ा हो गया। जब अर्थी उसके नजदीक से गुजरी ,तब वही देखने वाला चेहरा उसे उस अर्थी में नजर आया। आज भी पूर्ववत ही मानो वह उसे ही ‘शांत मुद्रा देख रहा था.....वह ठिठका और बुदबुदाया -‘‘परिवर्तन ‘‘ हां , परिवर्तन ही है शाश्वत। ये आज उसे खुद में ही स्पष्ट समझ है आया। वह घर आता है ,उसके सम्मुख उसकी पत्नी उसे देर से आने का ताना देकर चिल्लाती है परंतु अब वह शांत ही रहा और रहता है। क्योंकि वह बखूबी जानता है ‘‘परिवर्तन ‘‘,इंसान नहीं कुदरत के बस में ही है।

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प्रविष्टि क्रमांक - 200

आनंद प्रकाश शर्मा

अकिंचित मन

जब दोनों एक -दूसरे की बांहों में होते ,तब कस्मे ,वादे ,वफाओं के उदाहरण भी अनंत होते। दोनों एक -दूसरे के लिए ही बने हों ,ऐसा प्रतीत होता। परंतु कुछ समय बीतने पर एक राह पर उसने पूछ ही लिया -प्रिया , तुम्हारा मन कुछ अकिंचित सा मालूम होता है। वह तपाक से बोली -किंचित मात्र भी नहीं ,तुम ऐसा सोच भी मत लेना। परंतु उसने पुनः प्रिया की आंखों के अंदर झांका ,तब उसमें उसने प्रिया के अकिंचित मन को ही पाया। और वह सच भी हुआ।

आज प्रिया को ,उसे बिना बताये मोबाइल का स्विच आफ कर , बिछडे एक अरसा हो गया है और इसकी पुष्टि भी हुई। जिंदगी के इसी मोड़ पर ,एक मोटरसाईकिल पर उसके बेहद समीप से हमउम्र लड़के को कसकर पकड़कर जाते हुए लड़की को देखकर वह ठिठका। उसके मुख से निकला भी -.प्रिया। हां , ये तो प्रिया ही थी ओैर इसके आगे वह बड़बड़ाया -‘‘अकिंचित मन ‘‘।

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प्रविष्टि क्रमांक - 201

आनंद प्रकाश शर्मा

‘‘इंसान ‘‘

कार्य कर रहे सुतार (बढ़ई) से उसका नन्हा कलूटा बालक अपनी फटी हुई बनियान के छिद्र में अंगुली फेरता घुमाता हुआ बोला - बाबा ...बाबा ...सुनते हो बाबा ...हम सबको ईश्वर ने बनाया है। है न बाबा ..एक ही ईश्वर ने।

सुतार ने कार्य करते हुए ही हामी भरी -हां। इस पर बालक बड़े दुखी अंदाज में बोला -फिर बाबा आप रात-दिन कार्य करते हो ,पर फिर भी हम इतने गरीब क्यों हैं? जबकि आपसे कम काम करने वालों के पास सैर-सपाटे वस्ते मोटर कार है। पहनने के लिए अच्छे -अच्छे कपड़े हैं ,रहने को ऊंचे -ऊंचे मकान हैं। वे अमीर हैं बाबा .....तो क्या हमें ईश्वर ने ही गरीब बनाया है?

बालक की उक्त बात पर सुतार ने सिर ऊपर किया और बालक को गंभीरता से देखते हुए पूरे आश्वस्त भाव से बोला -नहीं , ईश्वर ने नहीं ,हमें गरीब सिर्फ और सिर्फ इसी हमारे -तुम्हारे जैसे इंसान और उसी की बनाई व्यवस्था के कुचक्र ने हमें गरीब बनाया है।

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प्रविष्टि क्रमांक - 202

आनंद प्रकाश शर्मा

‘‘स्पष्ट ‘‘

‘‘स्पष्ट‘‘ का सबसे बडा उदाहरण जब उसका जन्म हो रहा था तब उसका स्पष्ट होता जन्म लोगों को बाखूबी पाता था। पर उसे कुछ नहीं पता था। जब वह जन्मा था ,तब भी उसे कुछ नहीं पता था।‘‘हां ‘‘ औरों को सबकुछ स्पष्ट पता था। और वह बडा हुआ तब स्वयं में स्पष्ट हुआ। ,तब उसे लोगों का पता नहीं था परंतु वह खुद में ही व्यस्त ,‘‘ स्पष्ट ‘‘रहा और लोग उसके लिए अप्रासंगिक हो गए।

आज जब वह मर रहा है तब औरों के लिए एक बार फिर ‘‘स्पष्ट ‘‘ दिख रहा है। आगे जब वह मर चुका है तब भी उसे कुछ नहीं पता है परंतु औरों के लिए वह अब भी ‘‘स्पष्ट ‘‘ ही था।

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प्रविष्टि क्रमांक - 203

आनंद प्रकाश शर्मा

‘‘सोचती हुई लड़की ‘‘

उम्र 20 साल लगभग ,रंग गोरा वर्ण ,सुंदर नहीं......बेहद सुंदर सी। इस वक्त अपने घर की खिड़की से बाहर देखती हुई सोचती है -‘‘क्या उसके इस तरह रोज-रोज खिड़की पे यूं कैदी की तरह समय गुजारने की वजह खिड़की के बाहर कहीं दिखाई पड़ती दुनिया है या फिर जहां जिस जगह घर में वह खडी है यानि घर के भीतर के उसके अपने घर वाले हैं। क्योंकि इस खिड़की के अलावा उसकी आजादी की दूसरी पारी उसके इसी मकान (घर) की छत ही होती है। बाकी तो उसे खूब पढ़ाया -लिखाया गया है व आत्मरक्षा हेतु कराटे कुंग....फू ...ताईक्वांडो से लेकर मलखंब तक सिखाया गया है , पर क्या फायदा ? उसे मोहल्ले की पहली किराना दुकान तक जाने देने पे घरवालों की सांसें छूटती हैं परंतु बाहर के खतरे जानने या गिना देने भर से उसके हालात पूरे नहीं हो जाते।

