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प्राची - जनवरी 2019 : मन-सेवा काव्यानुभूति - शिवानंद सिंह ‘सहयोगी’

मन-सेवा काव्यानुभूति
शिवानंद सिंह ‘सहयोगी’

पूर्वांचल का पथ हुआ, जगभग-जगभग दीप,
‘पशुपति’ जब पैदा हुए, रामनगर के द्वीप.
हुई बधाई गगन को.
दावा की माटी हुई, धन्य-धन्य अति धन्य।
हिन्दी भाषा के लिए, लेखक जब मूर्धन्य.
सेवक नित बनकर रहे.
सांसों में हैं बस रही, भोजपुरी की वायु.
हरियाली में खेलती, सत्तर की यह आयु.
शब्द साधना से जुड़ी
शोध समीक्षा में लगा, लेखन का अवदान।
सहज लेखनी पा रही, उज्जवल आदर मान.
वाणी में मधुपर्क है।
अपने अध्यवसाय से, शब्द-शब्द संतुष्ट।
भाषा की भवितव्यता, से हैं बातें पुष्ट.
सतत् नियोजक साधना.
शब्द-शिल्प शैली कहन, भाषा के मर्मज्ञ
हिंदी अनुसंधान के एक प्रशंसित प्रज्ञ
हिंदी पूजा धर्म है.
शांत रूप है सहजता, भाव, तपस्या, धैर्य
जागरूकता के कलश, समता के ऐश्वर्य
योग-पुरुष है तथ्य के.
मानवीयता की लहर, हृद में नवल हुलास।
कभी नहीं डिगता मिला, सच पर से विश्वास
प्रणव प्रणेता शोध के.
सहयोगी बनकर रहे, मन में नहीं दुराव.
सहलाते हरदम रहे, सभी भाव के घाव.
पर सेवा प्रतिबद्धता.
सम्मानों के विभु क्षितिज, विविधा के आकाश।
सूरज-सा बिखरा रहा, यश का अटल प्रकाश
गौरव के सौरभ प्रखर.
नस-नस में जिनके भरा, प्रेम, नेम, अनुराग.
संघर्षों के द्वार पर, बिरहा गाता फाग.
हर्ष बद्धिनी जिन्दगी.
अंगरेजी भाषा रही, सेवा का अनुदान।
हिन्दी को मिलता रहा, हर अनुपम सम्मान
संतु सरल अभिधान के.
रहे अलीगढ़, हाथरस, वृन्दावन के पास.
अक्षर से लिखते रहे, शब्दों का इतिहास।
साथ चले परिवेश पल.
आशाएं खातीं नहीं, कभी अर्थ का अन्न।
आलेखन में है रमा, मन सेवा सम्पन्न।
जीवन साथ लेखनी.


संपर्क : ‘शिवाभा’, ए-233, गंगानगर,
मेरठ- 250001 (उ.प्र.)

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