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प्राची - जनवरी 2019 : साक्षात्कार “साहित्य की प्रत्येक विधा में मनुष्य के हृदय परिवर्तन की शक्त्ति विद्यमान है”

साक्षात्कार

“साहित्य की प्रत्येक विधा में मनुष्य के हृदय परिवर्तन की शक्त्ति विद्यमान है”

(श्रीगोपाल सिंह सिसोदिया ‘निसार’ से डॉ.भावना शुक्ल की बातचीत)

“मन की आंखों से देखने वाले, विभिन्न विधाओं में अपनी कलम चलाने वाले, श्रेष्ठ कहानीकार, संघर्षपूर्ण जीवन जीने वाले, अपनी कहानियों में जीवंतता के दर्शन कराने वाले, ‘इंडियन एसोसिएशन ऑफ द ब्लाइंड’ संस्था के माध्यम से दृष्टिबाधित व्यक्तियों के शैक्षणिक और सामाजिक उत्थान का प्रयास करने वाले, अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के माध्यम से साहित्य की सेवा करने वाले अनेक सम्मान से सम्मानित, अनेक कृतित्व.. कविता, कहानी, उपन्यास रचने वाले, प्रणेता संस्था में प्राण अर्पण करने वाले, नवोदित साहित्यकार को मंच देने वाले, दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में अनुभाग अधिकारी तथा डी.डी.ओ.शिप का कार्यभार संभालने वाले साहित्यकार सिसोदिया जी जीवट व्यक्तित्व के धनी हैं. कभी भी यह महसूस नहीं होता कि वे दृष्टिबाधित हैं. हर रूप में हर समय अपनी सेवाएं देने को तत्पर रहते हैं. ऐसे जीवट व्यक्तित्व और उनके साहित्य से डॉ. भावना शुक्ल की बातचीत के अंश...

डॉ. भावना शुक्ल : आपकी दृष्टि में साहित्य क्या है? आपने साहित्य की प्रायः हर विधा को जिया है कौन सी विधा आपको अधिक प्रभावशाली लगती है और क्यों?

श्रीगोपाल सिंह सिसोदिया : साहित्य की प्रत्येक विधा में मनुष्य के हृदय परिवर्तन की शक्ति विद्यमान है और यही विशेषता मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती है। जो कार्य शक्तिशाली सम्राटों की तलवारें नहीं कर पातीं, उसे लेखक की कलम से निकली दो पंक्त्तियाँ कर दिखाने में सक्षम होती हैं। जहाँ तक मेरी पसंदीदा विधा का प्रश्न है तो मेरा मन कथा साहित्य में अधिक रमता है। यहाँ मैं आपको यह भी बता दूँ कि मैंने सबसे पहले कविता लिखना ही प्रारम्भ किया था।

डॉ. भावना शुक्ल : “उसकी कहानी” आपका लघु उपन्यास है. इसमें किसकी कहानी बताई है और यह किस पर प्रभाव डालती है. हमारे पाठकों को बताइये कि यह उपन्यास इतना सशक्त्त कैसे बना?

श्रीगोपाल सिंह सिसोदिया : “उसकी कहानी” उपन्यास एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो बचपन में अपने परिवार से बिछुड़ जाती है और ऐसे व्यक्त्ति के हाथ पड़ जाती है जो छोड़े-छोटे बच्चों को अगवा करके भिखारियों के गिरोह के मुखिया को बेच देता है। न जाने कितने बच्चे अपाहिज बना दिये जाते हैं और गुलामों का जीवन गुजारने पर विवश हैं। मैंने कुछ लोगों से बातचीत की थी, जब मैंने उनके जीवन के विषय में जाना तो मैं सोचने लगा कि मैं ऐसे लोगों के लिए क्या करूँ, जिससे इनका कुछ कल्याण हो सके। यही कारण है कि मेरी कलम से यह कहानी स्वतः ही निकल आई।

डॉ. भावना शुक्ल : आपकी ‘दृष्टांत’ कहानी बहुत ही जीवंत कहानी है. इस कहानी में दृष्टिबाधित लड़की कैसे संघर्ष का सामना करती है और उसका संघर्ष कैसे रंग लाता है, कृपया पाठकों को बताइये?

