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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 244 से 247 // नेहा भारद्वाज

प्रविष्टि क्रमांक - 244


नेहा भारद्वाज

भीगी पलकें

आज गृह प्रवेश और रह-रह कर आंखें भर रही हैं, पिछले साल की ही तो बात है, जब वो मुझसे कह रहा था भाई घर लेगा तो बुलायेगा न ऐसा न हो बाद में पता चले कि मनीष भाई घर वाले हो गये और हम यहाँ बैठे रहे इंतज़ार में कि भाई बुलायेगा। सब कुछ आंखों के सामने ऐसे घूम रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो लेकिन हम भले ही ये मान भी ले कि कुछ नहीं हुआ लेकिन ये आँसू न कभी भी बेवजह नहीं बहते ये हमेशा पक्के होते हैं अपने वादे के अगर दुखी है तो ये अपने आप बाहर आ हो जाते है भले ही हम सच पर भरोसा खो दे लेकिन ये कभी अपनी उपस्थिति का भरोसा नहीं खोते। तभी अचानक दीवार पर नज़र गयी भाई की तस्वीर यहां, अचानक से मन भर आया ये रश्मि का ही काम था क्योंकि वो भाई को हमेशा अपना भाई मानती है, आंखें फिर से भर आयी भाई मुहूर्त की पूजा से पहले ही घर में आ चुका था। कहाँ तो चमकती आंखों से उसका स्वागत करना था, और कहाँ आज भीगी पलकों से मैं भाई का स्वागत कर रहा था।

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प्रविष्टि क्रमांक - 245

नेहा भारद्वाज

मशाल

"नहीं अम्मा ! ये क्या कह रही हो, मैं अनीश के सिवाय किसी को वो जगह दे ही नहीं सकती "

तो क्या बिटिया सारी उम्र यूँ ही अकेले काट दोगी ।

अकेली कहाँ हूँ मैं माँ अंश है न मेरे पास उसी के लिये मैं जी रही हूँ बस यही अब मेरा सहारा है मैं इसे अकेले पाल सकती हूँ।

जानती हूँ बिटिया, लेकिन तुम्हें क्या लगता है तुम ये सब अकेले कर जाओगी, और दुनिया के सामने एक मिसाल पेश करोगी,

पर बिटिया एक बात कभी न भूलना, मिसाल बनने के लिये भी मशाल जलानी पड़ती है और अगर मशाल के नीचे का हत्था मजबूत न हो साथ ही उसे कोई खुद से ऊपर उठाने वाला हाथ न हो तो वो चेहरे को झुलसा देती है। हम बस तुम्हारी मशाल को उठाने के लिये एक हाथ के साथ की चाह कर रहे है।

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प्रविष्टि क्रमांक - 246

नेहा भारद्वाज

दोषी

अब बुढापे में तो अकेले ही रहना पड़ेगा न सारी उम्र बच्चों को पढ़ाओ लिखाओ और जब उनकी जरूरत हो तड़प तड़प कर रह जाओ रोज का यही राग शर्मा जी घर के बाहर लॉन में बैठकर अपने दोस्तों से किया करते कही न कही से रोज कोई न कोई बात ऐसी हो ही जाती थी, कि शर्मा जी शुरू हो जाते थे और महफ़िल का अंत भी उनकी इसी बात के कारण हो जाया करता था क्योंकि किसी की न तो हिम्मत थी उनसे बहस करने की न ही वो किसी की सुना करते थे लेकिन आज गुप्ता जी सोच कर आये थे, और वही हुआ जैसे ही शर्मा जी ने बात शुरू की गुप्ता जी लपक लिये, एक बात बताओ शर्मा तुमने अपने बेटे को पढ़ाया क्यों था, उसे जीवन के हर मोड़ पर सफल देखने के लिये ही न तो जब वो तुम्हें अपने साथ ले जाने के लिये पिछले महीने आया था तुमने क्या कहा था कि तुम इस उम्र में अपने पुरखों का घर छोड़कर वहाँ दो कमरों के घर में नहीं रह सकते यहां तुम्हारे हमदर्द दोस्त है उनके बिना नहीं रह सकते तो शर्मा ये परेशानी तुम्हारी है बेटे की नहीं तुम क्या चाहते हो वो अपनी नौकरी छोड़कर यहां कस्बे में आकर रहे, और अपने बीवी बच्चों को कैसे पाले, हर काम के लिये पैसा चाहिए और यहां कोई नौकरी नहीं, और सालों से बड़े शहर में रहने वाला, यहां कैसे सामंजस्य बैठा सकता है, ये तुम्हारी कुढ़न है और कुछ नहीं हर बार बच्चे ही दोषी हो जरूरी नहीं।

