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प्राची - जनवरी 2019 - कहानी - किसना बिना गाय - सुबोध सिंह शिवगीत

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कहानी किसना बिना गाय सुबोध सिंह शिवगीत जन्म : 19 जनवरी 1966 संप्रति : प्राध्यापक-हिंदी, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग (झारखण्ड) आकाशवा...

कहानी

किसना बिना गाय

सुबोध सिंह शिवगीत


जन्म : 19 जनवरी 1966

संप्रति : प्राध्यापक-हिंदी, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग (झारखण्ड)

आकाशवाणी एवं दूरदर्शन केन्द्र से रचनाओं का नियमित प्रसारण एवं देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, आलेख, व्यंग्य एवं समीक्षाओं का प्रकाशन।

सम्पादन : दस्तक (काव्य-संग्रह) एवं हजारीबाग टाइम्स (साप्ताहिक)

प्रकाशित पुस्तकें : पूरब की ओर, प्रपंचतंत्रम् (काव्य संग्रह)

हिन्दी कृष्ण काव्य (समीक्षा)


ई-मेल : shivgeet65@gmail.com

‘माँझी! पचास रुपया कागज का, पचीस रुपया पेपर का, टिकट का पचास और स्टाम्प का पचास और पेशी का पचीस रुपया यानी कि दो सौ रुपया अभी दे दो. तारीख पर हाजरी लगा देते हैं, फिर वकील साहब और हमको जो देना हो सो देते रहना.’ जाने वक्त कहा था मुंशी ने किसना मांझी के बाप महावीर मांझी से।

इधर-उधर बाँये-दाहिने देखते हुए थोड़ा तिरछा होकर अपनी धोती की खूँट से निकाल कर दो-तीन बार गिन कर दो पचास का और एक सौ का मुड़ा-तुड़ा नोट मुंशी बुधान की ओर बढ़ाया था महावीर मांझी ने, इस हिदायत के साथ- ‘देखिएगा मुंशी साहेब आज सभे कागज पत्तर देख ताक के साहेब पास लगाइएगा जिससे कोई फजीहत फिर नहीं खड़ा हो जाए, किसना के जेहल (जेल) गये ढेर दिन हो गया है। जल्दी नहीं छूटेगा तो समझिए हमरा घर अबकी साल का भी खेती बरबादे हो जायेगा। बेटा जेहल में... हम रोज-रोज कचहरी में... त के करेगा खेती-बारी... कैसे जिएँगे... का खायेंगे... हम लोग, वकील साहेब अर बड़का साहेबा के ई सब बात जरूजे (जरूर) से बताइएगा।’

इसी बीच वकील साहब की तीखी आवाज गूँजी थी- ‘का बुधान, एक हाजरी में इतना समय लगायेगा तो औरों का क्या होगा।’

‘जी सर!’ कहता हुआ बुधान मुंशी वकील साहब के टेबल के पास पहुँचा. वकील साहब से कुछ आवश्यक बातचीत कर हाजरी लगाने मजिस्ट्रेट साहब के कोर्ट की ओर प्रस्थान कर गया। महावीर मांझी, मुंशी के पीछे-पीछे कुछ दूर तक चला पर इसी बीच मुंशी भीड़ में किस राह गया उसे समझ में नहीं आया। वह पुनः लौटकर वकील साहब के टेबल के पास आ गया। उसे पता है दो तीन घंटा से पहले अब उसको कुछ भी पता नहीं चलेगा कि आगे क्या करना है। साहब ने का हुकुम दिया। दिनभर केवल इधर-उधर घूम-टहल कर, कभी इसका तो कभी उसका बात सुन-सुन के समय काटना है।

