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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - // 124 // मुरली मनोहर श्रीवास्तव

प्रविष्टि क्रमांक - 124

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

परिंदे

उस की निगाह दूर तक उस कबूतर के साथ चली जा रही थी। लाईफ का एंकर प्वाइंट भी अजीब सी चीज है।

जिस तरह कई बार निगाह अनजाने ही किसी का पीछा करते हुए चलती है वैसे ही एंकर प्वाइंट निगाह में थम सा जाता है ।

जिंदगी के सारे काम चलते रहते हैं और दिल के भीतर आदमी वहीं थमा रहता है। जैसे वह हासिल हो जाये तो सुकून मिल जाये। वक्त और उम्र भी जैसे ठहरी रहती है मन के भीतर छुपी ऐसी ही आस के लिए।

ऐसा कोई नहीं है जिस के भीतर कोई चाह न हो।

और बस एक दिन इस चाह का खत्म होना ही जैसे मृत्यु है। भले ही वह भौतिक रूप से जीता रहे किन्तु मानसिक रूप से वह दीन दुनियां छोड़ देता है।

मेडिकल लैंगुएज में ब्रेन डेड । आज भीड़ अपने भीतर ख्वाहिशें छुपाये , ब्रेन डेड के दौर से गुजर रही है।

ख्वाहिशें पूरी होंने की सीमा लांघ चुकी हैं , महत्वाकांक्षा उम्र के आगे दम तोड़ चुकी है।

दौलत लाकर की गुलाम है, रिश्तों की भीड़ है,व्हाट्सअप पर सुबह से कई ग्रुप और दासियों  अपने खैरियत पूछ चुके हैं, उस ने भी सभी को गुड़ मार्निंग मैसेज और अपनी खैरियत भेज दी है।

उसे लगा उस की आत्मा परिंदे में समा गई है। वह परिंदा उड़ान भर कर आसमान नहीं छू रहा शायद परिंदे के भीतर उस की आत्मा उड़ान भर रही है।

वह हंसा जैसे मोह से मुक्त हो गया हो, क्या फर्क है उसकी और परिंदे की उड़ान में , परिंदा उड़ रहा था,लेकिन उस की उड़ान देखने उस की तारीफ करने या फिर उस की उड़ान में मीन मेख निकालने वाला कोई न था। न ही परिंदे ने नीचे झांक कर देखा था कि कितने लोग उसे देख रहे हैं न ही उस ने अपनी उड़ान की हाइट नापी थी। कोई उसे नाम शोहरत और पुरस्कार भी तो नहीं मिलना था इस उड़ान पर।

वह तो इसे जानता भी नहीं था।

वह फिर हंसा उस का अपने भीतर महान बन जाने का ऐंकर जैसे अपने आप ही ध्वस्त हो रहा था।

किस बात के लिए पुरस्कार की आस, कैसा नाम कौन सी शोहरत , किस को दिखाना किस की निगाह में ऊंचा उठाना किसे गिराना । जिंदगी बस इसी सोच में तो बीत गई।


उस ने ग्रुप मेल लिखा -

मैं मुक्त हूँ , किसी परिंदे की तरह, अपनी कामना, विचार, भावना , अभिलाषा,और आकांक्षा से, अपने महानता बोध के ऐंकर से , कि इंसान और परिंदे में कोई फर्क नहीं है बस यही कि वह पल प्रतिपल मृत्यु पर्यन्त , विचार और चिंतन से मुक्त नहीं हो पाता , और इसीलिए परिंदे की उड़ान , निरपेक्ष उड़ान उसे इंसान से बड़ा बनाती है। मैं परिंदे से उड़ाना सीख रहा हूँ ,अनजाने ही किसी को मैंने जीवन में अपने अहंकार से ठेस पहुंचाई हो तो मुझे माफ़ कर दें,इसे मेरी सच्ची प्रार्थना समझें।

आपका

रा. कृ. अग्रहरि

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय,
    विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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