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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 274 // एक मुस्कान // संध्या चतुर्वेदी

प्रविष्टि क्रमांक - 274

संध्या चतुर्वेदी

एक मुस्कान
फरवरी  का महीना था ।बात शिवरात्रि की है ,उस दिन सुबह से ही बारिश हो रही थी ।तभी गली में मुझे बीन की आवाज सुनाई दी। किसी ने दरवाजा खटखटाया और आवाज लगाई ,ओम नमः शिवाय ।
शिव जी का नाम  कानों में सुनाई दिया तो खिड़की खोल कर देखा गली में।
दो संपेरे हाथ में बीन और सांप की पिटारी लिए हुए बीन बजा रहे थे और उन के साथ ही कुछ बच्चे सभी का दरवाजा खटखटा रहे थे। तभी किसी बच्चे ने आवाज लगाई ,ओ माई नीचे आ कर कुछ दान करो। आज शिव रात्रि का दिन है।

ओह माँ इतनी तो ठंड है आज इन को ठंड में भी चैन नहीं ।मन ही मन में बुदबुदाते हुए मैंने कहा ,
आती हूँ रुको तो जरा और कदम बढ़ाते हुए मैं नीचे की ओर चल दी।
दरवाजा खोला तो देखा ,वो बच्चा नंगे पैर था। मुझे देखते ही दया आ गयी।
क्या चाहिए,मैंने पूछा तो बच्चे ने उत्तर दिया। कुछ भी दे दो माई।
इतनी ठंड में तुम लोगों को ठण्डी नहीं लगती क्या??
लगती तो हैं, पर पेट की आग ज्यादा गर्म होती है और ठंड कम।
इतना कह कर वो व्याकुल सी आँखों से मुझे देखने लगा।

मेरे अंदर का ममता भाव जाग्रत हो चुका था। अपने बच्चे के पुराने जूते उसे दिए।
देखो तो जरा पहन कर,उस ने खुशी खुशी पहन लिए।
फिर अंदर से कुछ गर्म कपड़े और चप्पल भी बच्चों को दी।
सभी बच्चों के चेहरे पर खुशी थी। तभी एक छोटा सा बच्चा बोला कुछ मिठाई खाने को दो ना,बहुत दिन से कुछ मीठा नहीं खाया।
शायद वो बच्चे भी समझ गए थे कि उन को निराश नहीं होना पड़ेगा।
फरवरी का महीना था। शादियों का सीजन चल रहा था, तो घर में मिठाइयां भी रखी थी।

मैंने एक मिठाई का डिब्बा जिसमें मठरी और लड्डू थे ।उन को दिए और बोला लड्डू खा लो अभी।
डिब्बा लेते ही वो सब खुशी खुशी चले गए।
बच्चों के चेहरे पर लड्डू खा कर जो मुस्कान आयी।
उस से बड़ा सुकून शायद ही कुछ हो।
गरीब को भीख में रुपए बेशक ना दे,पर इतना जरूर करें कि जो कपड़े या जूते,आप के किसी काम के नहीं ।शायद किसी दूसरे की जरूरत पूरी कर सकते हैं।।

गरीब को दुत्कारें नहीं। गरीबी कोई बीमारी नहीं उस की लाचारी है।

संध्या चतुर्वेदी
मथुरा उप्र

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