श्रीगोपाल सिंह सिसोदिया : भावना जी, आप तो जानती ही हैं कि मैं दृष्टिबाधित व्यक्तियों के उत्थान के लिए "इंडियन एसोसिएशन ऑफ दि ब्लाइंड" नामक एन.जी.ओ. चलाता हूँ। यही कारण है कि मुझसे तरह-तरह के लोगों की भेंट होती रहती है। इसी का परिणाम है कि मुझे ऐसे चरित्र आसानी से मिल जाते हैं और समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से ऐसी कथाएं कागज पर स्वयं ही उतर आती हैं। मैंने विकलांग विमर्श पर और भी कहानियाँ लिखी हैं। जैसे “संघर्ष” कहानी संग्रह में "नयी राह" वापसी कहानी संग्रह में बंधन, दीदी, स्वाभिमान दृष्टिकोण आदि।

डॉ. भावना शुक्ल : आपकी कहानियों में जीवन्तता के दर्शन होते हैं ये आपके करीब की कहानी है क्या?

श्री गोपाल सिंह सिसोदिया : लेखक भी तो इसी समाज का हिस्सा है भावना जी, वह जैसा महसूस करता है, वैसा ही लिखता है। मैं भी अपने इर्द-गिर्द घटने वाली घटनाओं और समस्याओं से ही अपनी कहानियों तथा उपन्यासों के प्लाट्स तथा चरित्र उठाता हूँ। आपको आश्चर्य होगा कि मेरी कहानी पढ़ने के पश्चात् कई पाठकों ने मुझे फोन करके बताया कि यह उसकी अपनी कहानी है। उस समय मेरा मस्तक माँ शारदे के चरणों में स्वयमेव झुक जाता है।

डॉ. भावना शुक्ल : प्रेमांजलि उपन्यास में प्रेम की पवित्रता की झलक दिखाई देती है?

श्री गोपाल सिंह सिसोदिया : “प्रेमांजलि” उपन्यास मेरा पहला उपन्यास है। मैं मथुरा का रहने वाला हूँ। मैंने वहीं की एक छोटी-सी घटना को लेकर कहानी लिखनी प्रारम्भ की थी। परन्तु ज्यों-ज्यों कहानी आगे बढ़ती गयी, उसमें नये पात्र और घटनाएं जुड़ती चली गयीं। इस प्रकार प्रेमांजलि उपन्यास तैयार हो गया। अति महत्वाकांक्षा, आधुनिक तकनीकी के युग में ब्लैकमेल करने के नये-नये उपकरण, पुलिस और मीडिया का अपने दायित्व को निष्ठा के साथ निर्वाह न करना तथा बहुरूपिये बाबाओं से सावधान रहने जैसे अनेक संदेश हैं इस उपन्यास के।

डॉ. भावना शुक्ल : कौन सी विसंगतियों का जिक्र आपने प्रेमांजलि में किया है ?

श्री गोपाल सिंह सिसोदिया : जी हां, वास्तव में समाज में विसंगतियां दिखाई गई हैं तो उनसे पार करने के उपाय भी इस कथा में निहित हैं. दृढ़ संकल्प शील व्यक्तित्व और समझदारी से उठाए गए कदम विसंगतियों को सुलझाने की राह दिखाते हैं. जीवन की कठिन परिस्थितियों में सबसे बड़ा मार्गदर्शक स्व-विवेक ही होता है. बालकृष्ण, शिखा उर्फ राधा, जैसे चित्रों में यह क्षमता भरपूर दिखाई गई है.

डॉ. भावना शुक्ल : क्या प्रेमांजलि उपन्यास संदेशात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करता है ?

श्री गोपाल सिंह सिसोदिया : प्रेमांजलि उपन्यास की रचना आस्तिकता की ठोस जमीन पर दृढ़ कदम बढ़ाते हुए की गयी है. बड़ी ही बारीकी के साथ हमने कृष्ण निवास भवन का वर्णन किया है. उस विशाल, विस्तृत भवन में जीवन की अंतिम सांसें लेते हुए बालकृष्ण के अतीत की स्मृतियों के माध्यम से कथासूत्र को संगठित किया गया है. इस प्रक्रिया में अनेक प्रश्नों के माध्यम से लेखक ने सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्त किया है. इसमें एक ओर सुरक्षा प्रदान करने वाली, परिवार-व्यवस्था एवं परिवार के केंद्र के रूप में, स्त्री का विशेष दर्जा चित्रित है. दूसरी ओर आधुनिकता की अंधी दौड़ में भटकते हुए समाज, मानव तस्करी व देह-व्यापार, धर्म की आड़ में ढोंगी साधुओं का दौरा चरण और स्त्री के शोषण जैसे मलिन पक्षों को जागृत किया गया है. पुलिस व्यवस्था का चिंताजनक रूप, समाज को राह दिखाने के बजाय मीडिया और चैनलों के दुरुपयोग जैसे पक्षों का चित्रण भी मिलता है. समाचार और सूचना सही ढंग से दी जाए तो समाज के लिए उपयोगी साधन भी होती है. लेखक की चेतना विभिन्न व्यवस्थाओं के श्वेत- श्याम पक्षों को पाठक के समक्ष प्रस्तुत करने में सक्रिय रही है. यह वास्तव में एक संदेश दे जाती है.