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प्रविष्टि क्रमांक - 247

नेहा भारद्वाज

सास की विदाई

एक बिलकुल साधारण तरीके से रश्मि एक बार फिर दुल्हन के रूप में विदा हो रही थी , जहाँ हर कोई निर्मला जी को लेकर अपनी सांत्वना उन्हें दे रहा था, उन्हें अब इसी घर में या वो चाहे तो वृद्धा आश्रम में रहना था लेकिन इन सबसे इतर देवेन और रश्मि उनके साथ देवेन की मां भी अपने बच्चों के लिये गये एक फैसले से खुश थी, तभी अचानक देवेन की मम्मी एक बड़ा सा सूटकेस और एक छोटा सा बोर्ड लेकर बाहर आई सबको लगा आज से ये यहीं रहेंगी, लेकिन अब बारी थी देवेन की, निर्मला जी भी सवालिया नजरों से सब देख रही थी, देवेन की मम्मी ने ड्राईवर को सूटकेस दिया और और बाहर बोर्ड टांगने को कह कर खुद निर्मला जी का हाथ पकडकर गाड़ी में बैठने को कहने लगी वहां खड़े लोग देवेन और रश्मि को देख रहे थे उन्होंने सबके सामने हाथ जोड़े और कहा आज से मेरी मां जी हमारे साथ, नहीं... नहीं...हम सब दोनों मां जी के साथ रहेंगे और ये हम दोनों का फैसला है, निर्मला जी अवाक रह गयी इतना बड़ा फैसला बेटी के घर ही में एक मां ज्यादा दिन नहीं रह सकती फिर तुम तो मेरी बहू...? नहीं माँ जी अभी आप ही ने तो कन्यादान करके मुझे बेटी बना लिया ! मां जी मैंने निकेतन से पूछा था उसका जवाब अगर उन्होंने समय रहते दे दिया होता तो कोई समस्या ही नहीं थी मुझे अपना हम सफ़र ढूंढने को तो कह गये पर आपके बारे में निकेतन ने तो इसका जवाब मेरे ही भीतर छोड़ दिया था, मां जी और जब हम सबको कोई दिक्कत नहीं है तो आप क्यों चिंता करती है बाकी आप कुछ दिन रह लीजिये हम वादा करते है की यदि आपको किसी भी तरह की कोई दिक्कत होगी तो मैं और देवेन खुद आपकी बात मान लेंगे मैंने आपकी बात मान कर देवेन का हाथ थामा, सार्थक अभी छोटा है इसीलिए मैंने उसे भी अभी किसी रिश्ते में न ही बाँधा न ही बताया देवेन को डेडू कहता रहे कोई परेशानी नहीं क्योंकि उसके हिसाब से उसके पापा निकेतन थे और वही रहेंगे लेकिन अभी मैं उसके प्यार को दो नाम देकर बांटना नहीं चाहती देवेन के साथ उसका रिश्ता नया है और बिना किसी छलकपट के खूबसूरत है और वही बात समीक्षा की वो जानती है कि अपनी माँ को खो चुकी और अब टीचर आंटी उसके घर आकर रहेंगी लेकिन... क्यों....? इसका जवाब देने का अभी सही समय नहीं है और हाँ बहन जी ये देखिये ये किराये के लिये बोर्ड भी लग गया है इससे आप खुद को सुरक्षित और आत्मनिर्भर समझिए, समय तो हर रिश्ते को देना ही पड़ता है, अब चलिए शाम को बच्चे स्कूल से सीधे वहीं घर पहुंचेंगे !! दो मायें आज अपने बच्चों के घर बसाने के लिये बहने बन गयी थी देवेन और रश्मि दोनों के रिश्ते को देखकर भाव विभोर हो उठे !!

©नेहा भारद्वाज

बैंगलोर

नेहा भारद्वाज

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है, आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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