उसे देखती शरारती आंखें उसके अपनों के पास इसी घर तक में मौजूद हैं। वह रिश्तों के कुल जमा विश्वास के भरोसे बची सी रहती तो है ,पर कितनी ....? ये जानकर दुनिया सिर्फ तड़पकर रह जाएगी।घर अंदर के वहशीपन के लिए अभी कैंडल मार्च निकाला जाना बाकी है। यहां से कानून की पकड़ थोडी सी अछूती ही है। घर अंदर सयानों की दादागिरी या उलाहने पूर्ण समझाईशों के बोझ को बयां कर पाना उसके लिए थोडा कठिन ही है।

मर्यादा है , वह पिता ,चाचा ,भाई व उसके घर आने वाले मित्रों पर अभी सेाच तो सकती है ,पर कुछ बोल नहीं सकती। ये 21 वीं सदी है और सच भी ये ही है। फिर अगर उसने मदद वास्ते किसी से कुछ कहा भी तब ......तब ....लोग उस पर विश्वास क्यों करेंगे ? तो क्या वह पिता या भाई या ताऊ या चाचा ....या ....अन्य रिश्तों पर इल्जाम लगाएगी ?क्यों ?

फिर उसे मौका पड़ते चूकता कौन है ?शब्दों से ,शरारतों से , वृद्धों के बेड टच (स्पर्शों से)......वह त्रस्त है अपनों से। पर उसकी सुनता कौन है ?

और जब स्त्री शक्ति पर टी.वी. और किताबों में कुछ भी लिखा या कहा जाता है तब उसमें भी सबसे ज्यादा स्त्री -पुरुष समानता की बातें ही चल रही होती हैं यहां यह भी पूछना चाहती है वह , भला दुनिया की कौन सी स्त्री , पुरुष के तरह या उसके समान बनना चाहती है ?फिर क्या एक स्त्री , पुरुष को भली -भांति पहचानती नहीं है ? स्त्री , पुरुष के जैसे होने पर बलात्कार की परिभाषा भला क्या हो जाएगी ?तो क्या समाज के भीतर ही भीतर स्त्री ,पुरुष की तरह सोच लिए कहीं पल बढ़ रही है। ऐसा है ,तब फिर शराफत भरी सयानी समझदारी भरी बातें छोड़ ही दीजिए और समाज और उसकी दशा -दिशा की मत पूछिए , वह तो ऐसी हरगिज नहीं है।

अब आगे सोचने के पूर्व वह बेचैन है। उसके मुख से ठंडी सांस पूरे वेग से छूटती है वह क्या करे ....? परिवार वाले उसके लिए अच्छे स्मार्ट ,पढे -लिखे लड़के की तलाश भी कर रहे है ं। ‘शायद उसे वह लड़का आजादी का सबब साबित हो। परंतु कितनी लड़कियां शादी के बाद खिड़की और छत से आगे बढ़ गईं? अखबार पटे पडे हैं ,परामर्श केन्द्रों में शादी शुदाओं के विवादों और काउंसलिंग से। एक लड़की माता -पिता के घर, आंगन में स्वतंत्र नहीं रह सकती ।तब सिर्फ रिश्ता बदल जाने से यानी पति के आ जाने से कौन सा चमत्कार हो जाता है ? फिर समाज में उसे वह चमत्कार होता दिखाई क्यों नहीं पड़ता है अर्थात वह शादी से कौन-सी अपेक्षा करे......?

नई सोच पति के रुप में सच्चे मित्र या राज साझेदार की वह रखे ,तो क्या वह ऐसा ही सोचे कि उसके हिस्से का सबेरा आना अभी बाकी है ? इस खिड़की पर खडे -खडे वह क्या -क्या नहीं सोच लेती। अब ये उसकी रोजमर्रा सी आदत हो गई है । हां ...छत पर थोडी सांस ज्यादा मुक्त स्वरुप में वह ले पाती है । परंतु ... उसे जो मोबाईल मिला हुआ है , वह भी एंड्राइड नहीं ,डब्बा है डब्बा। खैर ,छत से डूबते सूरज के साथ हताश हो भी जाती है और तब पुनः प्रातः काल उगते सूरज के साथ एक नई उजास से परिपूर्ण भी हो लेती है । इस उम्मीद के साथ कि दुनिया बदलाव के शाश्वत नियम पर चलती है और एक दिन उसके हिस्से की सच्ची आजादी लेकर एक नया सूरज जरुर से आएगा। वह आजादी जल की तरह कल-कल बहते चले जाने या फिर आकाश में दूर तक उड़ते पक्षी की उडान की तरह ही होगी। सच ....ऐसा कुछ हो , वह खिड़की से पृथक होती है अगले दिन तक के लिए।

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-आनंद प्रकाश शर्मा

स्वतंत्र लेखक ,पिपरिया

जिला -हेाशंगाबाद (म0प्र0), भारत

1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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