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लघुकथा // समाज सेवा // दीपक दीक्षित

समाज सेवा

सुल्तान और अंजलि दोनों भाई बहन की मंजिल एक थी - उनका घर।

जैसे ही उनके पापा यानी प्रमोद ने उनकी मम्मी यानी सलमा की मौत की खबर दी ,दोनों सकते में आ गए थे ।

अचानक हुए हार्ट अटैक को पहचानने और डाक्टर के पास लेकर जाने में प्रमोद से देर हो गयी और ये अनहोनी हो गयी।

सलमा एक प्रगति वादी महिला थी और एक कर्मठ समाज सुधारक तथा लेखिका । समाज के भोंडे रीतिरिवाज ,कुरीतियों के खिलाफ लड़ने में उसने अपनी जिंदगी खपा दी थी। और सब तरफ से विरोध के बाबजूद प्रमोद से अंतर्जातीय विवाह किया था। अलग- अलग धर्म को मानने से उनकी विवाहित जिंदगी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था ,वो अच्छी गुजर रही थी, क्योंकि संकीर्ण सोच वाले लोगों पर वो दोनों ही ध्यान नहीं देते थे। घर में दोनों अपने अपने धर्म के रीति रिवाज से पूजा अर्चना और अनुष्ठान आदि करते थे।

जब उनके पहली संतान एक बेटी हुई तो पापा ने अपनी लाडली का नाम रखा अंजलि । पापा की लाडली होने के कारण अंजलि अधिकतर उनके साथ रहती और धीरे धीरे उसका मन हिन्दू धर्म में रम गया। इसके उलट उनकी दूसरी संतान जो एक बेटा था वह माँ की आँखों का तारा बन गया। माँ ने उसे अपने मुस्लिम संस्कारों के साथ बड़ा किया और उसका नाम रखा -सुल्तान।

घर पहुँच कर दोनों बच्चे अपनी जन्मदात्री की मृत देह को देख कर बिलख बिलख कर रोने लगे।

भावनाओं का आवेश जब कम हुआ तो दिमाग ने अपना काम करना शुरू कर दिया ।

इस समय सुल्तान सोच रहा था कि शरीर को कब्रगाह तक ले जाने के लिए क्या क्या इंतज़ाम करना होगा। इसके लिए उसने एक मौलवी साहब से भी बात कर रखी थी। और अंजलि सोच रही थी कि शवयात्रा और शमशान में क्या क्या इंतजाम करना है। उसने एक पंडित जी का फ़ोन नंबर हासिल कर लिया था जो इस तरह के अनुष्ठान करते थे।

उन्होंने पिता से पूछा , ' अब आगे क्या करना है?'.

पिता ने कहा , ' मैंने अस्पताल में खबर कर दी है , उनकी।गाड़ी अभी आती ही होगी।'।

बच्चों को असमंजस में पड़ा देख उन्होंने आगे बताया , 'तुम्हारी मां ने अपना देहदान किया हुआ था । उनका शरीर अब मरने के बाद भी जरूरतमंद लोगों के काम आएगा'।

थोड़ी देर बाद एक एम्बुलेंस आयी और शरीर को ले गयी।

वहां दीवार पर रह गयी सलमा की एक मुस्कुराती हुयी तस्वीर जी पर फूलों की माला चढ़ी थी ।

सचमुच वह एक समाज सेविका थी ।

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दीपक दीक्षित

निवास : सिकंदराबाद (तेलंगाना)

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

संपर्क​ : coldeepakdixit@gmail.com

रुड़की विश्विद्यालय (अब आई आई टी रुड़की) से इंजीयरिंग की और २२ साल तक भारतीय सेना की ई.ऍम.ई. कोर में कार्य करने के बाद ले. कर्नल के रैंक से रिटायरमेंट लिया . चार निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी कुछ समय के लिए काम किया।

पढने के शौक ने धीरे धीरे लिखने की आदत लगा दी । कुछ रचनायें ‘पराग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नवनीत’ आदि पत्रिकाओं में छपी हैं।

भाल्व पब्लिशिंग, भोपाल द्वारा 2016 में "योग मत करो,योगी बनो' नामक पुस्तक तथा 6 साँझा-संकलन प्रकाशित हुए हैं ।

कादम्बिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण सेवा समिति , भोपाल तथा नई लक्ष्य सोशल एवं एन्वायरोमेन्टल सोसाइटी द्वारा वर्ष 2016 में 'साहित्य सेवा सम्मान' से सम्मानित किया गया। अमृतधारा संस्था ,जलगॉंव द्वारा 'अमृतादित्य साहित्य गौरव' सम्मान प्रदान किया गया (2018). के बी साहित्य समिति , बदायूं (उ. प्र.) द्वारा ‘हिंदी भूषण श्री’ सम्मान दिया गया (2018) ।

वर्ष 2009 से ‘मेरे घर आना जिंदगी​’ ​(http://meregharanajindagi.blogspot.in/ ​) ब्लॉग के माध्यम से लेख, कहानी,कविता का प्रकाशन। कई रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं तथा वेबसाइट (प्रतिलिपि.कॉम, रचनाकार.ऑर्ग आदि) में प्रकाशित हुई हैं।

साहित्य के अनेको संस्थान में सक्रिय सहभागिता है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई गोष्ठियों में भाग लिया है। अंग्रेजी में भी कुछ पुस्तक और लेख प्रकाशित हुए हैं।

साँझा-संकलन

संपादक का नाम

पुस्तक का नाम

विधा

प्रकाशक

डा. डी. विद्याधर

हिंदी की दुनियां ,दुनियां में हिंदी

निबंध

मिलिंद प्रकाशन ,हैदराबाद

जयकांत मिश्रा

सहोदरी कहानी-२

कहानी

भाषा सहोदरी -हिंदी, दिल्ली

जयकांत मिश्रा

सहोदरी लघुकथा -२

लघुकथा

भाषा सहोदरी -हिंदी, दिल्ली

जयकांत मिश्रा

सहोदरी सोपान-५

कविता

भाषा सहोदरी -हिंदी, दिल्ली

डा प्रियंका सोनी 'प्रीत'

काव्य रत्नावाली

कविता

साहित्य कलश प्रकाशन , पटियाला

राजेश अग्रवाल तथा अन्य

हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति : वैश्विक परिदृश्य

निबंध

मिलिंद प्रकाशन ,हैदराबाद

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