महावीर मांझी का जवान बेटा किसना मांझी जंगल से चार अरकट्ठा (करीब एक डेढ़ डायमीटर मोटाई वाली लकड़ी का पोल) काटने के जुर्म में विगत तीन माह से हजारीबाग सेंट्रल जेल में बन्द है। महावीर तीन महीने से बगल गाँव के लाला बाबू वकील साहब के घर और कचहरी आकर परेशान है। बेटे का बेल नहीं हो रहा है। हर बार कोई न कोई नया लफड़ा लगाकर सरकारी वकील काम बिगाड़ देता है। पहली तारीख पर तो कुछ हुआ ही नहीं खाली पैसा खर्च हुआ। दूसरी-तीसरी तारीख पर एक ही बहाना... ‘जंगल विभाग को जो-जो कागज भेजना था, अभी कचहरी तक पहुँचा ही नहीं है। उसके बिना बेल संभव नहीं है। देखते हैं... अबकी मुंशी को वहाँ भेज कर, पैरवी करके कागज मँगवाते हैं, तब काम हो जाएगा. अब अगला डेट पर ही आशा रखो, और हाँ! खर्चा मुंशीजी को देते जाना’ दोनों ही बार कहा था वकील साहब ने।

‘अबकी बार’... ‘अबकी बार’... कहना जितना आसान है, वकील साहब के लिए उतना ही भारी है सुनना महावीर माँझी के लिए। उनको क्या पता, महावीर बेटा के जेल में होने और एक-एक तारीख पर कचहरी आने-जाने के बीच क्या-क्या झेलता है...

उसे अच्छी तरह याद है बेटे को उसी ने जंगल से चुनकर अच्छा अरकटठा लाने भेजा था। इस हिदायत के साथ कि- ‘बेटा इन दिनों जंगल में सिपाही भी उतरा हुआ है और अरकट्ठा भी लाना जरूरी है, बरसात से पहले घर की मरम्मती के लिए। सो सब कुछ संभल-संभल के करना, देखना कहीं कोई ऊँच-नीच नहीं हो जाय। अगर सिपाही मिल ही जाय तो दस-बीस रुपया दे देने में देरी मत करना।’ पर वाह रे बेटा दस बचाने के चक्कर में कितना हजार गँवा दिया ऊपर से ई परेशानी।

परेशानी क्या, जब से किसना जेल गया है महावीर माँझी का पूरा घर आफत में है। पहले तो घर इस साल रह गया फिर बेमरम्मत। कृष्णा की माँ और मेहरारू (पत्नी) जब से जेहल गया है उसी दिन से रह-रह कर बीमार। कभी कुछ, तो कभी कुछ। इधार किसना के दो-दो बच्चों को संभालो... उधर खेती-बारी.... गाय डांगर देखो... बीच-बीच में पैसा का जुगाड़ कर, कभी कचहरी... तो कभी फॉरेस्ट ऑफिस... क्या... क्या... करे महावीर अकेला...

सबसे कठिन हो रहा है पैसे का जुगाड़। जिस दिन से किसना जेल गया है, हाथ से और घर से लगता है बरकत ही चली गयी है। पहले तो फँसाया फॉरेस्ट का सिपाही- ‘पाँच सौ रुपया भी ले लिया ई कहके कि केस कमजोर कर दिए हैं, इसमें गिरफ्रतारी नहीं होगी। साहेब लोग पूछताछ करके छोड़ देंगे। रह गये गफलत में और धन-धरम दूनों चला गया। बाप रे केतना बड़ा ठग था सिपहिया... जब-जब उसके घर गए पूजे-पाठ करते मिलता था। दू तल्ला घर, छते पर तुलसी पिंड़ा... घंटी बजा-बजा के पूजा करते रहता था और ऊपर ही से ताकते रहता था कि नीचे घर के बाहर कौन-कौन आसामी टहल्ला मार रहा है। फॉरेस्ट ऑफिस जाने से पहले छत के नीचे खड़े आसामियों से जिसने जो दिया वसूली कर रुपया घर के भीतर रखके ऑफिस जाता थाµ ‘बाप रे बाप! देख के तो लगता था जब जंगल के सिपाही का एतना कमाई है तब साहेब-लोग का हाल का होगा? ऊ लोग तो लगता है तकिया में भर के रुपया रखता होगा।’