डॉ. भावना शुक्ल : आपके पास मन की आँखें हैं जिनमें बहुत कुछ समाया हुआ है. आपके पास वो आंखें है जो किसी के पास नहीं हैं, इस विषय में आप दृष्टिपात करिये?

श्री गोपाल सिंह सिसोदिया : नहीं-नहीं भावना जी, ऐसा बिल्कुल नहीं है। मेरे अंदर भी सामान्य व्यक्ति की तरह ही भावनाएं तथा दुर्बलताएं विद्यमान हैं, कोई विलक्षणता नहीं है।

डॉ. भावना शुक्ल : आपने फ्चुभनय् कहानी में किस चुभन का जिक्र किया है? आप काफी अरसे से प्राची पत्रिका से जुड़े है. आपको पत्रिका किस प्रकार प्रभावित करती है?

श्री गोपाल सिंह सिसोदिया : “चुभन” कहानी संग्रह में मैंने उन तमाम कहानियों को शामिल किया है, जो मुझ जैसे साधारण व्यक्ति से सम्बन्ध रखती हैं। कहीं-न-कहीं हम उन समस्याओं से प्रभावित हुए अथवा होते रहते हैं। इसी चुभन को मैंने आपके समक्ष उत्तर पुस्तक में समाहित करके प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

डॉ. भावना शुक्ल : आप काफी अरसे से प्राची पत्रिका से जुड़े है. आपको पत्रिका किस प्रकार प्रभावित करती है ?

श्री गोपाल सिंह सिसोदिया : “प्राची” पत्रिका मुझे सबसे अधिक प्रिय पत्रिका है। यूँ तो मेरे पास सादस पत्रिकाएं नियमित रूप से आती हैं, परन्तु प्राची की प्रतीक्षा उसी दिन से प्रारम्भ हो जाती है, जिस दिन यह समाप्त होती है। इस में लिखने वाले लेखकों की सामग्री पठनीय एवं संग्रहणीय होती है। इसके अतिरिक्त सम्पादकीय, धरोहर के तहत पुरानी कथाएं, बड़े-बड़े लेखकों से लिये गये साक्षात्कार इस पत्रिका के विशेष आकर्षण हैं। इन्हें मैं पत्रिका प्राप्त होते ही सबसे पहले पढ़ता हूँ.

डॉ.भावना शुक्ल : आपकी लेखनी अविराम चलती रहे यही शुभकामना है...चलते चलते...कोई गजल ,कविता सुनाइये...

पीड़ा

मैंने देखा है अक्सर

गाँवों पर शहरों का अतिक्रमण,

गाँव की बेबसी और ये लाचारी

मुझसे अब और देखी नहीं जाती।

गाँव पर शहर डोरे डालता है

फँसाता है उसे कुचक्रों में,

एहसास उसे तब होता है

जब धंस जाता है वह

कमर तक दलदल में।

इशारों पर नाचता है शहर के

गाँव किसी कठपुतली की तरह,

निगल जाता है फसलों से भरी जमीन,

उग आते हैं मकान जंगली घास की तरह।

लगा है नया मुबाइली नशा

मेरे भोले गाँवों को,

स्मार्ट फोन तो है मगर,

पर जूती नहीं हैं पाँवों को।

अब साँझी चौपालें समाप्त हुईं

अब भीड़ जुटी है पान की दुकानों पर,

जहाँ गाँजा, अफीम, पोर्न फिल्म सब मिलता है

बजरी बिछने लगी है खलिहानों पर।

शहर की मक्कारी और गाँव की लाचारी

देख-देख दिल भर आता है,

कब तक होता रहेगा गांवों का दोहन

अक्सर ये प्रश्न मुँह चिढ़ाता है।

हृदय के ये छाले

अब किस को दिखलाऊँ मैं,

असहनीय है ये पीड़ा

किसी को बतलाऊँ मैं।


संपर्क : wz 21 हरी सिंह पार्क , मुल्तान नगर

नई दिल्ली- 110056

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