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लघुकथा // ब्रह्मराक्षस // ज्योत्सना सिंह

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“सब पता है मुझे आप उदास क्यूँ है।”

मिनी ने दूर से ही कहा तो ग़मगीन बैठी सुजाता की तंद्रा टूटी और उसने पलट के देखा सुंदर गुलाबी फ्राक में थोड़ी दूर पर लगभग आठ साल की एक बच्ची खड़ी मुस्कुरा रही थी।

”यहाँ आओ मेरे पास “

कह कर सुजाता ने अपनी बाँहें फैला दी।”

“नहीं आप आओ यहाँ मैं पीपल के पेड़ के नीचे नहीं आ सकती।”

“पर क्यूँ?”

”क्यूँ की दादी मना करती है।

दादी कहती है पीपल के पेड़ पर ब्रह्मराक्षस रहते हैं।”

”अरे वो क्या होता है ?”

मिनी बोली।

“वो जो हमको दुखी करते है। ऊँचे कुल में जन्म ले कर भी बुरे काम करते हैं।” सुजाता बोली।

“अरे आप को तो बहुत कुछ पता है।” “हाँ,आप इस पेड़ के नीचे बैठे हो तभी तो आप दुखी हो।”

सुजाता ने पास जा मिनी को गले लगा कहा।

“बेटा मैं उदास हूँ क्यूँकि मैं एक ग़लत काम करने जा रही हूँ। पीपल तो बहुत उपयोगी पेड़ है वो तो हमें दिन और रात दोनों में ऑक्सीजन देते हैं।

देखो गौतम बुद्ध को ज्ञान भी तो पीपल के नीचे ही प्राप्त हुआ था और अब मुझे भी ज्ञान मिल गया कि राक्षस और देव दोनों ख़ुद के भीतर ही होते हैं।”

कहते हुए सुजाता ने सामने खड़े अपने पति सुमित को कटाक्ष नज़रों से देखा प्यारी सी मिनी को देख सुमित पास आ उसे दुलराता हुआ बोला।

“बेटा मैं स्वयं ही ब्रह्मराक्षस हो गया था जो तुम सी आने वाली गुड़िया को खोने जा रहा था।”

और सुमित सुजाता और मिनी को थामें पीपल के पेड़ के नीचे जा एक सकारात्मक सुखद एहसास का अनुभव करने लगा ।

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ज्योत्सना सिंह

गोमती नगर

लखनऊ

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