उसे याद आती है उस दिन की बात जिस दिन सिपाही के कहने पर वह आरजू-मिन्नत के लिए रेंजर साहेब के घर गया था। आलीशान मकान, दुवारे पर तीन-तीन ठो गाड़ी, भौं...भौं...भौं... की आवाज से गरजता विदेशी कुत्ता, घर की जमीन (फर्श) तो मानो शीशा था। मुँह दिख जाने वाला। का किस्मत पाया है ई जंगल विभाग का साहब लोग। दो-तीन घंटा दरवाजे पर खड़ा रहा था उस दिन वह साहब का दर्शन नहीं ही हो पाया था. शायद बीमार थे। अरे बीमार का थे उन्हीं के घर काम करने वाला आदमी कह रहा था- ‘जिस दिन साहेब लोग का रात में मुर्गा पार्टी चलता है, उसके दूसरे दिन साहेब बीमारे रहते हैं। उठते हैं, फिर पीते हैं। फिर सुत्ते हैं। कभी-कभी तो साहब सनक गये तो ई सिल-सिला दो-दो, तीन-तीन रोज तक चलते रहता है। अकेले मलकिनिया बेचारी केतना डाँटे समझावे। बेटा-बेटी सब बाहरे में पढ़ता है। माय-बाप सब बिहारे में है। ई सब को डाँटे कौन, समझावे कौन। ऑफिस समझता है जंगल गये हैं, जंगल समझता है साहेब ऑफिस में होंगे।’

यही रेंजर साहेब के मारल मथुरा आज तीन साल से जेहले में है...

इसी बीच एक बादाम बेचने वाले से पाँच रुपये का चिनिया बादाम खरीद कर महावीर इमली गाछ के निकट बैठकर बादाम फोड़ने लगता है... बादाम क्या खायेगा बेचारा कचहरी में अक्सरहा लोग चना-चिनिया बादाम, भूँजा आदि समय काटने के लिए खाते हैं। पर अभी महावीर जो चिनिया बादाम खा रहा है वह टेंशन भगाने के लिए खा रहा है। मथुरा की बात याद आने से वह थोड़ा परेशान हो गया है...

बेचारा मथुरा इसी अरकट्ठा और जलावन की लकड़ी के चक्कर में नक्सलाइट बन गया। बना क्या? यही जेहल, कचहरी, पैरवी और पैसा का चक्कर काटते-काटते जबरदस्ती लोग उसको ऐसा बना दिया।

मथुरा तो सीधा-सादा मैट्रिक में पढ़ाई करने वाला लड़का था। बाप के मरते घर की नई-नई गृहस्थी सर पर पड़ी थी। बेचारा घबराया-परेशान दैनिक जीवन की गाड़ी खींचने के लिए जलावन की लकड़ी लाने माय के साथ जंगल गया था। बाप-दादा-परदादा इसी जंगल में रहा, जंगल काट के खेत-कियारी बनाया, अनाज, सब्जी उपजाया, जानवर पोसा (पाला) चराया, दूहा और यहीं की लकड़ी से खाना पकाया, खाया। उसको का पता सरकार ने उसके जंगल को अपना जंगल कब बना लिया। उसके अपने जंगल, जिसकी रक्षा पीढ़ी दर पीढ़ी से गांव वाले ही कर रहे थे। उसका मालिक शहरी फॉरेस्ट गॉर्ड, रेंजर और बड़ा-बड़ा साहेब सुब्बा सब हो गया।

यही रेंजर उस समय फॉरेस्ट गार्ड था, जब मथुरा को पकड़ कर गाँव वाला लोग को डराने और दहशत पैदा करने की नीयत से झूठा मुकदमा बनाके जेल भेजवा दिया था। लोगों के लाख समझाने-बुझाने के बाद भी नहीं माना था। कहता था- ‘बच्चा है, बच्चा है, मैट्रिक में पढ़ने वाला देहाती बच्चा होता है, ई तो पकठा (उम्रदराज) गया है, मैट्रिक में पढ़ने से क्या होता है। एक बार जेल जाकर लौटेगा तो यही दस को जेल जाने से रोकेगा। हजार आदमी इसी को देख के जंगल घुसने से भी डरेगा। एक जेल जाएगा, तो सौ जेल जाने से बचेगा।’ (जंगल के अधिकारी चाहते हैं कि जंगल में आमजन नहीं सिर्फ उनके कृपा पात्र प्रवेश करें)

