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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 125 // रक्षक // मृणाल आशुतोष

प्रविष्टि क्रमांक - 125

मृणाल आशुतोष

रक्षक

उसकी आँखों में खून उतर चुका था। आखिर दोनों छोटे भाई को दंगाईयों ने मौत के घाट उतार दिया था। सेना का जवान था। खून तो गरम था ही। चाकू-पिस्तौल के साथ वीरान सड़क पर पुलिस की जिप्सी से अधिक वह दौड़ रहा था। जो भी सामने आ जाता, बिना पूछे कि वह कब्रिस्तान जानेवाला है या श्मशान, सीधा ऊपर का रास्ता दिखा देता। तभी एक चीख ने उसे मुड़ने पर मजबूर कर दिया। इससे पहले कि वह कुछ करता, एक लड़की उससे लिपट गयी,"भैया, मुझे बचा लो। ये लोग मुझे मार डालेंगे।"

वह सन्न रह गया। लड़की की आँखें उसके पिस्तौल पर ठिठक गई और उसके हाथों की पकड़ ढीली होने लगी मानों पूछ रही हो कि मुझे बचाओगे न!

दंगाई नज़दीक आने लगे थे। उसने हवा में पिस्तौल लहराया," किसी ने हाथ लगाने की कोशिश की तो...."

अब वह अपनी पुरानी भूमिका में वापस आ गया था।

©मृणाल आशुतोष

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय,
    विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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