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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 314 // आईना // मृणाल आशुतोष

प्रविष्टि क्रमांक - 314

मृणाल आशुतोष

'आईना'

पटरी किनारे बैठा मुन्ना जूते पॉलिश कर रहा था और साथ ही कोई फिल्मी गीत भी गुनगुना रहा था!

"अबे, जल्दी से जूते पॉलिश कर ना! ऑफिस के लिए देर हो रहा हूँ।"

"बस दो मिनट, साहेब!"

"बढ़िया से कर ले। हेड ऑफिस से बॉस आने वाले हैं।"

"साहेब! बढ़िया से ही तो कर रहा हूँ।" उसे अपने काम पर अँगुली उठाया जाना अच्छा नहीं लगा।

"साला, मुझसे जबान लड़ाता है!"

"अरे साहेब! गाली काहे को देते हो।"

"गाली नहीं दूँ तो तेरी आरती उतारूँ क्या बे गटर की ..."

"गाली नहीं देने का! क्या! अपन की भी इज्जत है यहाँ!"

"रूक। अभी बताता हूँ। तुमको पता नहीं कि मैं कौन हूँ? अभी यहाँ के बीट कॉन्स्टेबल को फोन लगाता हूँ।"

"लगा लो। फोन लगा लो। वो साहेब अपन को जानता है। आईने की माफिक उनका जूता चमकाता हूँ रोज़!"

मुन्ना अब अपने सामने ही उस आदमी को अंग्रेज़ी में कुछ गिटिर-पिटिर करते हुए देख रहा था। दस मिनट भी न बीते होंगे कि उसकी पीठ पर जोरदार आवाज़ हुई। कराहते हुए वह मुड़ा तो उसी बीट कॉन्स्टेबल के हाथ में डंडा था जिसका बूट वह रोज़ चमकाता था। अब पीठ से कहीं अधिक दर्द उसके दिल में हो रहा था।

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