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गणतंत्र दिवस विशेष व्यंग्य - ईश्वर करे ऐसी झाँकियाँ न निकालनी(देखनी) पड़ें ओम वर्मा


व्यंग्य

                      ईश्वर करे ऐसी झाँकियाँ न निकालनी(देखनी) पड़ें

ओम वर्मा

गणतंत्र दिवस के पावन पर्व  पर दिल्ली में सभी प्रांतों व सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उपक्रमों या प्रतिष्ठानों की झाँकियाँ निकालने की परंपरा है। इनके माध्यम से हमें उन राज्यों या प्रतिष्ठानों की संस्कृति, विरासत,जीवन शैली या कई बार वहाँ की समृद्धि व संपन्नता की झलक दिखाई जाती है। सभी जिला मुख्यालयों पर या बड़े  कस्बों में भी ऐसी झाँकियाँ निकाली जाने लगी हैं। सोचा कि इस बार घर बैठे टीवी पर देखने के बजाय प्रत्यक्ष दिल्ली जाकर झाँकियाँ देखूँ। अब सोचने में तो पैसे लगते नहीं हैं इसलिए सोच तो बहुत लेता हूँ मगर दिल्ली जाने का जुगाड़ हो नहीं पाया। मगर झाँकियों का भूत मेरे ऊपर सवार हो चुका था। जो बात हम जाग्रत अवस्था में फलीभूत होते नहीं देख पाते वह हमारा अचेतन मन स्वप्न में पूरी कर देता है। इसलिए निद्रादेवी ने गई रात स्वप्न में ही झाँकियों के दर्शन करवा दिए जिनकी झलकियाँ प्रस्तुत हैं।

     बीच में भारत माता की एक बड़ी तस्वीर लगी है। आठ-दस लड़के तस्वीर की परिक्रमा करते हुए नारे लगा रहे हैं-“ले के रहेंगे – आज़ादी’, भारत तेरे टुकड़े होंगे, ईंशा अल्लाह-ईंशा अल्लाह!’, ‘तुम जितने अफ़जल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा...!’ हाथों में लाल झंडे लिए कुछ लोग नारों में अपने सुर मिला रहे हैं और तालियाँ बजा रहे हैं। यह एक बड़े शिक्षण संस्थान की झांकी थी। 

     अगली झाँकी कुछ यूँ थी कि केसर की क्यारियों के बीच सेना का एक जाँबाज सिपाही अकेला जा रहा है और कुछ लड़के-लड़कियाँ उस पर पत्थर बरसा रहे हैं। एक तरफ जाँबाज है और दूसरी तरफ पत्थरबाज़। फौजी के पास बंदूक है और वह आत्मरक्षार्थ उसका उपयोग करना चाहता है इसलिए ट्रिगर पर उँगली ले जाता है मगर एक महिला आकर उसे रोक रही है। राज्य का नाम...आप जानते ही हैं। 

     अगली झाँकी में एक कोने में एक ऊँट बँधा है। बीच में रेल की पटरियाँ हैं। दो अलग-अलग समूह में कुछ लोग आरक्षण की माँग के बैनर लिए आते हैं और पटरी उखाड़ देते हैं। घणी खम्मा सा !

     अगली झाँकी में एक बैंक का दृश्य है। बाहर सूचना पटल पर कुछ कागज़ चस्पाँ हैं जिन पर कई नाम हैं। किसान जैसे नज़र आने वाले कुछ लोग अपना अपना नाम ढूंढ़ रहे हैं। कुछ अपना नाम देखकर खुशी के मारे नाच रहे हैं मगर इनसे ज़्यादा अपना नाम न होने से मातम मना रहे हैं। यह तीन राज्यों की सामूहिक झाँकी है।

     इसके बाद जो झाँकी मैंने देखी उसमें कुछ नई-पुरानी इमारतों के प्रतिरूप बने हुए हैं। इन पर संन्यासीनुमा एक शख्स भगवा रंग पोत रहा है व पुरानी नामपट्टी हटाकर नए नाम की पट्टियाँ लगाता जा रहा है। यह झाँकी जिस राज्य की है वहीं की एक और झाँकी भी थी। इसमें लाल टोपी वाले व लंबी नाक वाले एक एक सज्जन हाँफते-हाँफते एक साइकिल चला रहे हैं क्योंकि कैरियर पर पीछे एक हाथी बैठ गया है।  

    और इस झाँकी के क्या कहने! यहाँ दो कबीले हैं। प्रत्येक कबीले में से कुछ लोग दूसरे कबीले में जाने को लालायित हैं ताकि वहाँ जाकर सरदार बन सकें। इसलिए दोनों पर अपने-अपने सरदार पहरे दे रहे हैं। जी हाँ! इस झाँकी के बारे में भी आपका अनुमान बिलकुल सही है।

और जिस झाँकी ने तो बहुत तालियाँ बटोरी उसे देखें। इसमें सींखचों के पार एक खटिया पर एक क़ैदी लेता है। उसके आसपास चारे का ढेर लगा है। सींखचों के बाहर कुछ भूखी गायें रँभा रही हैं। झाँकी का शीर्षक है- ‘चारा और बेचारा!’ खामोश! राज्य का नाम न पूछें।    

     अगली झाँकी में एक मफ़लरधारी नज़र आता है जो दर्शकों को संबोधित करे हुए एक ही बात दुहराता जा रहा था -”सब चोर हैं, सब मिले हुए हैं...!” इस चीख-पुकार से मेरे नींद खुल गई। मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा। मन ही मन प्रार्थना भी की कि “हे प्रभु! वह दिन न आए कि ऐसी झाँकियाँ भी देखनी पड़ जाएँ!

                                                                ***

100, रामनगर एक्सटेंशन

देवास 455001(म.प्र.)

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