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लघुकथा // दो सखियाँ // ज्योत्सना सिंह

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समाज सेवा का बीड़ा उठाया था उसने। किसी एक से ज़िंदगी को तभी न बांध पाई थी।

सिर्फ़ एक की ही सेवा कर उसके मन को वह संतोष न मिल रहा था।

घर के बाहर होती तो हर वक़्त माँ का ही खटका लगा रहता।

घर आ कर भी उनका रूठा हुआ उदास चेहरा उसके दिल को बेचैन कर देता।

“क्या हुआ माँ दर्द ज़्यादा है क्या?”

“दर्द अब और क्या होगा? वही तो अब संगी- साथी है।”

का रूखा सा जवाब दे वह, अपने अकेले नहीं एकाकीपन का रोष जताती।

शीना अपने लिये फ़ैसले से बहुत ख़ुश थी। वही क्यूँ ? अब तो दोनों सखियाँ ख़ुश थी।

एक गाँव की सेविका बन जब वह गई तो वहाँ उसकी मुलाक़ात रिंकी से हुई जो की अपने दोनों पैरों से जन्म से दिव्यांग थी।

“हमारी सखी बनोगी?”

शीना ने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा।

“नहीं!”

“पर क्यूँ?”

“क्यूँ कि आप मुझ से अलग हैं। और सखी बन आप भी आगे बढ़ जाओगे और मैं फिर अकेली रह जाऊँगी।”

उसने अपने पैरों को देखते हुए कहा।

उसी क्षण शीना ने उसे गोद ले उसका इलाज करवाने की,उसे एक बेहतर ज़िंदगी और साथ ही एक साथी देने की मंशा बनाई।

सत्तर की माँ और सात की उनकी सखी अब वह दोनों साथ होती हैं। और बचपन और बुढ़ापा दोनों एक साथ खिलखिला रहा होता है।

ज्योत्सना सिंह

गोमती नगर

लखनऊ

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