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प्राची - जनवरी 2019- आलेख - हिंदी साहित्य : कोलाहल में रुका काल चक्र - डॉ. सम्राट् सुधा

आलेख

हिंदी साहित्य : कोलाहल में रुका काल चक्र

डॉ. सम्राट् सुधा

हिंदी साहित्य इक्कीसवीं सदी के इस बीसवें चरण में जहाँ एक और अपने काल विशेष के नाम को ले ठिठकाव की स्थिति में है, वहीं गत सदी के अंतिम चरण में चर्चित हुए विभिन्न ‘वादों’ से आज तक बोझिल भी है!

देश के स्नातकोत्तर हिंदी पाठ्यक्रमों में हिंदी साहित्य का इतिहास सेमेस्टर पाठ्यक्रमों की बलि चढ़ चुका हैµ (जब तक प्राध्यापक साहित्यिक इतिहास और यहाँ तक कि किसी कृति के विस्तार में पहुंचे, परीक्षा द्वार खटखटा देती है, बाद में कृति भिन्न और विद्यार्थी की मति भी...

हिंदी साहित्य के सर्वमान्य इतिहास के रूप में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल संयोजित वह इतिहास आज भी पढ़ा-पढ़ाया जा रहा है, जिसके अपूर्ण होने की बात स्वयं शुक्ल जी ने लिखी थी! प्रश्न गत सदी के उन विभिन्न वादों का है, जो आज भी यत्किंचित ‘भड़क’ तो जाते हैं, परंतु हिंदी साहित्य के इतिहास पृष्ठों पर आज भी एक काल विशेष का शीर्षक ले अंकित नहीं हो पाये हैं.

पिछली सदी के अंत से इस सदी के भी दो दशकों तक पर्याप्त रूप से चर्चित ‘दलित साहित्य’ अन्ततः साहित्यिक इतिहास के पृष्ठों में एक पृथक् काल के अंतर्गत स्वयं को स्थापित न कर सका. स्वाभाविक रूप से स्वयं को दलित साहित्यकार कहने वालों ने इसके लिए प्रत्यक्ष- परोक्ष रूप से हिंदी साहित्य में सवर्ण सोच को आरोपित किया, परंतु वस्तुस्थिति यह नहीं थी, सभी जानते हैं. दलित लेखन के समानांतर ही ‘स्त्री लेखन’ के स्वर भी उठे और यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि ‘वास्तविक’ दलित और स्त्री लेखन वह है, जो क्रमशः दलित या स्त्री द्वारा ही लिखा गया हो. काल के पृष्ठों पर इन दोनों ही प्रकार के लेखन से जुड़े लोग यह विस्मरित ही कर गये कि हिंदी साहित्य में काल विशेष में नाम मूलतः उन कालों के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों से जुड़ उनकी बहुल साहित्यिक प्रवृत्तियों के आधार पर थे, जानबूझकर उठायी गयी चर्चाओं के कारण नहीं! दलित और स्त्री लेखन को जातीय और लैंगिक आधार पर क्रमशः दलित लेखन और स्त्री लेखन कहने वालों के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था कि स्वयं अपने लेखन में वे जिन गैर दलित पात्रों और पुरुष पात्रों का वर्णन करते हैं, उन्हें भला कैसे ‘वास्तविक’ या वास्तविकता के निकट भी माना जा सकता है. उल्लेखनीय है कि उक्त दोनों प्रकार के साहित्यकारों का क्रमशः यह कहना था कि ‘वास्तविक’ दलित साहित्य केवल वही है, जो किसी दलित साहित्यकार द्वारा रचा जाए_ इसी प्रकार ‘वास्तविक’ स्त्री लेखन वही है, जिसे स्त्री साहित्यकार ने ही रचा हो! इस सोच के कारण कालान्तर में सवर्ण स्त्री लेखन और दलित स्त्री लेखन जैसे स्वर भी उठे.

हिंदी साहित्य का इतिहास क्योंकि इस प्रकार की विचारधारा से पृथक् एक काल विशेष की प्रवृत्तियों से संबद्ध इतिहास रहा, सो जातीय और लैंगिक आधार पर साहित्य इतिहास में एक पृथक् काल के रूप में ऐसे वादों का न जुड़ना अत्यंत स्वाभाविक ही था_ फलतः ये दोनों, दलित और स्त्री लेखन दो विमर्श-वादों से आगे नहीं बढ़ सकें.

