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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 310 // जन्मपत्री // सुधा शर्मा

प्रविष्टि क्रमांक - 310

सुधा शर्मा

जन्मपत्री

फरवरी का बडा सुहाना गुलाबी मौसम चल रहा था। लेकिन शर्मा जी के घर का ताप उनकी बेटी रश्मि के कारण बढा हुआ था। माता- पिता की नींद में रश्मि की जन्मपत्री बडी बाधा डाल रही थी। कोई दिन ऐसा नहीं जाता था जिस दिन शर्मा जी किसी लड़के के पिता से बात न करते हो या लड़का देखने न जाते हो लेकिन सभी पहले जन्मपत्री और बायडाटा माँगते थे। अब तो लोग इससे भी आगे निकल गए थे। बस लड़की की जन्मतिथि और नाम पूछते थे और कम्प्यूटर खोलकर बैठ जाते थे। क्योंकि कम्प्यूटर बाबा सबकी जन्मकुण्डली जानते थे। यदि जन्मपत्री में गुण मिल भी जाते थे तो वे अपने हरिद्वार वाले या अपने शहर के पंडित पर विश्वास करने की बात कहकर बात टाल जाते। वैसे भी केवल गुण मिलने से कुछ नहीं होता ,ज्योतिषाचार्यों के अनुसार अन्य भी ग्रह- नक्षत्र की दशा देखना उनका मिलान होना भविष्य में सन्तानोत्पत्ति, रोजगार, तथा भावी उन्नति को निर्धारित करती है। जन्मपत्री के ही कारण  ना रश्मि के रूप का जादू जिन्दगी में रंग भर रहा था ना उसकी शिक्षा और सर्विस जिन्दगी में चार चाँद लगा रही थी। योग्य वर ढूँढना इतना कठिन लग रहा जैसे पारस मणि की  खोज की जा रही हो। 

     आधुनिकता का दम भरने वाले लोग भी शादी के नाम पर पूरे रूढ़िवादी थे। विज्ञान चाँद पर कदम बढाने के बाद मंगल की ओर अग्रसर था और वहाँ के रहस्य खोलने के दावे कर रहा था लेकिन ज्योतिष विज्ञान लड़के या लड़की की कुण्डली में मांगलिक दोष बताकर उसके जीवन को अभिशप्त कर रहा था। यही अभिशाप रश्मि के जीवन को लगा था। बत्तीस वर्ष की रश्मि ने निर्दोष होते हुए भी माता- पिता के सुख-चैन में ग्रहण लगा रखा था।  वैसे कहते थे कि अट्ठाइस वर्ष की आयु के बाद मांगलिक दोष का कोई असर नहीं रह जाता, लेकिन ये सब बातें केवल सैद्धान्तिक थी। धर्मभीरू लोग कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे।

      पता नहीं वैसे तो लोग कहते हैं कि जीवन में वही होता है जो ईश्वर ने लिखा है लेकिन लोगों ने भविष्य व भाग्य  निर्धारण का ठेका पंडितों  को दे रखा था। रश्मि के बारे में पंडितों के  बताए उपाय फलीभूत नहीं हो रहे थे। पंडितों के कहने पर मेरठवासी होते हुए भी नासिक में जाकर पूजा कराई, लड़की का तुलादान कराया, चींटियों की बमी पर आटा डाला, देशी घी भरकर गोला रखा। लेकिन मंगलग्रह था कि अपनी भृकुटि सीधी करने के लिए तैयार ही नहीं था।

      इन परिस्थितियों से रश्मि की माँ बडी चिडचिडी रहने लगी थी। वह अपने से ही बतियाने लगी थी  तथा जो मन में आता था बडबडाती रहती थी   -" पता नहीं पहले जमाने में कहाँ मर गए थे ये पंडित जब किसी को अपने बच्चों के जन्म का ना समय याद था ना तारीख । किसी से उमर पूछो तो जवाब था काली आँधी आने से पहले जन्म हुआ था या जब भूचाल आया था उसके बाद। तारीख तो दूर की बात है महीना भी सही से नहीं बता पाती थी। उल्टे - सीधे जवाब मिलते थे-"गेंहूँ की फसल कटने से पहले पैदा हुआ था, जन्माष्टमी के बाद पैदा हई थी।  बच्चों की शादियाँ हो जाया करती थी। दो दोस्त अपनी जुबान के हिसाब से शादी कर लेवें थे। तब भी गृहस्थी चलती थी  छुट- छुटाव ना होवें थे। अब तो जन्मपत्री का अच्छी तरह मिलान करके, गुण मिलाके, ग्रह- नक्षत्र देखके शादी करें तब भी छूट- छूटाव हो जा, किसी को मार दें, किसी को जला दें। अदालतों में  मुकदमें चलते रहवें।    तब ये पंडत कुछ ना करते। सब कमाने- खाने के धंधे है । धरम के नाम पर दुकान खोल रखी । ऐसा क्या मेरी बेटी के लिए भगवान ने लड़का ही ना बनाया। पहले कहावत थी कि लड़का तो कुँआरा रह सकता है राजा का भी, लड़की ना कुँआरी रहवे भिखारी की भी। पता नहीं मेरी लड़की का क्या होगा? मेरे नसीब में बेटी के हाथों में  मेंहदी लगी देखनी है या नहीं?  पता नहीं, जो लव मैरिज कर ले हैं उनकी जन्मपत्री कौन मिलावे?  रश्मि अपने मन को काबू में करके माँ को ढाढस बँधाती। लेकिन वस्तु स्थिति उसको और भी अधिक सालती क्योंकि अपने माता- पिता के दुखों  का कारण वह स्वयं को ही मानती थी। लेकिन उनकी चिंता को दूर करने का उसके पास कोई विकल्प नहीं था।

      उसने मन ही मन एक योजना बनाई और वह एक पंडित के पास गई। उससे एक बहुत अच्छी कुण्डली बनवाई । माता- पिता के शंका करने पर उन्हें समझाया-"पापा! इतने धर्मभीरू मत बनो। यदि भगवान पर विश्वास रखते हो तो वही होगा जो उसने मेरे भाग्य में लिखा होगा, शत- प्रतिशत वही होगा। दुख मिलना होगा दुख मिलगा, सुख मिलना होगा सुख मिलेगा। कहते है न; समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को नहीं मिलता ,तो फिर मेरी शादी किसी से भी हो मुझे मेरे भाग्य का हिस्सा ही मिलेगा।"

       यह तो उसका अपने माता- पिता के मन का भय को दूर करने का तरीका था, अन्यथा वह तो  भाग्य के साथ- साथ कर्म में  भी विश्वास करती थी। अब की बार का प्रयास रंग लाया ,लड़का आई टी क्षेत्र में काम करता था। विवाह सम्पन्न हुआ।

    रश्मि अपने ससुराल में ऐसे मिल गई जैसे फूल में सुगंध। न रश्मि को ससुराल से कोई शिकायत थी,न ससुराल वालों को रश्मि से। एक वर्ष के बाद रश्मि ने चाँद जैसे बेटे को जन्म दिया।

      एक दिन रश्मि की माँ के दिमाग में आया कि सही जन्मपत्री मिलवाकर देखी जाए, तो उनका दिमाग घूम गया, केवल तीन गुण मिलते थे । ज्योतिष के अनुसार किसी भी कीमत पर शादी नहीं होनी चाहिए थी।

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1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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