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लघुकथा // कोहरा // किरण बरनवाल

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बाहर दूर तक फैला कोहरा कुदरत के नैसर्गिक खूबसूरती को अपने आगोश में लपेटे अपने हिमाकत पर इतरा रहा था,देवदार के वृक्षों के बीच से सरसराती कनकनी हवा  शरीर की  हड्डियों को गलाती हुई रुह तक यूँ पहुंच रही थी जैसे वहाँ उसे पल भर के लिए ताप मिल रही हो। सूरज ऊनी चादर ओढ़े  कुम्हलाया सा  बादलों के बीच दुबका बैठा मानो इन्तजार कर रहा हो दिन ढलने का,इतनी ठंड कि बहती नदी जम जाये,होटल की खिड़की से सामने पहाड़ पर चाँदी सी जमी बर्फ बार बार आकर्षित कर रही था ....कुछ महीनों के बाद खुली धूप निकलेगी तो ये जमी हुई बर्फ झरने का रुप ले कलकल बहते मनमोहक बन धरा पर सौन्दर्य बिखेरते सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बन जाएँगे ।

कितना अंतर है प्रकृति और मानव जीवन की प्रवृत्ति में,  समय के साथ मौसम बदलते रहते हैं, मानव जीवन आगे तो बढ़ जाता है पर मन वहीं टिक जाता है जहाँ कुछ छूटता है,कांच सा टूटता है  ...मैं भी तो बर्फ बन जम गई थी सालों पहले ही ।

"मन का हुज्रा कितनी बार उजड़ा भी और बसाया भी

सारी उम्र कहाँ ठहरा है कोई एक रिहाई पर

फ़ासले हैं भी और नहीं भी नापा तौला कुछ भी नहीं

लोग ब-ज़िद रहते हैं फिर भी रिश्तों की पैमाइश पर "

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तन ने बिना कोई शोर मचाये वामांगिनी बनना तो स्वीकार कर लिया पर मन वहीं छूट गया था जहाँ सोलहवां सावन आते-आते प्यार की फ़ुहार से दिल  नहा उठा था,सुबह शाम बस , ....कुछ तो था मेरे मन में बरसों से जमा हुआ जो चाह कर भी नहीं पिघल रहा था।

   स्वप्निल निद्रा देवी के आगोश में अभी भी सुरमई आँखों में  बसे सपनों  की दुनिया में विचरण कर रहा था, होंठों पर मोहक मासूम सी मुस्कान खींच रही थी मुझे उसकी ओर पर कहीं कुछ अटका हुआ था जिसे गटक कर अपनी नजर उससे हटा ली ।जनवरी की हाड़ कंपकंपाने वाली सर्दी में भी नई नवेली पत्नी के सामीप्य को आतुर पति के संग हनीमून पर तो आ गई थी मैं  पर दिल उस पतली गली में छोड़ आई जिसका पता मुझे भी नहीं मालूम था।

     सूर्य देवता लुका छूपी खेलने लगे थे, ठंड खत्म होने के एहसास से जैसे ही बाहर निकलने की कोशिश करते,वैसे ही ठंडी-ठंडी हवा की फुहार से  डर फिर बादलों की गोदी में जा छुपते, श्वेत धवल पहाड़ और उनकी चोटियां बरबस अपनी तरफ खींच रहें थे, प्राकृतिक दृश्य की खूबसूरती को निहारती   ...सच लग रहा था जैसे स्वर्ग में पहुंच गई हूँ, तभी वेटर ने चाय पहुंचा दिया,   खूबसूरत नजारों को आँखों से पीते न जाने बावरा मन पंछी किस ओर उड़ने लगा,लाख संभालना चाहा पर उड़ते मन को भला कहाँ कोई काबू कर पाया है, चाय से उठते भाप के छल्ले के साथ अतीत की तरफ दौड़ते मन को शायद मैंने भी बेलगाम कर दिया था ।