उपरोक्त वाद-मंथन के परिणाम स्वरूप हिंदी साहित्य में नये काल निर्धारण की सोच धूमिल होती गयी. पिछली सदी के अंतिम दशक में पर्याप्त चर्चित हुई ‘उत्तर आधुनिकता’ को लेकर एक आस थी कि संभवतः हम हिंदी में एक नये युग का नामकरण कर पायें, परंतु मंथन इतना हुआ कि मक्खन ही बिखर गया के साथ-साथ बाज़ारवाद के प्रभाव में आ पृथक् ही मार्ग पर जा निकले. हिंदी में उत्तर आधुनिकता और भूमंडलीकरण को लेकर कोलाहल हुआ_ पुस्तकें आयीं, परंतु ये दोनों अवधारणाएं एक काल विशेष के नामकरण का हेतु ना बन सकीं. हिंदी की प्रत्येक साहित्यिक विधा उक्त अवधारणाओं से कितनी चोटिल हुईं, इसकी और भी किसी का ध्यान नहीं गया! सन् 2001 में नयी कहानी के पुरोधा श्री कमलेश्वर को कहना पड़ाµ ‘बाज़ारवाद ने लंबी कहानियों को नुकसान पहुंचाया है. गौर से देखें तो पूरी कहानी का खाका ही परिवर्तित हो रहा है। आज की कहानियों से माँ पूरी तरह गायब है। बहन, भाभी या चाची-ताई के लिए भी कोई स्थान नहीं बचा है। अब सुन्दर प्रेमिकाएं हैं या फिर खूबसूरत पत्नी। बाज़ारवाद की यही माँग है। सच यह है कि हमारी सौंदर्य दृष्टि को बदला जा रहा है।’

इसी क्रम में यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि विगत सदी के अंत तक स्थिति इतनी विकृत हो चुकी थी कि उस समय उत्तरकथाओं के नाम पर नग्न महिलाओं के रेखाचित्र छापकर और मॉडल्स के चित्र मुखपृष्ठों पर छाप साहित्यिक पत्रिकाओं के अंक निकाले गये, जिनसे विशुद्ध साहित्य की मर्यादा आहत हुई!

उपरोक्त परिस्थितियों में जो अवधारणाएं नवकाल के रूप में हिंदी साहित्य के इतिहास में सम्मिलित हो सकती थीं, वे बस विवादित होकर रह गयीं.

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में ‘आधुनिक काल’ की अवधि संवत् 1900 से 1980 बतायी थी. संवत् 2009 में डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी कृत हिंदी साहित्य का इतिहास पुस्तक रूप में ‘हिंदी साहित्य’ नाम से प्रकाशित हुआ. इसमें आधुनिक काल के अंतर्गत सन् 1936 से 1952 तक प्रगतिवाद का वर्णन करते हुए आधुनिक काल का सीमांत कर दिया गया. कालान्तर में प्रकाशित होने वाले अधिकांश हिंदी साहित्य के इतिहास की पुस्तकों में आधुनिक काल को संवत् 1900 से ‘अब तक’ बताया गया और वह ‘अब तक’ आज तक भी अब तक ही है!

हिंदी शोध की स्थिति पर टिप्पणी करना व्यर्थ है. शोध हैं परंतु नये तथ्य नहीं हैं और यदि नये तथ्य हैं भी तो उन्हें स्वीकार करने की सहज मानसिकता ही क्षीण है! दलित लेखन, स्त्री लेखन, उत्तर आधुनिकता और भूमंडलीकरण के तथ्य यह प्रमाणित करते हैं कि उद्वेग की अपेक्षा संवेदना के संतुलन से ही किसी भी साहित्य में कालजयी स्थिति प्राप्त की जा सकती है_ नव अवधारणाओं को अपनी भाषा या साहित्य में पड़ताल से कई बार वे अपने ही पर-आयातित माल का स्व-आयात सिद्ध हो सकती हैं. काल के माथे पर नव तिलक के लिए नव अक्षत-रोली अपरिहार्य है! ऐसा नहीं हुआ, सो आज हिंदी साहित्य में आदिकाल, मध्यकाल के बाद आधुनिककाल की विराट छाया में ही हम अध्ययन-अध्यापन करते आ रहे हैं. यह हमारी पुरातन के प्रति आस्था है या हमारी जड़ता, कहने की आवश्यकता नहीं है!!

संपर्क : 94- पूर्वावली, गणेशपुर,

रुड़की- 247767, उत्तराखंड

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