‘बचेगा? बचेगा का खाक? जेले जाके तो मथुरा बिगड़ा। बिगड़ा ऐसा कि अब उसको बनाने वाला कोय नहीं रहा। सीधे गोलिये-बंदूक से बात करता है। बड़का-बड़का थाना-सिपाही भी उसको देख के सहमता है। सहमता का है- थर-थर मूतता है। हमेशा एक पैर जेल में, तो दूसरा बाहर।’

विविध प्रकार की चिंता और चिंतन ने महावीर मांझी को घेर कर इमली पेड़ के पास भी आराम से चिनिया बादाम खाने नहीं दिया। वहाँ से उठकर सीधे वकील साहब के टेबल के पास पहुँचता है। जहाँ वकील साहब पाँच-सात मुवक्किलों से घिरे हिसाब-किताब करने और अगली तारीख तथा आवश्यक हिदायत-सलाह देने में व्यस्त हैं। महावीर मांझी भी चुपचाप पीछे खड़ा होकर अपनी बारी की प्रतीक्षा में है। इसकी बारी आते ही वकील साहब ने कहाµ

‘हाँ तो महावीर मांझी मिठाय खिलाव, निकालो पाँच सौ रुपया, बेटा का बेल करवा दिये, कल यहाँ से कागज-पत्तर लेकर जाव और बेटा को जेल से निकाल लो, समझो बहुत बड़ा काम तुम्हारा कर दिये आज।’

इतना सुनना था कि महावीर मांझी की आँखें खुशी से डब-डबा गईं। करीब-करीब रोते हुए ही वकील साहब का चरण छूने के लिए झुक गया।

वकील साहब अभिवादन स्वीकारते हुए ही हिदायती लहजे में बोल उठे- ‘अँ... हँ... हँ... ऐसा करने से नहीं होता है। पहले सुनो तो... कल सुबह चार हजार रुपया लाके मुंशी जी के पास जमा करना होगा। तब सारा कागज-पत्तर और सरकारी वकील से आवश्यक कागजात निकाल कर बारह-एक बजे दिन तक जेल पर बेल का कागज पहुँचाना होगा। वहाँ भी सौ-दो सौ का खर्चा लगेगा। तब कल शाम तक किसना बाहर निकल जाएगा।’

इतना सुनते ही महावीर मांझी के सुख के आँसू विपत्ति के आँसू में तब्दील हो गए। बाप रे! अब इतना भारी खर्च वह रात भर में कहाँ से लाएगा। उसने हठात् कहा-

‘हुजूर आप तो सात हजार में पूरा केश का ठेका लिए थे। सो तो हम कब का दे दिए। ऊपर से हर डेट पर भी दो-चार सौ देते ही गए। अब ई नया चार हजार हम कहाँ से लाने सकेंगे... सो भी राते भर में। बाप... रे... बाप... ई कचहरी है कि का...’

बीच में महावीर मांझी का हाथ जबरदस्ती अपने हाथ से मिलाते हुए बुधान मुंशी जल्दी से मिठाई खिलाने की जिद करने लगा। पर महावीर का तो मानो होश ही गुम हो गया हो... ‘बाप रे! ई चार हजार फिर केने (कहाँ) से लानें (लायें) रे बाप... अब तो कोनो देने वाला भी नहीं है। अर फिर रतिया में किसके-किसके घर भीख माँगले चलेंगे। हियाँ (यहाँ) से घर पहुँचते-पहुँचते तो रात हो जायेगा... हे भगवान... ओह...’

इतना बोलते-बोलते महावीर मांझी सर पर हाथ रखकर वहीं वकील साहब के निकट ही जमीन पर बैठ गया। मानो उसके चारों ओर अंधेरा छा गया हो।

खैर थोड़ी देर के बाद वकील साहब और मुंशी जी के समझाने के बाद उसकी खामोशी टूटती है।

‘अच्छा वकील साहेब ई काम कल के बजाय एकाध दिन आगे-पीछे भी हो सकता है ने। अब एतना पैसा घर में तो रखल नहीं ने है। जोगाड़ करके देखते हैं का होने पाता है।’