नूपुर ..नूपुर की सुमधुर आवाज मुझे रह रह कर आज भी उस की उपस्थिति  का एहसास दिला रही थी  ,कहते हैं जिसे भूलना चाहो वो दिल से आत्मा में उतर और भी ज्यादा पैठ बना लेता है ,दिलो दिमाग पर उसका नशा इस कदर चढ़ता गया कि मैं खुद का अस्तित्व उसमें तलाशने लगी थी । चाहत शायद एकतरफा नहीं था तभी तो सबके बीच मुझे देख अक्सर मुस्करा कर शरारत से एक आँख दबा जाता और मैं दुपट्टे के छोर में अंगुलियों से गाँठ बनाती नजरें नीची किये शर्म से रक्ताभ हो जाती। शायद प्यार इसे ही कहते हैं, ऐसी ही अनुभूति होती होगी पहले प्यार की। स्कूल ट्रिप में पहली बार उससे टकराई थी तब कहाँ जाना था कि दिन की चैन के साथ-साथ रात की नींदे भी उड़ने वाली है। हर वक्त लगता परछाई सा बन मेरे साथ रहने लगा था वो जिसे मैं कल तक पहचानती भी न थी। मेरी सहेली के हाथों भेजे गये प्रेम पत्र बार बार पढ़ती,चूमती ,सीने से लगा फिर अनमोल धरोहर समझ सहेज रख देती,लोगों की नजर से बचा  प्रेम पाती के संग अपने प्रेमी को ले दूर गगन उड़ ना जाने कितने ख्वाब देखती रहती।     प्यार परवान चढ़ रहा था कि हम दोनों आगे की पढ़ाई के लिए अलग-अलग शहर जा बसे, मन से लिए कसमें रस्में निभाने का वादा लिए हम चल पड़े यादों के पिटारे को समेटे अपनी मंजिल को पाने के लिए। उस समय पागल मन कहां जाना था,सपने कभी पूरे नहीं हुआ करते। साथ में  जीने मरने की बातें करते करते चिट्ठियों का दौर धीरे-धीरे कम होता चला गया,मैं तो अतीत में ही रह उसका साथ ढूंढती रहती पर शायद उसके दिल को कहीं और पनाह मिल गई थी । पहले प्यार का अध्याय ईश्वर ने यहीं तक लिखा था,पर उसकी जगह किसी और को देना दिल को गवारा नहीं था।  विवाह के लिए आए सभी रिश्तों में कुछ ना कुछ कमियाँ निकाल  उससे बदला लेती या उसका बाट जोहती ,मेरी समझ से परे था लेकिन अंतर्मन में अक्सर खुली आँखों से सपने देखा करती ....वो मेरी माँग में चाँद सितारों को  सजा अपनी अर्धांगिनी बना फूलों के सेज पर ले जा रहा है ... फूल कहाँ  , काँटों की सेज सजा दी थी उसने जो ताउम्र दंश दे रहा था सपनों का दर्पण टूट गया था,बिखरे काँच मन को लहू-लुहान कर सिर्फ पीड़ा देते,जितनी पीड़ा होती उतना सुकून मिलता। प्यार से विश्वास उठ चुका था पर दिल था कि अभी भी उसका राह ताकता।

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समय सबसे बड़ी दवा है, वक्त के साथ धीरे धीरे खुद को संभालना आ गया । अपने आप को तकदीर के हवाले कर दिया और कर भी क्या सकती थी, हम महिलाओं के साथ तो यही विडम्बना है बिना विवाह के हम अपूर्ण घोषित कर दिए जाते हैं। अवांछनीय लांछनों से माँ को  बचाने के लिए स्वप्निल के आए रिश्ते को हाँ तो कर दी पर मन से जुड़ ही नहीं पा रही थी ।

भला दिल भी दो टुकड़ों में बाँटे जा सकते हैं ? टूटे ख्वाब चुभते थे पर अपने से लगते और यहाँ  प्यार से बोली बातों में भी नीम की कड़वाहट महसूस होती,जितना पास बैठती मन पंछी उतना ही दूर जा उस बेवफा को ढूंढता।

      बाहर थोड़ी लालिमा दिख रही है ,लगता है भास्कर देव शीत की थरथराती हवा के साथ लुका छुपी  खेलते -खेलते जीत कर विजय रथ ले अपनी किरणों के संग प्रगट हो गये हैं। ओह; चाय तो प्याले में ही रखी रह गई और मैं घूम आई उस गली जिससे निकलने को छटपटाती रहती।

बीती बातों से भागती वक्त के हाथों खुद को छोड़ उठ ही रही थी कि हाथ से प्याला  छूट कर जमीन पर जा गिरा, छन्न...दिल चटका था या प्याला ........ टुकड़े टुकड़े हो गये थे प्याले मेरे सपनों की तरह, कुछ टूटने की आवाज से शायद स्वप्निल की नींद खुल गईं थीं,   मैंने सहमते हुए कदम आगे बढ़ाया तभी एक टुकड़ा पाँव  में जा चुभा, ना जाने किस दर्द से आँखें छलक पड़ी, शायद सपने भी  प्याली की तरह टूट कर मन को व्यथित कर रहे थे ।नूपुर  नूपुर .....न, न इतने अपनेपन से लिया ये नाम तो उस बेवफ़ा  के जुबान से निकल ही नहीं सकता है जो मुझे मंझधार में छोड़ अपनी जिंदगी में आगे बढ गया हो ।

स्वप्निल ने पैर से काँच निकाल सामने पड़ी  कुर्सी पर बैठा दिया,पैरों पर मरहम लगाते उसे निहार रहा था । पहाड़ों पर जमा बर्फ पूरी तरह पिघल चूका था ,पहाड़ियों के बीच से झांकता सूरज अपनी सुनहरी रोशनी से बाहर के कोहरा को हटा मौसम को खुशगवार कर दिया था , पति के स्नेहिल स्पर्श ने मन के मृदंग को बजा दिया , दिल की गिरह खुलती गई ......

  "ओस पड़ी थी रात बहुत और कोहरा था गर्माइश पर

सैली सी ख़ामोशी में आवाज़ सुनी फ़रमाइश पर "

आगे बढ़ पति के मस्तक पर प्यार और विश्वास का मधुर चुंबन अंकित कर नूपुर अपने जीवनसाथी के अंकपाश में बंधी पुरानी पन्नों से लिपटी यादों को मुक्त कर हल्की सी महसूस कर रही थी।

किरण बरनवाल

जमशेदपुर

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