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लघुकथा // वारिस // वीणा शर्मा

सुषमा फिर से मां बनने वाली थी। या यूं कि एक कठिन परीक्षा से गुजरने वाली थी जैसे कि वो यहां बच्चे को जन्म देने के लिए नहीं आयी है अपितु परिवार वालों की कसौटी पर खरा उतरना था उसे।

हास्पिटल की खिड़की से शाम का सूरज जैसे -जैसे नीचे की तरफ प्रस्थान कर रहा था उसके दिल की धड़कनें असामान्य होती जा रही थीं। आज उसकी किस्मत का फैसला जो होना था।

वर्षा ऋतु के विपुल जल की कामना पृथ्वी के हृदय की कंदराओं में पनपते दर्द को भर देने की होती है। परंतु ऐसा होता कहां है वर्षा की समाप्ति पर उन्हीं कंदराओं का दर्द स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगता है।

हालांकि एक बार अथाह जलराशि सतह को समतल अवश्य कर देती है। सुषमा के प्रसव का दर्द भी कुछ ऐसा ही था। बेटी होने का दंश क्या होता है उसे पता था। पहले ही दो बेटियां थीं उसकी। दिल में हजार तूफानों से जूझते हुए बस एक ही भय से कांप जाती थी वो कि यदि अबकी बार भी बेटा न हुआ तो कैसा मोड़ अख्तियार करेगी उसकी जिंदगी।

कभी अचानक उसकी आंखों के सामने रंगीन तारे झिलमिलाने लगते कि बेटा ही होगा लेकिन कभी वे तारे निराशा से काले व सफेद धब्बों में भी परिवर्तित होने लगते। बड़ी ऊहापोह की स्थिति थी उसकी। परिवार के लोग मन्नतें मांग रहे थे वारिस के लिए। पर किसी को फुर्सत नहीं थी कि सुषमा को कुछ शब्द सांत्वना के बोल सके। आखिर वो घड़ी आयी और प्रसव पीड़ा के चलते सुषमा को लेबर रूम में ले जाया गया उसकी तबीयत बिगड़ने लगी अंधेरा सा छाने लगा उसकी आंखों के सामने एक गर्त से में गिरती जा रही थी वो। कुछ समय पश्चात उसने शिशु को जन्म दिया।

डॉक्टर ने उसको कहा बधाई हो बेटा हुआ है। लेकिन इस बधाई को सुषमा न सुन सकी सुनती भी कैसे वो तो बहुत दूर जा चुकी थी परिवार को उनका वारिस सौंपकर। जो कि उसकी जिंदगी के सामने अधिक महत्वपूर्ण था।

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