नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक -309 // कहने पर, कुम्हार गधे पर बैठता नहीं // जस राज जोशी “लतीफ़ नागौरी”

प्रविष्टि क्रमांक - 309


कहने पर, कुम्हार गधे पर बैठता नहीं  

              
            
  जस राज जोशी “लतीफ़ नागौरी”


मियां अल्लानूर बहरे ज़रूर है, मगर है होश्यार। वे कभी जेब से पैसे खर्च करने वाले नहीं। उनको है, शौक दावत उड़ाने का। उनके रब्त और रसूख़ात, बड़े-बड़े लोगों से रहते हैं। जनाब नियारिया की मस्जिद के कहीं आस-पास रहते हैं। पूरी ज़िंदगी काट ली, सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाते हुए। अब जनाब जब रिटायर हुए हैं, तब वक़्त काटना ज़रा मुस्किल हो गया। मगर, उन्होंने इसका भी हल निकाल डाला। भले नौकरी के वक़्त वे जुम्मा-जुम्मा नमाज़ अदा करते थे, मगर अब रिटायर होने के बाद, वे बन गए हैं खम्स वक्ती नमाज़ी। नियारियों की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने जाते थे, तब लोग उनको देखकर वक़्त का अंदाज़ लगा देते कि, अभी मियां जुहर की नमाज़ के लिए जा रहे या सबाह की। इनको देखकर ही वे भी निकल पड़ते नमाज के लिए...मस्जिद की ओर। अक्सर मस्जिद में वे पांच-दस मिनट जल्द पहुंच जाते, और वहां चबूतरे पर बैठकर जनाब लोगों से गुफ़्तगू करते वक़्त बिताया करते। जैसे ही अज़ान की आवाज़ लगती, मियां झट वजू करके मस्जिद में दाख़िल हो जाया करते। अभी-कल परसों की ही बात है, मियां को शादी की दावत खाने किसी गैर मुस्लिम के रिहाइश ख़ाने जाना था। आसियत का अँधेरा निकल चुका था, मियां को ध्यान न रहा कि उनके पड़ोस के घर में कमठा चल रहा था। रास्ते में बजरी बिखरी हुई थी, जिससे मियां का पाँव फिसल गया और वे नीचे गिर पड़े। किसी तरह बेचारे उठे। मगर अब उनका चलना कठिन हो गया। उन्होंने सोचा कि, ‘कोई सवारी मिल जाए तो वे उस पर सवार होकर घाटी के नीचे चले जायेंगे, और वहाँ किसी स्कूटर वाले से लिफ्ट लेकर पहुंच जायेंगे दावत-स्थल। और दावत का लुत्फ़ उठाकर, वापस किसी के साथ चले जायेंगे।’


इस वक़्त कोई स्कूटर या मोटर साइकल, उन्हें  नज़र न आयी..जिस पर बैठकर वे आसानी से घाटी के नीचे जा सके। तभी गधों पर बज़री लादे एक बेलदार नज़र आया, बज़री ख़ाली करके वह मियाँ अल्लानूर से तेज़ आवाज़ में पूछने लगा “हुज़ूर, यहाँ कैसे ? पांवों में दर्द है तो, आप इस गधे पर बैठ जाइए। मैं आपको नीचे छोड़ दूंगा। आइये, आइये हुज़ूर।” लाचारगी थी, यहाँ सवारी मिलना अब संभव नहीं..फिर, क्या करते बेचारे मियाँ अल्लानूर ? आराम से बैठ गए, गधे पर।


दूसरे दिन, यहीं मस्जिद के चबूतरे पर मियाँ अल्लानूर बैठे थे। उस वक़्त वही बेलदार गधों को हांकता हुआ वहां आया, उनको बैठे देखकर वह बोला “हुज़ूर, गधे पर सवार हो जाइए। नीचे छोड़ देता हूँ।”
गर्ज़ मिटी और गुज़री नटी, इस कहावत की तरह अब मियाँ के सामने कोई मज़बूरी नहीं, और न उनको घाटी के नीचे जाना था। अब वे बहरे की तरह, हाँ हू बोलते रहे..मगर उसे कोई ज़वाब नहीं दिया।
आख़िर बेचारा बेलदार बोला “यह बड़े मियाँ भी बन गए हैं, ‘कहावत वाला कुम्हार।’ जो अपनी इच्छा से बैठ जाता है गधे पर, मगर कहने पर, कुम्हार गधे पर बैठता नहीं।”
फिर क्या, मियाँ अल्लानूर के न बोलने पर वह बेलदार गधों को हांकता हुआ वहां से चला गया।             

--  

1 टिप्पणियाँ

  1. जस राजजी ने हास्यरस लाते हुए यह लघु कथा लिखी है,जो मनोरंजक और शिक्षाप्रद है ।
    दिनेश चंद्र पुरोहित

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.