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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 297 व 298 // डॉ आशुतोष


प्रविष्टि क्रमांक - 297
डॉ आशुतोष
सौदा
वेद अच्छी तरह जानता था कि काया के न रहने पर वो जिंदा नहीं रह पाएगा और काया को किसी भी सूरत में ज़िन्दगी की तरफ मोड़ नहीं पा रहा था। सारी दुनिया की नजर क्या उसके प्यार को ही लगनी थी। क्या बिगाड़ा था काया ने भगवान का जो उसकी अच्छाइयों का प्रसाद कैंसर के रूप में दिया, सोचता हुआ वह सुनसान सड़क पर बढ़ा जा रहा था। तभी फोन की घंटी बजी।

मां का फोन था। सुबह ही मां ने अनाथ आश्रम जाने को कहा था, फोन आते ही उसे अचानक याद आया।
"हां मां, मुझे याद है। मैं बस पहुंचने ही वाला हूं।" कहकर फोन जेब में रखा और आश्रम की तरह भागा।
पहुंचते ही मां का परिचय दिया। उसने वेद को कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और फिर अन्दर चली गई। वापस आते हुए उसके साथ एक छोटी सी बच्ची थी। बच्ची ने उसे अपने पीछे आने को कहा।

"बाबू आपके हाथ जोड़ती हूं मुझे बहुत ज़ोर से मत छूना। कल जबसे वो साहब गए हैं, नीचे बहुत दर्द होता है।"
सारा माजरा समझ में आते ही वेद के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। मां का दिया हुआ चेक जेब में पड़ा मानो मुंह चिढ़ा रहा था। अब तक उसका इरादा बदल चुका है और वह चेक देने की बजाय उस बच्ची को यातना के जीवन से मुक्ति देने के बारे में सोचने लगा जिस तरह बाईस साल पहले काया किसी की नेकी के रुप में अपनाई गई थी।
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प्रविष्टि क्रमांक - 298
डॉ आशुतोष
जान बच गई
ठंड बहुत थी ऑफिस से निकलते ही शेखर सूनी सड़क पर अपने रास्ते बढ़ा चला जा रहा था। उसके पास से आती हुए गाड़ी निकली उसे लगा शायद वो इस रेस में पीछे ना रह जाए और उसने गाड़ी को ओवरटेक करने की कोशिश की कुछ दूर तक तो गाड़ी के आगे निकल गया तभी अचानक जेब में रखा हुआ फोन बजने लगा उसे बहुत जोर से गुस्सा आया सभी को पता है मेरा ऑफिस से निकलने का वक्त होता है फिर भी जाने क्यों फोन बजाते रहते हैं उसने फोन की घंटी अनसुनी कर दी और रेस लगाता रहा तभी दूसरी कॉल आई इस बार चाहकर भी उस कॉल को अनसुना न कर पाया और गाड़ी किनारे लगाकर फोन निकाला। देखते ही उसका गुस्सा और बढ़ गया यह उसकी मित्र की कॉल थी।

“क्या हुआ है बोलो थोड़ी देर के बाद कॉल नहीं कर सकती थीं तुम्हें पता होता है इस वक़्त मैं ऑफिस से निकल रहा होता हूं”

“कुछ नहीं बस ऐसे ही बुरे-बुरे ख्याल आ रहे थे मन में, मन नहीं लगा तभी तुम को फोन लगा दिया”
“तुम और तुम्हारे खयाल बस मुझे यही सब नहीं पसंद फोन रखो”

झल्लाकर उसने फोन बिना काटे ही जेब में रख दिया और अपनी गति से आगे बढ़ने लगा। कुछ कदमों की दूरी पर ही पहुंचा होगा देखा सामने भीड़ लगी है वह गाड़ी से उतर कर देखने गया। यह क्या देखते ही उसके मुंह से उफ्फ निकल गया क्योंकि यह वही गाड़ी थी जिससे कुछ देर पहले रेस लगा रहा था गाड़ी एक गड्ढे में गिर गई थी और गाड़ी का चालक औंधे मुंह जमीन पर पड़ा था उसके सिर पर बहुत चोटें आई थीं, लगातार खून बह रहा था।
उसने भगवान को धन्यवाद कहा। अच्छे समय पर उसकी मित्र का फोन आ गया और उसने गाड़ी किनारे लगा दी। नहीं तो अब जो यह दृश्य देख रहा है शायद देखने के लिए न बचा होता।
डॉ आशुतोष
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परिचय
नाम: डॉ आशुतोष तिवारी
भाषा ज्ञान: हिंदी, अंग्रेजी, अवधी।
कृतियाँ: “The Judgment of Night” An English Book
“पंखुडियां: २४ लेखक २४ कहानियां” साझा कहानी संग्रह
इसके अतिरिक्त अन्य अंग्रेजी संग्रहों में सतत लेखन
लेखन विधाएं: कविता, कहानी, गद्य-पद्य।
जन्म तिथि- 29-07-1986
सम्प्रति: डॉक्टर
लेखन: अनुभव हिंदी और अंग्रेजी में 15 वर्षों का अनुभव।
सम्मान: अलंकृति कला समिति द्वारा सर्वश्रेष्ठ युवा रचनाकार के रूप में पुरस्कृत।
Youngest Researcher of Physiotherapy Global Congress USA.
अन्य उपलब्धियां: With a wide social and professional aura with Indian United Trust
सर्वाधिक युवा लेखक के रूप में पुरस्कृत।

e-mail- healinghands24@gmail.com, tiwari.drashutosh@gmail.com,
पता: 269-आवास-विकास कॉलोनी, फतेहपुर 212601
https://healinghands24.blogspot.in/

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है, आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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