कह कर बुधान घर जाने के लिए मुड़ता है कि मुंशी उसके पीछे-पीछे वकालत खाना के बाहर तक आता है और मिठाई के नाम पर सौ रुपया झिटक कर ही वापस लौटता है। इस सलाह के साथ किµ ‘मांझी एक की बजाय दो दिन बाद भी आना, काम हो जाएगा। पर बकसीस का पाँच सौ लाना मत भूलना, हाँ, सो कह देते हैं।’

महावीर मांझी कभी धीरे-धीरे तो कभी तेज पाँव से सीधा ट्रैकर स्टैण्ड पहुँचता है। गाँव के निकट तक जाने वाली गाड़ी पर बैठकर वह इस सोच में डूब जाता है कि इतने रुपये आएँगे कहाँ से।

घर पहुँचते ही पत्नी और बहू से कृष्णा के बेल से लेकर पाँच हजार नगद जुगाड़ करने की समस्या का बखान पल भर में कर डालता है। कृष्णा के छोटे-छोटे बच्चे- ‘कल बप्पा आ जाएगा... कल बप्पा आ जाएगा’ का शोर मचाने में व्यस्त हो जाते हैं, और बड़े तरह-तरह की तरकीब सोचने में। परिवार एक अजीब किस्म के उहापोह भरे जंजाल की स्थिति में है। घर के एक कोने में लकड़ी के चूल्हे पर चावल खदक रहा है तो पास ही बिछी चटाई और लकड़ी के पीढ़े पर बैठे महावीर मांझी और किसना की माँ के बीच सलाह-विचार। किसना की माँ ने काफी विचार के बाद कहा-

‘बेटा से बड़ा, पोता खातिर दूध तो नहिए है। हमारा पोता लोग माड़े (राइस जूस) पी के रहेगा और फिर किसना की जिनगी रही तो फिर गाय से गोहाल (गोशाला) भर जाएगा। जाइए, जैसे पाँच गाय नहीं वैसे एको नहीं... दे दीजिए किसी को और ले लीजिए पाँच हजार। किसना एक बार घर आ जाय, इससे बड़ा कुछ नहीं... हे गँवात बाबा त्रहिमाम...’

महावीर मांझी के पास इसके अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय था भी नहीं, फिर भी कहता है-

‘देखो किसना माय! तीन महीना में पेट और कचहरी के चक्कर में हमलोग पाँच-पाँच गाय खा चुके हैं। अब गोहाल में बाल-बच्चा के लिए पाव भर दूध का अंतिम आसरा यही गोली गाय (लाल) बची है। अगर इसको भी बेचिये देंगे तो फिर ई गाँव में रहने और दू चोथ गोबर का भी आसरा खतम हो जाएगा। ई काम मत करने दो।’

झुँझलाते हुए कृष्णा की माँ ने कहा था-

‘तब ले चलो, बेच दो हमहीं को..., है कोई खरीदवइया...न गहना... न पाती... न बेचने लायक खेत... घर बारी... छौ महीना अपना घर खट कमा के खाना है। छौ महीना दूसरे घर का आसरा है। ऐसा में हमहीं को रख के का करोगे... हमको बेच दो... और गोली गाय को गरदन में बाँध के रख लो... पीते रहना बाबा... पोता दूध...’ बोलते-बोलते आक्रोश में फफक कर रो पड़ी थी किसना की माय।

इसके बाद घर में किसी का किसी से कोई संवाद नहीं हुआ था। अहले सुबह महावीर मांझी उठा था और गोहाल की अंतिम ‘गोली गाय’ और उसके नन्हें बछड़े को लेकर निकल गया था टाटीझरिया बाजार के प्रधान होटल वाले मालिक के खटाल के लिए। उसे पता है, सेर दो सेर दूध देने वाली देहाती देशी नस्ल की गायों का वही एक मात्र खरीददार है, इस इलाके में। सैकड़ों छोटी गायें हैं उसके पास- जो दिन भर जंगलों में चरती हैं और दूध देती हैं।

इन देशी गायों के दूध की चाय और गुलाब जामुन के लिए वह जिले भर में प्रसिद्ध है। बाजार मार्ग से गुजरने वाली हर छोटी-बड़ी गाड़ी वहाँ जरूर रुकती है।

महावीर मांझी जब गाय लेकर घर से निकला था, किसना की माँ दोनों पोता को घर में लेकर लेटी हुई थी। पर किसना की पत्नी दीवार से ओट लेकर सब कुछ टुकुर-टुकुर देख रही थी। बेचारी अभागन के सामने एक तरफ बच्चे... तो दूसरी तरफ मरद का आसरा (आस)...’

