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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 322 व 323 // छाया सक्सेना ' प्रभु '

प्रविष्टि क्रमांक - 322


छाया सक्सेना ' प्रभु '

  1 *उधारी*

पढ़ाई पूरी करके सोमेश नौकरी की तलाश में भटकने लगा पर हर जगह उसे नाकामी मिल रही थी,वो  इसी उम्मीद पर   जी रहा था कि कोई चमत्कार होगा और  उसे बेगारी से छुटकारा मिलेगा । कहते हैं कि घूरे के दिन भी फिरते हैं  सो इस बार  राज्य में सत्ता परिवर्तन की आँधी चली उसी में  उसे रोजगार तो नहीं मिला किन्तु बेरोजगारी भत्ता मिल गया ,  उसने  सोचा कि चलो  डूबते को तिनके का सहारा ही सही, अब कोई व्यापार करते हैं इसी बीच उसकी शादी  ऐसी लड़की से  तय हो गयी जो खुद भी उसी की तरह बेरोजगारी भत्ता पा रही थी ।

दोनों ने मिलकर एक बड़ा कोचिंग सेंटर खोलने के लिए बैंक से  दस लाख का लोन ले लिया , अब थोड़ी रकम तो  कुरसी टेबल खरीदने में खर्च की बाकी से कार खरीद ली जिसमें बैठ  दोनों  घूमते- फिरते रहते ,इस लापरवाही का असर उनके व्यवसाय पर  पड़ा  और वो ठप्प हो गया ।

अनियोजित कार्य शैली ,  रूपरेखा का अभाव , समझदारी की कमी, जिससे   उन्होंने  कार्य किया  था, इसका असर उनके  रिश्तों पर भी पड़ा ,   क़िस्त कैसे पटे ये प्रश्न अंगद के पाँव की तरह सामने खड़ा हो गया क्योंकि भत्ता तो  गुजर- बसर के लिए ही कम हो रहा था ।

जो ऋण उन्हें कोचिंग सेंटर खोलने को मिला था उनको उसी में सदुपयोग करना था उसके महत्व को न समझते हुये और यह ध्यान नहीं देते हुये की ऋण राशि बैंक की अमानत है  इसके विपरीत उन्होंने कार खरीदकर भोग विलास की वस्तु में अपव्यय किया जिसका परिणाम उन्हें भुगतना पड़ा ।

   मरते क्या न करते, उधारी माफ हो ये चाहत लिए  अब वे दोनों  केंद्र में सत्ता परिवर्तन की आस संग  जोर- शोर से  चुनाव प्रचार के कार्य में जुड़े हुये हैं ।


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प्रविष्टि क्रमांक - 323

छाया सक्सेना ' प्रभु '

2 *मेला*

जानवरों की खरीद -फ़रोख़्त के लिए पुष्कर मेला बहुत प्रसिद्ध है । बाबूलाल को एक अच्छी, दुधारू किस्म की गाय खरीदनी थी जिसके लिए वो अपने दोस्त सुखीलाल के साथ पुष्कर आया था ।

दोनों ने दिनभर आस पास के दर्शनीय स्थल देखे व शाम के समय मेले में पहुँचे ।   गाय की ख़रीददारी के लिए एक दलाल के माध्यम से मोल भाव करने लगे तभी उनकी नज़र वहाँ बैठी उस हरियाणवी लड़की पर पड़ी जो  मजे से गन्ना चूस रही थी , ये दोनों गाय को छोड़ उसे देखने  लग गए , गाय का मालिक उनसे कुछ बोल रहा था वे दूसरी ही दुनिया में मग्न थे ।

तभी उस लड़की  ने ठेठ बोली में पूछा तुम दोनों गाय लेने वास्ते ठाड़े हो या मन्ने देखन वास्ते ....?

तो  सुखीलाल ने झट से कह दिया बात पट जाए तो दोनों ले लेंगे क्यों बाबू लाल ठीक बोल्या ।

बाबू लाल ने भी कुटिल मुस्कान से कहा शाम हो रही है जल्दी सौदा पटा लो, रात की गाड़ी से जाना है हम लोगों को ।

गाय का मालिक कुछ बोलता उससे पहले लड़की ने  गन्ने को लट्ठ बना,  दोनों मनचलों को,  दो - दो लठ्ठ जड़ दिए  और बोली अब दिमाग में जोर देकर बोल्यो कि केखे   वास्ते खड़े हो ....? उसने कहा आज भी  छोरी के  वास्ते लोगों का नजरिया नहीं बदला है , उसे अपनी जागीर  समझ  गंदी निगाह से देखत हैं और कोई  न बोलत ,सब  चुप्पय रहत .... बस तमाशा देखत हैं । मन्ने खुद अपनी सुरक्षा में हथियार उठाने  पड़ो ।

  उन लोगों ने चारों ओर देखा तो सबकी निगाहें उनकी ओर ही थीं वे दोनों घबरा कर इधर उधर देखते हुए सिर नीचा करके बोले माफ करना बहन गलती हो गयी ।

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छाया सक्सेना ' प्रभु '
जबलपुर (म.प्र)

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय CHHAYA JI, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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