प्रधान होटल का मालिक महावीर को इतनी सुबह-सुबह देखकर ही समझ गया। मांझी आज पुनः एक गाय लेकर आ गया है। पाँच गाय मात्र तीन माह में एक ही दाम (चार-चार हजार पर ले चुका है। सो समझा मांझी उतना ही लेगा। पर मांझी तो आज की गाय के कई नये-पुराने गुण गिनवाकर एवं अपनी जरूरत का हवाला देकर छह हजार पर अड़ा हुआ है-

‘हजूर ई गाय ऊ पाँचों गाय से अलहदा (अलग) है। धार-पेनहान-दूध सब आँख के सामने है। सोझा और सुधुवा (सहज) तो इतना कि जनानी और बच्चा भी दूह ले। हजूरनी घर पर हों तो एक बार सब सत् देख लेने कहिए। मगुर आज दाम जो हम माँग रहे हैं दे दीजिए। बाल-बच्चों का भला होगा। ई गाय का दाम नहीं, समझिए दान होगा... दान...’

‘हाँ मांझी समझते तो हम भी हैं, पर इतना सुबह-सुबह रुपया आयेगा कहाँ से? और फिर छौ हजार का खुट्टा भी ढीला करना होगा। दाम कल ले जाना।’

‘नहीं मालिक नहीं! ई मत कहिए। हमरा किसनवाँ का कल्हे बेल हो गया है। आज बारह बजे तक रुपया लेकर ‘लाला बाबू’ वकील के पास पहुँच जायेंगे तो हमरा बेटा आज जेहल से छूट जाएगा। समूचा घर डहरे (राह) पर नजर गड़ाए हुए खड़ा है। बाकी का सारा वृतांत आपसे कहना का है... देखिए थोड़ा उपाय कीजिए आज महबिरवा लाचार है सरकार...’

प्रधान, सधे व्यापारी की तरह- ‘अच्छा देखते हैं’ कह कर घर की तरफ प्रस्थान कर गया, सो लौटा करीब एक घंटे बाद। इस बीच महावीर भकंदर के मरीज की तरह इधर से उधर भटकता रहा। आते ही प्रधान ने थोड़ा तीखे अंदाज में कहा-

‘देखो माँझी, एतना रुपया कोई घर में धरा हुआ (रखा) नहीं है जो तुरन्त दे दें हाँ, और एक बात और मलकिनी से बात करके आए हैं, वो पाँच हजार से एक पाय ज्यादा देने के वास्ते तैयार नहीं हैं। सो भी तुम्हारा फजीहत (संकट) देख कर, नहीं तो अभी खटाल में गाय की जरूरत भी नहीं है। तुम गाय ले जा सकते हो...’

महावीर हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा था- ‘नहीं मालिक नहीं, ऐसा मत कहिए। रुपया कहीं से भी हो, जोगाड़ करके दीजिए, नहीं तो मेरा बेटा जेहले में रह जाएगा। रुपया तो गाय क्या? हमरा किसनवां भी महीनत मजूरी (मिहनत) करके वसूल देगा।’

‘नहीं... नहीं ऐसा मत कहो, तब ठहरो, थोड़ा समय दो, एकाध घंटा में हम किसी से हथपैंच (हाथों-हाथ का कर्ज) खोज कर आते हैं। मगर याद रहे पाँच हजार से एक आना भी अधिक नहीं देंगे! हाँ समझ लो।’

लाचार और विवश मांझी के मुख से एक बकार तक न फूटी। सड़क किनारे एक महुआ पेड़ की जड़ के पास बैठ कर शहर की तरफ भागी जा रही गाड़ियों को चुपचाप देखता रहा..... ‘ई तो दस बजिवा गाड़ी भी गुजर गया...’

‘ई तो कौलेजिया गाड़ी बुझाता है’

‘ई तो मेरू कैंप का मलेटरी गाड़ी एगारह बजे के करीब तरकारी (सब्जी) लाने विसुनगढ़ जाता है, से हो चला गया।’

‘बाप रे बाप एतना कुबेर (देर) से जायेंगे तो लगता है वकील साहेब नोचिए के खा जायेंगे।’

‘बप्पा! गइयो बेच दिए और बेटवा को भी ले के घर नहीं जायेंगे तो सब हमको तो जीने नहीं देगा।’

जैसे अनगिनत भावों-विचारों में महावीर मांझी बेचैन हो, कभी उठ रहा था... तो कभी बैठ रहा था... तो कभी-कभी टहलने लगता था कि उधर से प्रधान होटल वाला मालिक आ जाता है। महावीर मांझी को पाँच हजार रुपये नगद तथा दो गुलाब जामुन और समोसा थमाते हुए कहता है- ‘इसे खालो मांझी और जाव... तुम अपना काम बनाके मिलना।’

पैसा हाथ में मिलते ही मांझी एक बार प्रधान और खटाल की ओर देखता है... रुपये बारी-बारी से कई बार गिनता है और फिर नास्ता को गमछे की खूँट में बाँधकर सीधे कचहरी के लिए वहीं से गाड़ी पकड़ लेता है।

कचहरी पहुँचते-पहुँचते करीब एक बज चुके होते हैं...काफी भागदौड़ के बाद पहले मुंशी, फिर वकील साहब से मुलाकात होती है... पहले तो वकील साहब देर हो जाने की बात पर जोरदार रूप से उखड़ जाते हैं, पर मांझी की सच बयानी पर तुरंत ही सहज हो जाते हैं। फिर बात शुरू होती है पैसों की। काफी मोल-जोल के प्रयास और गिड़गिड़ाने के बावजूद चार हजार का चार हजार, वकील साहब के हाथ में देना ही पड़ता है। ऊपर से वकील साहब यह अहसान भी सुनाते हैं-

‘मांझी तुम अपने इलाके के थे, घरइया थे, इतना कम में तो यह काम संभव ही नहीं था, फॉरेस्ट केस में साल-साल भर का समय और लाख, पचास-हजार का खर्च भी कम पड़ जाता है। पर चलो, तुम्हारा काम हो गया, आगे से ख्याल रखना, मिलते-जुलते रहना,’

‘जी हुजूर... तनी जल्दी करवा दीजिए। घर में किसना के पहुँचने तक लगता है हँड़िया भी (भोजन) भी नहीं चढ़ेगा। घर में छोटा-छोटा... बच्चा लोग आज बाप का आसरा लगौले होगा।’

‘अच्छा-अच्छा ठीक है सुनो, मुंशी जी जेल तक साथ-साथ रहेंगे, हमको तो कुछ नहीं चाहिए, पर इनको दो सौ रुपया जरूर दे देना... और जेल पर इनके जाने से काम सौ-दो सौ में ही हो जाएगा। इसलिए इनका ख्याल रखना जाव...’

सेंट्रल जेल पर पहुँचने के करीब दो घंटे बाद किसना रुआँसा... रुआँसा, चेहरा लटकाए बड़ा फाटक से बाहर निकला और निकलते के साथ बाप की छाती से दुबक कर भरपेट रोया। बाप कहता रहाµ

‘अरे चल न सुगा घर पहले, वहाँ जेतना पियार जताना हो, जताते रहना। सब के सब वहाँ तोहरा आसरा में पथरा रहा होगा। हिंये कुबेर (देर) कर देगा तो घर पहुँचने में बड़ा फजीहत (मुश्किल) हो जाएगा।’

समय की नजाकत को समझते ही दोनों बाप-बेटा वहाँ से जल्दी निकलने की तैयारी करते हैं। मुंशीजी को किसी तरह चार सौ देकर मांझी कल्दा छुट्टी कराता है और फिर दोनों सरपट टैंपो पकड़ कर स्टैण्ड और फिर स्टैण्ड से गाँव पहुँचते हैं। घर पहुँचते-पहुँचते गाँव के हिसाब से काफी रात हो चुकी है, लगभग बियारी का समय (रात का भोजन) है। दोनों बाप-बेटे के घर पहुँचने की भनक (जानकारी) मिलते ही किसना की माँ और पत्नी अपने-अपने कमरे में बैठकर रोने लगती हैं। रोना ऐसा जिसमें तीन माह की जमी भावना, संकट और देर करके आने का उलाहना सहित घर का सारा हाल समाचार सस्वर रोने से ही स्पष्ट हो जाए।

(झारखंड-बिहार के ग्रामीण परिवेश में किसी अतिप्रिय व्यक्ति के विलम्ब से आगमन पर महिलाएँ हर्ष मिश्रित विशाद व्यक्त करने के लिए रोती रही हैं जो प्रथा अब धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है पर इस माँझी परिवार में जीवित हैं.)

घर की महिलाओं को रोते देख दोनों बच्चे और फिर उनको चुप कराने में महावीर और किसना भी रो पड़ते हैं। करीब घंटे भर बाद घर का वातावरण शांत होता है। पास-पड़ोस से रोना सुनकर जुट आए पड़ोसी आपस में हाल-समाचार जान कर विदा लेते हैं। महावीर और किसना के सामने भोजन परोसा जाता है। महावीर याद करके अपने गमछे में बाँधकर सुबह के रखे गुलाबजामुन निकाल कर दोनों पोतों को देता है। पूरा परिवार भोजनोपरांत अपनी-अपनी कोठरी में जाता है।

सुबह उठते के साथ किसना आदतन गोहाल में जाता है। वहाँ सिर्फ दो मरियल बैल खड़े हैं। गाय के बगैर पूरा का पूरा गोहाल खाली है। कारण वह जानता ही है. स्वयं ही है, स्वयं से ही मौन रहकर बातें करता है- ‘किसना अब क्या होना चाहिए, जो होना था सो तो हो गया- आगे...’

किसना के सामने एक एक कर कई रास्ते नजर आने लगते हैं- ‘पुनः घर पर ही रहकर बप्पा के साथ खेती-चरवाही... दूसरा... जेल में मिले मथुरा और अन्य साथी संगतियों का आमंत्रण... तीसरा गाँव से प्रतिदिन शहर जाकर दिहाड़ी मिहनत-मजदूरी कर लौटने वाले नौजवानों का साथ...’

वह कल तक जेल में बन्द होकर जो-जो भी सोचा सो सोचा... पर रात उसके आगमन पर घर वालों का रोना... और खाली-गोहाल... ओह! अब वह घर में ऐसी स्थिति का कारण नहीं बनेगा।

अपनी कोठरी में लौटता है. जल्दी-जल्दी तैयार होकर शहर कमाने के लिए जा रहे दोस्तों के साथ हो लेता है। अठ बजिया ट्रेकर से कोर्रा चौक जहाँ दिहाड़ी मजदूरी खोजने वाले मजदूर खड़ा होकर काम की प्रतीक्षा करते हैं, किसना भी खड़ा होता है। खड़ा होते ही कोर्रा चौक पर मजदूर खोजने आए प्रोफेसर साहब केदार जी की नजर छरहरे बदन के किसना पर पड़ती है। केदार जी पूछते हैं-

‘काम करने चलोगे?’

‘हाँ! का काम है?’

‘फुलवारी साफ करने और फूल लगाने का.’

किसना पल भर मौन रहकर अनुमान लगाता है- ‘यह काम तो अच्छा है करना चाहिए’

फिर प्रश्न करता है- ‘कितना दीजिएगा...?’

‘जितना सबको देते हैं- ‘साढ़े तीन सौ.’

किसना अनुमान लगाता है, इस हिसाब से तो महीना-दो महीना में गोली गाय फिर आ सकती है... बेसे-बेस है...(अच्छा) ‘चलिए...’

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सम्पर्क : ग्राम$पत्रालय-कदमा,

हजारीबाग, झारखण्ड-825301

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रचनाकार: प्राची - जनवरी 2019 - कहानी - किसना बिना गाय - सुबोध सिंह शिवगीत
प्राची - जनवरी 2019 - कहानी - किसना बिना गाय - सुबोध सिंह शिवगीत
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